सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/ लेखिका/शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम
रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख –
“बाहर शोर है, अंदर शांति रखिए। इस दौर में खुद का ख्याल रखना ही सबसे बड़ी जरूरत है”
-सुश्री सरोज कंसारी
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स्वयं का ध्यान रखना आवश्यक है; इस दौर में यही ‘मानसिक उत्तरजीविता’ है। जब बाहर शोर हो, तब भीतर की शांति ही एकमात्र आश्रय होती है। पहले अपने भीतर शांति का अमृत भरें, ताकि आपके शब्द शोर नहीं, बल्कि एक दिव्य संगीत बन सकें, जो मौन में खिलता है, वही जग को महकाता है। किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए यह मानव तन महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसके द्वारा संसार के समस्त कार्य संचालित होते हैं। ईश्वर की सबसे खूबसूरत रचना है यह मानव तन। इसी तन से मनुष्य ने पहिए से लेकर अंतरिक्ष यान तक का सफर तय किया है। चाहे तो इससे छोटे से लेकर बड़े आविष्कार कर सकते हैं और जरा सी नादानी से एक पल में ही विध्वंस कर सकते हैं। हर किसी के पास सुंदर दिल है जिसके धड़कते तक ही सारा खेल है, रुक जाने पर सब खत्म। दिल नाज़ुक होता है जिसे कठोरता पसंद नहीं। इसलिए कठोर शब्द और कटु व्यवहार से बचना ही समझदारी है। दिल को हमेशा खुश रखने की कोशिश कीजिए। चिंता, दुख, अवसाद में रहने से दर्द देती हैं जो कभी कभी भयानक होती है। उसके बाद मन, जिसके नियंत्रित होने पर ही ज़िंदगी सही दिशा में चलती है। चंचल मन को हमेशा अपने वश में रखना चाहिए, भटकने पर जीवन वीरान हो जाता है। मन को एकाग्र करने के लिए ध्यान, सत्संग और अच्छी पुस्तकें सबसे सरल उपाय हैं। जिसमें हमेशा शुद्ध भावनाएं भरनी चाहिएं। वासनाओं से भरपूर मन विष के समान होता है जो असमय काल के गाल में समाहित कर देता है। संसार की कोलाहल भरी गलियों में अपनी आवाज़ बुलंद करने से पूर्व, स्वयं के भीतर के मौन को साध लेना अनिवार्य है। जब तक अंतर्मन की झील शांत न हो, बाहरी शब्दों की लहरें केवल विक्षेप पैदा करती हैं। वास्तविक क्रांति बाहरी शोर से नहीं, बल्कि उस आंतरिक स्थिरता से जन्म लेती है जहाँ विचार स्पष्ट और आत्मा तृप्त होती है। इसलिए, जगत को बदलने के लिए पहले अपने भीतर शांति का अमृत भरें, ताकि आपके शब्द शोर नहीं, बल्कि एक दिव्य संगीत बन सकें। जैसे एक फूल एकांत के मौन में खिलता है और अपनी सुगंध से समस्त दिशाओं को महका देता है, वैसे ही जब आप स्वयं को भीतर से शांत कर लेते हैं, तब आपके द्वारा कहा गया हर शब्द एक आशीर्वाद और प्रेरणा बन जाता है। हर कदम पर भयंकर तूफान है, हर लम्हा हादसों से भरा, पल-पल में दहशत है। कहीं खाई तो कहीं गम की गहराई है। इन सबको पार करके ही मंज़िल मिलती है। किन्तु, इससे आगे निकल जाने कोशिश जारी रखना होगा…मनुष्य जहाँ सबसे श्रेष्ठ प्राणी है वहीं भयावह भी है, जिसमें दैवीय गुण भी हैं और राक्षसी भी। किस मोड़ पर किससे सामना हो जाए पता नहीं, इसलिए सदैव सचेत, सजग और जागरूक रहना जरूरी है। क्योंकि सावधानी ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। यहाँ गिराने वाले अधिक और संभालने वाले कम ही मिलते हैं। ये कलयुग है…! कोई कृष्ण जैसे सारथी नहीं जो व्यथित मन में नई ऊर्जा का संचार करने में मदद करें, अपने उच्च कोटि के ज्ञान से भूत, भविष्य और वर्तमान की चिंता से ऊपर उठने की हिम्मत प्रदान करें। आज तो हर व्यक्ति को स्वयं ही अपना सारथी बनना पड़ता है। यहाँ तो अपने ही बैरी बन जाते हैं धन-दौलत की चाह में। शब्दों से ही वार कर कटु वचन से मन मस्तिष्क को विचलित कर देते हैं। प्रथम स्वयं का मानसिक बोध, विश्राम और स्वास्थ्य सुनिश्चित करें, तत्पश्चात अन्य उत्तरदायित्व। आत्म-सजगता के साथ बढ़ते चलें, क्योंकि धैर्य ही वह सेतु है, जो आपको सर्वोच्च शिखर तक ले जाने का सामर्थ्य रखता है। वैसे तो मनुष्य के पास असीम शक्ति का भंडार है, पर कभी-कभी जीवन के मार्ग में अति विघ्न, बाधा, तनाव का बोझ हो जाने के कारण खुद में मौजूद क्षमता को पहचान पाने में हम असमर्थ होते हैं। समय आने पर अपनी सूझबूझ का प्रयोग नहीं कर पाते, निर्णय लेने में असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। सब कुछ जानते हुए भी विवेक शून्य हो जाता है। दुख की घड़ी बहुत बड़ी होती है, शक्तिसंपन्न व्यक्ति भी खुद को असहाय समझने लगते हैं। ऐसे समय में एक सच्चा मित्र या एक सांत्वना का शब्द भी औषधि का काम करता है। जब समय सही हो तो मन में आशा, उत्साह का संचार स्वमेव होने लगता है, जिन्दगी खूबसूरत लगती है। लेकिन विपरीत समय में अंतस में नकारात्मक विचार आने लगते हैं और मानसिकता बोझिल हो जाती है। सबसे पहले है – अपनी मानसिक शांति, भरपूर आराम और शरीर का ध्यान रखें। जब आप खुद अंदर से ठीक रहेंगे, तभी जीवन की दौड़ में आगे बढ़ पाएंगे। बस बिना घबराए संयम के साथ चलते रहें, क्योंकि जो धीरज रखता है, वहीं एक दिन सबसे ऊंचे हर शिखर पर पहुंचता है। जब व्यक्ति सब कुछ खोने के बाद टूटकर बिखर गया हो और उसका मन दुख से भरा हो, उसकी मानसिक स्थिति एकदम क्षीण हो गई हो, ऐसी स्थिति में किसी को फिर से मजबूत होने, जिंदगी की चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार कर देना सबसे पुनीत कार्य होता है। खोई हुई हिम्मत को जागृत कर देने से दुखी इंसान को उम्मीद की एक नई किरण मिल जाती है। भले ही सुख में आप शामिल न हो पाएँ तो चलेगा, लेकिन दुख में साहस के पग देने वाले महान होते हैं। सुख बाँटने वाले बहुत मिलेंगे, पर दुख बाँटने वाला ही सच्चा अपना होता है। जिस प्रकार एक चिकित्सक के पास जाने से मरीज को राहत मिलती है, वैसे ही नीरस व्यक्ति को आत्मीयता, प्रेम, स्नेह, अपनेपन देकर जीने के लिए प्रेरित करने वाले भी मसीहा से कम नहीं होते। आज भौतिकता की होड़ में जहाँ सभी अपने में लीन हैं, व्यस्त दिनचर्या में किसी के पास किसी के लिए समय नहीं। अगर आप अपने जीवन के व्यस्त समय से कुछ पल देकर किसी को नवजीवन प्रदान करते हैं तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं। क्योंकि समय ही इस युग का सबसे बड़ा दान है। अपने लिए तो सभी जी लेते हैं, लेकिन मानवता के नाते हम किसी के लिए कुछ कर पाते हैं तो यह सौभाग्य की बात है। सिर्फ मरीज का इलाज करने वाला ही चिकित्सक नहीं, दर्द से चूर व्यक्ति को दया, करुणा की मरहम देने वाले भी ईश्वर के दूत ही होते हैं। और यही दूत धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शोर और छल के दौर में,
खुद का साथ जरूरी है,
मन शांत रहे अगर,
तो हर जीत पूरी है।
बाहर शोर है, भीतर सुकून रखिए! दुनिया में बहुत आपाधापी, नकारात्मकता और दिखावा (शोर) है।…आप बाहर की दुनिया को शांत नहीं कर सकते, लेकिन अपने मन के अंदर शांति और संतोष बनाए रखना आपके हाथ में है। बाहरी परिस्थितियों को अपने मानसिक सुकून पर हावी न होने दें। ये भीषण संसार को बदलना आपके हाथ में नहीं है, लेकिन खुद को शांत रखना आपके हाथ में है।
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