सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री/लेखिका/अध्यापिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
गोबरा नवापारा-राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
यदि अंतर्मन शांत हो, तो संसार का हर कोना सुंदर लगने लगता है।
– सुश्री सरोज कंसारी
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हमारे हाथों में है,
इस चंचल मन का संयम,
अपने अंतस का हर पल,
हमें करना होगा सुंदरम।
स्मरण रहे… बाह्य परिस्थितियाँ कदापि हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं, किंतु उन परिस्थितियों के सम्मुख हमारा अंतर्मन कैसा व्यवहार करेगा, यह पूर्णतः हमारे अपने ही अधीन है। यही जीवन का शाश्वत यथार्थ है। अतः, हमें स्वयं ही अग्रसर होकर अपने भीतर मौन, शांति और अप्रतिम सुंदरता का सृजन करते रहना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि हमारा शांत अंतर्मन सकारात्मक तरंगें पैदा करता है, जिससे बाहरी दुनिया का प्रत्येक नजारा सुंदर दिखने लगता है। जब हम भीतर से संतुष्ट रहते हैं, तो हमारे पास जो कुछ भी है, हम उसी में आनंद खोज लेते हैं। मन शांत हो तो दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव जागता है।
इस भीषण एवं संवेदनशून्य संसार के होते हुए भी हम सभी के प्रति संवेदनशील हैं, क्योंकि हमारा हृदय संवेदनशील है। हमारे दुखों में भी मधुर गीत छिपे हैं। मानव दुखी इसलिए हो जाता है क्योंकि वह चिंता अधिक करता है और उसमें उत्सुकता नहीं होती; जबकि उसमें उत्सुकता होनी चाहिए।जब मनुष्य का मन अशांत होता है, तो सुंदर वस्तुएँ भी उसे बोझ सी लगने लगती हैं। छोटी-छोटी बातें चुभती रहती हैं, रिश्तों में खटास आ जाती है, और हम हर चीज़ में कमी निकालने लगते हैं। किंतु जैसे ही हम अपने भीतर झाँकते हैं, साँसों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, और शिकायतों की जगह कृतज्ञता को स्थान देते हैं, वैसे ही जीवन का स्वरूप बदल जाता है।
अंतर्मन के शांत होने का अर्थ यह नहीं कि जीवन में समस्याएँ नहीं होंगी। इसका अर्थ यह है कि समस्याओं के बीच भी हम अपना संतुलन नहीं खोते। शांत मन वाला व्यक्ति तूफ़ान में भी दीपक की तरह जलता रहता है। अत: शांति बाहर नहीं, बल्कि भीतर है। थोड़ा मौन, थोड़ा ध्यान, थोड़ी सेवा और अपनों के लिए समय—यही वे आदतें हैं जो हमारे अंतर्मन को निर्मल बनाती हैं। जिस दिन हमारा अंतर्मन शांत हो गया, उस दिन यही दुनिया स्वर्ग जैसी लगने लगेगी। अतः स्मरण रखिएगा, सुंदरता आँखों से नहीं, बल्कि मन की स्थिति से देखी जाती है। इस संसार को सुंदर हमारे मन का भाव ही बनाता है; इसलिए खुद को सुंदर बनाने का सबसे पहला कदम अपने अंतर्मन को शांत रखना है।
”बाहर चाहे जितने भी,
झंझावात उठते रहें,
हृदय के कोने में शुचिता की,
चलती रहे आत्म-साधना।”
बाहर की दुनिया में चाहे कितनी भी परेशानियाँ, ‘तूफान’ क्यों न आ जाएँ, यदि हमारा अंतर्मन मजबूत रहता है, तो बाहरी परिस्थितियाँ हमें दुखी अथवा विचलित नहीं कर सकतीं। संसार के मनुष्यों के लिए केवल इतना ही कह सकते हैं कि जीवन की सार्थकता बाहरी उपलब्धियों में नहीं होती, वरन आंतरिक शांति में है। आज का युग भागदौड़, प्रतिस्पर्धा का युग है। ऐसे में यदि हम प्रतिदिन कुछ पल अपने लिए निकालकर आत्मचिंतन किया कीजिये…और प्रकृति के सान्निध्य में बैठें, बच्चों से हँसकर बात किया कीजिये। और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें, तो हमारा अंतर्मन स्वतः ही शांत होने लगेगा।
स्मरण रखिए.. और स्वयं को बदलने की पहली सीढ़ी है — अपने मन को शांत रखना। यह हमेशा हमारी जिम्मेदारी है और यह हमारे ही हाथ में है। जिस दिन हम भीतर से शांत बने रहे, उस दिन कोई समस्या नहीं होगी। उस दिन हर चेहरा अपना लगेगा, हर दिन उत्सव लगेगा, और यही पृथ्वी हमें स्वर्ग की अनुभूति कराएगी। हम अपने मन को शांत रखेंगे, ताकि हमारा जीवन भी शांत बना रहे, और इस संसार का हर कोना सुंदर लगने लगे। मन एक पात्र है। यदि वह पुराने कचरे, पुरानी यादों व शिकायतों से भरा रहेगा, तो नवीन ऊर्जा, नवीन प्रेरणा, नवीन प्रसन्नता आएगी भी तो कहाँ रखेंगे? खाली होने पर ही भराव संभव है। मोमबत्ती भी तभी जलती है जब मोम पिघल कर जगह बनाती है… हमारी वास्तविक खुशी किसी बाहरी वस्तु अथवा व्यक्ति से नहीं, बल्कि मन की शांति से मिलती है।
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