सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
शाम
वक्त गुजर जाता है.
उम्र गुजर जाती है.
रुकती नही लहरें
गुजर जाती हैं.
गुजर जाती हैं
हवाएं भी.
आवाजें गुजर जाती हैं.
आकर होंठों पर
मुस्कुराहटें गुजर जाती हैं.
खुशियों की बरातें आती हैं
गुजर जाती हैं.
आंसुओं की झड़ियां
रुकती नहीं
पर गुजर जाती हैं.
जब गुजर जाना है
यूं ही सब कुछ.
फिर क्यूं ठहरता है
बन मुसाफिर सरायों मे?
ऐ मुसाफिर!
चल चल और चलता चल.
जगहें खाली करता चल.
नाहक बाधक बनना है
बदनामी की बात.
तू न रुकता।
तब और भी न रुकते।
गुजर जाते
अपने कारवां के साथ।







