पल भर शेष 

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संक्षिप्त परिचय 

 

 निर्देश निधि  

 शिक्षा – एम. फिल. (इतिहास) 

लेखन की मुख्य विधाएं – कहानी, कविता, संस्मरण, यात्रा संस्मरण, समसामयिक लेख, पर्यावरण सम्बन्धी आलेख आदि । 

देश की लगभग सभी मुख्य स्तरीय पत्र – पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित ।

 

कहानी संग्रह –

1-‘झाँनवाद्दन’– (2017) प्रकाशित, 

दूसरा संस्करण, 2023 में ‘शेष विहार’ परिवर्तित शीर्षक से प्रकाशित 

2-‘सरोगेट मदर’– (2021) प्रकाशित

 

काव्य संग्रह-

 

1-‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ (2023)

‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ काव्य संग्रह पर शोध जारी।

  ‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ काव्य संग्रह ‘साहित्यtak’ के ‘बुक कैफे’ में 2023 की टॉप 10 पुस्तकों में (पाँचवें नम्बर पर) सम्मिलित।

‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ कविता संग्रह जयपुर साहित्य संगीति से पुरस्कृत 

 

संस्मरण संग्रह-

 

1- ‘मोती से दिन’ 

चारों पुस्तकों की सभी रचनाएँ स्तरीय पत्र – पत्रिकाओं में प्रकाशित

सांस्कृतिक निदेशक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (CCRT,भारत सरकार) से फेलोशिप

हिंदी अकादमी (दिल्ली सरकार) द्वारा ‘शेष विहार’ कहानी पर नाटक 

बुलंदशहर से प्रकाशित ‘बुलंदप्रभा’ साहित्यिक त्रिमासिकी में उपसंपादक, 

 

दिल्ली दूरदर्शन से साक्षात्कार प्रसारित

आकाशवाणी से निरंतर कहानियाँ प्रसारित,  

 रेडियो से साक्षात्कार एवं वार्ताएँ प्रसारित,   

    

विभिन्न स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में रेखाचित्र प्रकाशित, आवरण पृष्ठ सहित।

कई कहानी और कविता संकलनों में कहानियाँ, संस्मरण और कविताएँ प्रकाशित, 

नगर पालिका बुलंदशहर की त्रैमासिक पत्रिका “प्रगति” का सम्पादन,  

एक सामूहिक काव्य संग्रह ‘परिवर्तन’ का सम्पादन । 

गद्य कोश, कविता कोश, ईअभिव्यक्ति, आदि अनेक ई-पत्रिकाओं में भी रचनाएं प्रकाशित 

 

ग्यारहवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (मॉरीशस) में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भागीदारी,

 

जन कल्याणकारी कार्यों में सक्रिय, विशेषकर छोटे बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी 

अनेक पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों में रेखाचित्र और आवरण पर चित्र प्रकाशित 

पर्यावरण के सुरक्षित रख – रखाव के लिए लेखन एवं व्यावहारिक सक्रियता 

 

शूटिंग में विशेष अभिरूचि 

अनेक रचनाएँ पंजाबी, बांग्ला, मराठी, भोजपुरी और अंग्रेजी में अनूदित । 

 

दिल्ली में 23 nov 2024 को संपन्न इंडिया टुडे ग्रुप के ‘आज तक’ के ‘साहित्य तक’ में भागीदारी।

कोल्हापुर के जिजा प्रकाशन द्वारा ‘झाँनवाद्दन’ कहानी संग्रह का ‘शेष विहार’ शीर्षक से मराठी में अनुवाद, । 

‘मैं ही आई हूँ बाबा’ कहानी को वर्ष 2019 का ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’ 

‘मैं ही आई हूँ बाबा’, कहानी को ‘कथारंग’ पुरस्कार(2024)

‘जीकाजि’ कहानी पर ‘विटामिन जिन्दगी’ प्रथम पुरस्कार।

जयपुर साहित्य संगीति सम्मान (‘नदी नीलकंठ नहीं होती’) काव्य संग्रह को। 

 

जनपद गौरव सम्मान 

 हिंदीश्री सम्मान ‘शुभम’ संस्था से 

आदि अनेक सम्मान और पुरस्कार 

समन्वय संस्था से सम्मान 

 

 

 

 

 

कहानी

 

पल भर शेष 

 

 

मुन्ना, मुन्ना, पिताजी चिल्ला रहे हैं। जिसका नाम वे पुकार रहे हैं, वह प्रत्युत्तर में हाँ कहने, कभी नहीं आने वाला। फिर भी उन्होंने उसकी हाँ सुन ली है। वे जोर-जोर से बोल रहे हैं,

 

अरे इन लड़कों को मना कर मुन्ना, पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं इतनी रात में। अरे जरा देख तो ये चिड़ियाँ कैसी फड़फड़ा कर अपने घोंसलों से निकल आई है। अरे कोई इनके बारे में भी सोच लो भाई।

 

अम्मा पिताजी के चिल्लाने से नाराज होकर कह रही हैं,  

 

पिता जी क्या देख रहे हैं, अचानक बहुत सी चिड़ियाँ उनके कमरे की तरफ़ साँय-साँय की आवाज़ करती हुई उड़ी चली आ रही हैं। सैकड़ों प्रजातियों की छोटी-बड़ी चिड़ियाँ। साइबेरियन चिड़िया, लाल मुँह वाले सारस, गौरैया, तोता, मैना, चील, बाज, बटेर, फ़ाल्कन, होर्नबिल, बत्तखें, पेंग्विन सबके सब। हैं तो वहाँ डोडो भी। और भी ना जाने किन-किन प्रजातियों की चिड़ियाँ हैं। पिताजी का कमरा फ़र्स्ट फ़्लोर पर है। उनके कमरे की दोनों दीवारों में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं। वे खिड़कियाँ काँच की हैं और उनके कमरे का बाहर खुलने वाला दरवाजा भी काँच का ही है। यह क्या, इस सुनसान रात्रि में, सारी दुनिया से आकर चिड़ियाँ पिताजी के कमरे की खिड़कियों में घुसने का प्रयास कर रही है। पिता जी हैरान हैं।  वे आख़िर ऐसा क्यों कर रही हैं!

 

खिड़कियों के शीशे बँद हैं। चिड़ियाँ खिड़कियों के शीशों से टकरा रही हैं। खिड़कियों से आते प्रकाश को वे दिन समझ रही हैं । उनके सिर गहरी चोट खा रहे हैं। वे या तो मूर्च्छित हो कर या फिर मर कर नीचे गिरती जा रही हैं। वे बहुत भयभीत स्वरों में चिल्ला रही हैं। सवेरे-सवेरे कानों में अमृत सा घोलने वाली उनकी मधुर स्वरलहरियाँ, इस समय चीत्कार में परिवर्तित होकर भयभीत कर रही हैं। पिता जी ने एक खिड़की खोल ली है। देखते-देखते उनका कमरा चिड़ियों के टूटे हुए पंखों से अट गया है। वे जगह-जगह हवा में तैर रहे हैं। पिता जी खिड़की से नीचे झाँक रहे हैं, खिड़कियों के नीचे मृत और मूर्छित चिड़ियों के ढेर है। कमरे के अंदर-बाहर सब जगह तेज़ प्रकाश है। रात में इन मासूम चिड़ियों के लिए इस कदर प्रकाश, एक तरह का दिन है। रात में दिन। दिन, चिड़ियों के दाना-खाना और आवास खोजने का समय है। चिड़ियों का खिड़कियों पर आना,  दाना तलाशने के क्रम में हुआ है। लाल गर्दन वाले सरसों का एक पूरा का पूरा झुंड पिताजी के कमरे में घुस आया है। प्रेमी और सरस प्रकृति के लाल मुँह वाले सारसों को देखना शुभ है। पर दिन में, रात में नहीं। रात पक्षियों के जागरण के लिए नहीं होती। समय शुभ-अशुभ का कारक अवश्य ही है।

 

देखते-देखते रात में पिताजी का कमरा लाल गर्दन वाले कुछ युवा और कुछ बूढ़े सारसों से भर गया है। अजीब सा दृश्य है। वे आसमान की ओर अपनी चोंच उठा कर नृत्य कर रहे हैं। जैसे वे वर्षा ऋतु में करते हैं। यही नृत्य उनके एकनिष्ठ प्रणय का आरम्भिक निवेदन भी होता है। कुछ बूढ़े सारस भी पिता जी के कमरे में प्रणय नृत्य कर रहे हैं। अजीब डरावना दृश्य है। अपनी शतक भर की उम्र में पिता जी को पहली बार प्रणय नृत्य जैसा नरम और रूमानी दृश्य डरावना लग रहा है।

 

यह क्या, उनमें से कुछ युवा सारस प्रणय नृत्य छोड़कर, पिताजी के बूढ़े और बिना बालों वाले सिर पर ज़ोर-ज़ोर से अपनी चोंच मार रहे हैं। पिताजी घबरा कर उठ गए हैं। उठ ही नहीं गए, भागने की मुद्रा में हैं। वे जोर से चिल्लाए हैं। मुन्ना, मुन्ना इन सारसों को भगा मुन्ना, ये मेरा सिर फाड़ देंगे। ये मेरी जान ले लेंगे मुन्ना। कोई मेरी नहीं सुनता। रोज कहता हूँ इतनी लाइट्स मत जलाओ। रात को रात ही रहने दो। कोई नहीं सुनता। डरे हुए पिता जी बोलते जा रहे हैं। दिन भर के काम से थक कर, गहरी नींद में सोए छोटे भैया उनके कमरे की ओर दौड़े हैं।

 

सारस?  सारस यहाँ कहाँ से आएँगे पिताजी? यहाँ तो कोई सारस नहीं है। अभी थे, अभी यही थे। देख मेरी खोपड़ी पर ये निशान, ख़ ख़ खून छलक आया है। उनकी भर्राई हुई आवाज में हकलाहट और भर गई है। घबराए हुए पिताजी पसीना-पसीना हो रहे हैं। नवंबर की ठंडी रात में उनकी माँस रहित कनपटियों से पसीने की धार बह रही है। उनकी बूढ़ी, गड्ढों में सिमट आई आँखें भयभीत लग रही है। वे बुरी तरह काँप रहे हैं। उन्होंने हड्डी-हड्डी हो आए अपने दोनों हाथों से अपना सिर कस कर पकड़ रखा है। बुरे सपने अक्सर अपना ऐसा ही असर छोड़ कर जाते हैं। पर पिताजी कह रहे हैं कि, ये सपना नहीं है। ये सच है। मुन्ना की कसम। छोटे भैया पिताजी का सिर देखकर आश्चर्य में हैं। सिर पर खरोंच जैसे निशान तो वाक़ई हैं।

अम्मा गफलत में हैं। बड़बड़ा कर रमा को पुकार रही हैं। अरी रमा, परकास कर दे जरा, अरी परकास कर दे, रमा। अम्मा हमेशा से प्रकाश को परकास ही कहती हैं।

इस उमर में भी पिता जी अम्मा पर ग़ुस्सा करने का अपना अधिकार बिल्कुल नहीं भूले हैं। आखिर सौ बरस पुराने पुरुष जो है। पिताजी अम्मा पर जोर से चिल्लाए हैं। परकास कर दे, परकास करदे चिल्लाती रहती है डुकरिया। चुप हो जा। कुछ पता भी है कितना जानलेवा हो गया है तेरा परकास। तेरी आँख ही नहीं देखती बस। समझती नहीं है अँधेरा कितना ज़रूरी हो गया है। अंधेरा ना हुआ तो सब मारे जाएँगे, वो भी बेमौत। तू भी मारी जाएगी बुढ़िया।

अच्छा ही तो होगा, अब कौन सा किला फतह करना बाकी रहा ? अम्मा ने कुछ गफलत में ही, बिना दाँतों वाले मुँह से निकली, बच्चों जैसी हो आई आवाज में उत्तर दिया है, साथ ही वे हँसी भी हैं।

पिता जी और अम्मा एक ही कमरे में रहने वाले धरती के दो ध्रुवों के सामान हैं। इस उमर में भी पिता जी मौत को अम्मा और खुद से बहुत दूर खड़ी देख रहे हैं। यह इंसानी जीवट का एक बेहतरीन उदाहरण है, छोटे भैया मन ही मन सोच रहे हैं।

पिताजी के चिल्लाने से अम्मा की गफ़लत भी दूर हो गई है। वे बिना नींद वाली नींद से पूरी तरह जाग गई हैं। डिबिया जला दे रमा, जरा परकास कर दे, देखिए बुड्ढे कू किस ततैये ने काट खाया। अम्मा डाँट खाकर भी यही दौहरा रही हैं। वे पिताजी को बुड्ढा ही पुकारती हैं। जैसे स्वयं वे सोलह बरस की किशोरी हों। पिता जी भी तो चिढ़ कर उन्हें डुकरिया या बुढ़िया ही पुकारते हैं, अपनी उम्र की तरफ़ देखे बग़ैर। अधिक पक कर मद्धम पड़ गई दो बूढ़ी आवाजों के कारण पूरा घर जाग गया है। छोटे भैया कह रहे हैं,

हमें दिन भर काम करना होता है पिताजी और रात भर आप हमें सोने नहीं देते। आखिर क्या किया जाए, ज़रा हल भी आप ही बता दो।

हाँ तो चिल्लाता ना तो क्या करता ? उन हजारों पंछियों को मैं अकेले भगा लेता क्या?

पिता जी, कहीं नहीं थे पंछी ।

थे कैसे नहीं ? पिता जी ने तत्परता से उनकी बात काटी है।

अच्छा अब कोई पंछी नहीं हैं यहाँ, ना ही आएँगे। अब तो सो जाओ।

पर पिता जी के मस्तिष्क की रासायनिक क्रियाएँ कुछ इस तरह उद्वेलन कर रही हैं कि उनका डर जा ही नहीं रहा है।

अच्छा तो मुन्ना को भेज दे। उसे तो नहीं जाना सुबह ऑफिस। ऑफिस-ऑफ़िस तो तुम ऐसे गाते हो जैसे मैं कभी ऑफिस ही नहीं गया। औलाद और माँ-बाप का यही फर्क है।

वे अपनी थकी, डरी और भर्रायी आवाज़ में कह रहे हैं। छोटे भैया पहले इन बातों पर चिड़ जाया करते थे। पर जब से मुन्ना भैया नहीं हैं तबसे वे शांति से काम लेने लगे हैं। —

मुन्ना भैया की बेटी ‘नरमी’ का ब्याह है। हम पाँचों बहन-भाई और उनके बच्चे, सब यहीं एकत्र हुए हैं, दिल्ली के मालवीय नगर स्थित अपने घर में। कितने बरसों बाद मिले हैं हम सब ! एक ही घर से निकले हम बहन-भाई दुनिया के किसी कोने में क्यों न चले गए हों पर सच कहूँ? जड़ें यहीं हैं, सो ख़ुशी भी यहीं है। हमारी संताने भले ही रंग गई हो दूसरी सभ्यताओं, संस्कृतियों में, पर हम तो घर आकर वैसे ही हो जाते हैं जैसे कभी पैंतीस-चालीस साल या कभी उससे भी पहले रहे होंगे।

नरमी विदा होकर अपनी ससुराल चली गई है। बचे हुए काम निपटाने का जिम्मा छोटे भैया का है। लगभग सभी मेहमान भी वापस लौट गए। मेरे लिए न्यू जर्सी से बार-बार आना सम्भव नहीं होता, इसीलिए मैं कुछ दिन और रहूँगी अम्मा-पिता जी के साथ। भले ही अम्मा और पिता जी अजनबी से हो गए हैं, उनका व्यवहार कुछ विचित्र ही हो गया है, पर उनकी इस साँध्य बेला में कुछ दिन तो उनके सान्निध्य का सुख लेती चलूँ।

बदले हुए अम्मा और पिता जी को देख रही हूँ। घर-परिवार में मुख्य भूमिका में रहने वाले वे दोनों अब अपनी उन भूमिकाओं से पूरी तरह अलग हो गए हैं। वृद्धावस्था भी अजीब है। कैसे बदलती हैं पीढ़ियाँ। कैसे बदल जाती हैं पीढ़ियों के साथ घर के लोगों की भूमिकाएँ। यह साक्षात देख रही हूँ। मैं बड़े अफसर रहे अपने चैतन्य पिता को बदला हुआ देख रही हूँ। जिन्होंने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया। ग्रामीण समाज के सभी विरोधों के बावजूद अपनी जीवट और कर्मठता के बल पर इंटैलिजेंस ब्यूरो में अपने लिए ऊँचा औहदा सुरक्षित किया। हम चार भाई और दो बहनों को भी योग्य बनाकर समाज में सम्मानित स्थान दिलाया। अम्मा ने छह बच्चों को केवल अपने बूते पर पाला और हमने उन्हें कभी झुंझलाते नहीं देखा। अम्मा को स्कूल जाकर पढ़ाई करने का अवसर तो ख़ैर नहीं मिला कभी, परंतु पिता जी ने उन्हें इतना साक्षर तो कर ही दिया कि वे कुछ नहीं तो अपनी धार्मिक पुस्तकों को ठीक-ठीक पढ़कर उनके अर्थ को भी समझ सकें। —

भले इतिहासकारों की दृष्टि में सौ बरस का अंतराल नाखून बराबर ही होता हो पर, इंसान की आयु के सम्बंध में सौ बरस, ख़ासा लम्बा अंतराल है। सौ क्या, पिचानवे-छियानवें बरस भी कुछ कम तो नहीं होते। अम्मा ने भी उन बहुत बरसों के आस-पास का समय गुजार लिया है इस धरती पर।

कई बार उमर के अंतिम पड़ाव की ओर खिसकते हुए इंसान की स्मृतियाँ पीछे की ओर लौट जाती हैं। वर्तमान को मस्तिष्क नकार देता है और अतीत को अपने भीतरी कोश से निकाल कर आदमी को सौंपने लगता है। कोई दूसरी स्मृतियाँ निराशा से भरी हो सकती हैं। बुढ़ापे में मस्तिष्क आदमी को निराश होने देना नहीं चाहता शायद। इसीलिए वो इंसान के अशक्त हुए तन में मस्तिष्क के द्वारा बचपन या युवावस्था की स्मृतियाँ जीवंत कर देता है। ताकि उन दोनों अवस्थाओं की ऊर्जा तन में ना सही कम से कम मन में तो दौड़ती रहे। अम्मा और पिता जी, दोनों को ही उनका मस्तिष्क शायद निराश नहीं होने देना चाहता, इसलिए उसने उन्हें उनके बचपन और यौवन की स्मृतियाँ सौंप दी हैं।

अम्मा उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव मुस्तफ़ाबाद में पैदा हुई थीं। वे तो तब की खेप हैं, जब गाँव में उजाला मतलब सूरज। उजाला मतलब आग, आग किसी भी रूप में। आग लकड़ियों से, आग तेल और बत्ती के संयोग से, ढिबरी से,  या आग फूँस से। सूरज तो बेसमय आता नहीं, तो उसके बीत जाने पर उजाले के लिए बस आग। इसीलिए अम्मा को आज के इस झका-झक प्रकाश वाले समय में भी प्रकाश की कमी ही सूझती है। प्रकाश ख़त्म हो जाने का अंदेशा ही लगा रहता है। कभी वे डिबिया याद करती हैं, कभी फूँस। मतलब वे अपने बचपन के युग की आग और उससे जन्में प्रकाश को ही याद करती हैं। क्या वे वाक़ई भूल गई हैं कि अब डिबिया और फूँस की ज़रूरत नहीं? मतलब ये कि अल्वा ऐडीसन का किया धरा उनके लिए सब गुड़-गोबर? जिस प्रकाश की अति उपस्थिति से पिता जी इस कदर खौफजदा हैं, क्या  अम्मा वाक़ई उस प्रकाश की इस कदर उपस्थिति से अनजान है! अनजान तो कैसे हो सकती है भला। हाँ अनजान बनती जरूर है। घर के सब लोग यही मानते हैं। पर पड़ोसन जगत आँटी कहती हैं कि, बनती तो क्या ही होंगी बेचारी, दिमाग ही भूल गया होगा। कभी – कभी तो मैं खुद भी कई बातें भूलने लगी हूँ। अम्मा जी तो फिर भी बहुत उमर की हैं ख़ैर। बुढ़ापे की ओर सरकती जगत आंटी अम्मा की स्थिति समझती हैं।

मैं देख रही हूँ सारा घर अतीत के साए में जी रहा है जैसे। रात होते ही अम्मा की आँखें अपने कर्तव्य की इति समझ लेती हैं। दिन में भी लगभग वैसा ही हाल है। अम्मा को लगता है कि प्रकाश नहीं है घर में। अम्मा का खूब इलाज भी चला है, पर मदद नहीं मिली। अम्मा की आयु से पहले उनकी आँखों की एक्सपायरी आ गई। इसीलिए अम्मा अंधेरे से परेशान है।

वे प्रकाश कर दे, प्रकाश कर दे, की रट लगा देती हैं। उन्हें कौन बताए कि दोष उनकी आँखों का है प्रकाश का नहीं। बताने का भी कोई फायदा नहीं। वे समझती ही कहाँ हैं, समझ भी जाएँ तो उन्हें याद कहाँ रहता है। उनका डिमेंशिया जोरों पर है। का परकास-परकास करत हो अम्मा, अब परकास की कमी किते है। आँख खुलने से बंद होने तक परकास ही परकास है।  इतना कि आँखें  चुंधिया ही जाएँ। अम्मा की हैल्पर रमा अक्सर चिड़ कर बड़बड़ाती है। रमा की झुँझलाहट भी थोड़ी-बहुत जायज तो है ही। हर वक्त एक ही बात तो कोई बच्चे को भी नहीं बताता रह सकता। अम्मा तो फिर भी एक लम्बी उमर पार करके बूढ़ा बच्चा बनी हैं।

पिता जी तो उमर में अम्मा से भी कई बरस बड़े हैं। तो जाहिर है पिता जी या तो सौ की दहलीज पर खड़े हैं, या उसे भी पार कर गए हैं। पिताजी का मोतियाबिंद जब से हटा है, तब से उन्हें प्रकाश से समस्या है। उनकी आँखें इस उम्र की आवश्यकता से कुछ अधिक ही देखने लग गई हैं। शायद इस उम्र के अनुभव जितना। नहीं सिर्फ़ उतना ही नहीं, उनकी आँखें उसके भी पार देखने लग गई हैं कहीं, कई गुना। ऐसा लगता है कि उनकी कोई तीसरी आँख उग आई है। यही परिवार की वर्तमान मुश्किल है।

धरती पर सौ बरस गुज़ारने के साथ पिताजी का दिमाग बूढ़ा हुआ या बच्चा, ये समझ के बाहर है। अब वे वर्तमान के किसी आदमी को कम ही पहचानते हैं। बस उन्हें अपने बहन-भाइयों और माता-पिता का समय याद है। और वे अपने बड़े बेटे, यानी मुन्ना भैया को पहचानते हैं। वे मुन्ना भैया जो दस बरस से हमारे बीच हैं ही नहीं। हाँ, अपने ऊँचे ओहदे और ऑफिस को वे क़तई नहीं भूले हैं। कुछ याद हो ना हो उन्हें अपने ऑफ़िस सबोर्डिनेट मिस्टर मखीजा अच्छी तरह याद हैं। याद है अपने ऑफिस का क्लर्क रतन भी। जिसे वे हमेशा रत्तू ही पुकारते थे। पुकारते थे क्या, पुकारते हैं, अब भी। आई बी के अपने जोनल डायरेक्टर के उच्च पद का रौब-दाब भी खूब याद है उन्हें। अपनी बहादुरी के कुछ क़िस्से भी जरूर ही याद हैं उन्हें। खासकर वह घटना जब वे पाकिस्तान बॉर्डर के भीतर घुसकर नक़्शा बना रहे थे। पाकिस्तानी सैनिकों से बचकर भागने के लिए उन्हें झेलम में कूदना पड़ा था और वे उन्हें चकमा देकर नक़्शे सहित भारत की सीमा के भीतर आ गए थे, सकुशल। यह किस्सा हमने अनगिनत बार सुना है, वह भी विस्तार से। मखीजा की बेवकूफी के क़िस्से भी खूब सुने हैं। रत्तू को उसकी विद्वता और समर्पण के हिसाब से औहदा ना मिलना पिता जी के लिए सदा पश्चात्ताप का विषय रहा।

सौ बरस जीने के किसी लाभ के बारे में तो पता नहीं, पर उसकी हानि काफी बड़ी है। साथ पैदा हुए लोग, साथ देने के लिए नहीं बचते। कई बाद में पैदा हुए लोगों को भी निकलने की शीघ्रता होती है। सबके सब निकल गए लोग आज भी, पिताजी के साथ तो हैं ही, किसी न किसी रूप में।

पिता जी अक्सर मुन्ना भैया से पूछते हैं।

मुन्ना तेरी यशोदा बुआ कहाँ गई, जरा बुलाना, पूछूँ मेरे स्कूल के कपड़े कहाँ रखे हैं इसने ?

अम्मा को पुकार कर कहते, 

अरे मुन्ना की माँ, बाबूजी और अम्मा को खाना दे दिया क्या?  अरे देर मत किया करो भली मानस, अम्मा नाराज हो जाती हैं। जाहिर है, वे सब उनके साथ ही होंगे। तभी तो उनकी राजी और नाराजगी का भी ध्यान रहता है उन्हें । यह तो वे अक्सर ही बोलते रहते हैं, मुन्ना इतनी रोशनी क्यों कर रखी है या  रात हो गई अब सो जाओ बेटा। या मुन्ना लाइट बंद कर दे भैया। इस लाइट की वजह से ही उस रात इतनी सारी चिड़ियाँ घुस आई थीं मेरे कमरे में। मेरा सिर फोड़ डाला था। पिता जी को अधिक रोशनी से तो चिढ़ ही है जैसे।

वे पुकारते भी मुन्ना भैया को ही हैं। पिता जी को सैकड़ों बार याद दिलाया कि मुन्ना भैया अब दुनिया में नहीं है। अव्वल तो वे माने ही नहीं, जो मान भी गए तो ऊपरी तौर पर। दो मिनट बाद ही भूल भी गए और अगली बार फिर हममें से किसी को न पुकार कर मुन्ना भैया को ही आवाज लगाई।

उनकी इस आदत से कई बार बड़ी भाभी उदास हो जाती हैं। आज भी वे अक्सर रो पड़ती है। पिताजी के इस हल्यूसिनेशन या मतिभ्रम का इलाज मुन्ना भैया के अंतरंग मनोचिकित्सक मित्र, डॉक्टर सी पी दास करते हैं। डॉक्टर दास कोई कम योग्य डॉक्टर नहीं हैं। पर पिताजी के बुढ़ापे का इलाज वे नहीं कर सकते। वे ही क्या, उसका इलाज तो दुनिया का कोई  डॉक्टर नहीं कर सकता।

हाँ अगर, पिता जी के मानसिक स्वास्थ्य को हटा दें, तो डॉक्टर दास सहित हम सब उनके शारीरिक स्वास्थ्य पर सुखद आश्चर्य में रहते हैं। अम्मा की कमर जरूर धरती के गुरुत्व को प्रेम करने लगी है। पर पिताजी, वे तो धरती के गुरुत्व को धता बताए सतर खड़े हैं। अम्मा के डिमेंशिया की तरह पिताजी के हैल्यूसिनेशन भी दिन पर दिन पसरते जा रहे हैं। अत्यधिक प्रकाश भरे नागरी जीवन के कारण चिड़ियों और कई निशाचर जीवों की तरह, दिन-रात का भान उन्हें भी नहीं है। दरअसल दिन-रात का अनुमान लगा पाना ही उनके लिए मुश्किल हो गया है। सूरज के छिपने से पहले ही घर के बाहर-भीतर आँखें चौंधिया देने वाले प्रकाश की बहुतायत हो जाती है। पूरा घर जगमगा उठता है। घर के बाहर और भी अधिक जगमग हो जाती है। छोटे भैया ने पुराने घर को आधुनिक करवा लिया है, रौशनी से भरा घर।  छतों में भी आधुनिक चलन वाली लाइट्स लगवा ली हैं।

पिता जी ने अपनी नौकरी के दिनों में ही दिल्ली के पौष और खूबसूरत इलाके मालवीय नगर में एक पार्क के सामने यह बड़ा सा घर लिया था। यह उनकी युवावस्था के दिनों की ही बात है। जब घर लिया गया था तब यहाँ इतनी जगर-मगर नहीं थी। तब तो खैर पिता जी को भी जगर-मगर से कोई परेशानी नहीं थी। पर अब पिता जी रौशनी की अति से परेशान है। डॉक्टर दास उन्हें देर तक समझाते हैं, बाबूजी यह युग, देश-दुनिया के विकास का युग है। रात में काम रुकता नहीं है आदमी का, तो लाइट तो जलानी पड़ेंगी ही ना रात में…

पिता जी उनकी बात बीच में ही काटकर अपनी हल्की भर्रायी आवाज में कहते हैं। अरे दास, तो  विकास की सबसे जरूरी शर्त आदमी ने अंधेरे का खात्मा ही समझा है क्या? मैं देख रहा हूँ आदमी ने धरती से अंधकार का सफ़ाया करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। तो समझ लो, इस हद से ज़्यादा प्रकाश की टॉर्च दिखा-दिखा कर वो खुद के सफ़ाए का रास्ता भी साफ़ कर रहा है। चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा हूँ, पर मेरी कोई नहीं सुनता । अरे निशाचरों की दुनिया बर्बाद हो गई, शहरों के ऊपर आसमान में रोशनी के डोम बन गए डोम । बेचारे रात के जीव जो तारों की स्थिति देखकर जीवन जीते हैं वे ना सामान्य जीवन जी पा रहे न प्रजनन ही कर पा रहे। अरे वे नहीं बचे तो आदमी कौन सा बच जाएगा।  सोचा है कभी ?

वे एक साँस बोलने के कारण हाँफ रहे हैं।  

डॉक्टर दास कहते हैं कि बाबूजी भी ग़लत कहाँ हैं। शहर तो शहर गाँव और जंगल तक रोशनी से भरे हैं । पिताजी कहते हैं कि महानगर ना कभी खुद सोता है ना दूसरों को सोने देता है । यही ना सोने का रोग पिताजी को भी लग गया है। इस रोग से दोस्ती के लिए एक तो उनकी उम्र ही काफी थी, दूसरे उसमें आँखें चौंधियाता प्रकाश और जुड़ गया। पिताजी को तब तक नींद नहीं आती जब तक प्रकाश का हर एक रेशा सो ना जाए, पर प्रकाश के रेशे तो हर वक्त बिना रोक-टोक उनके चारों तरफ जाल बुनते रहते हैं। इसीलिए वे, ‘लाइट बंद कर दो’ का राग बार-बार अलापते रहते हैं। पिता जी को कितना तो समझाते हैं, आपके लिए जरूरी है कि थोड़ी सी लाइट आपके कमरे में फैली रहे। जब आप उठें तो किसी चीज से टकराएँ नहीं।

अरे इन्हें समझा मुन्ना। हर वक्त लाइट की ज़रूरत नहीं है। इंसान के दिमाग में की गई गिनती भी उसकी आँखों जैसी ही होती है। आदमी अपने घर में रोज़ एक जगह से दूसरी जगह तक दस बार चलता है। जिंदगी भर वो इतना भी नहीं कर सकता क्या कि एक जगह से दूसरी जगह तक रखे गए कदम गिन ले अपने ? इस तरह अपने घर में एक जगह से दूसरी जगह तक आ-जा नहीं सकता क्या? बाssत करते हो…

पिता जी अब आप सो जाओ। यह कहकर छोटे भैया होठों ही होठों में बुदबुदाए हैं कि कितनी अतार्किक बात करने लगे हैं पिता जी आजकल।

सोने की रट मत लगा, सुन ले ज़रा ध्यान से। जबरदस्ती की लाइट से रात के जीवों को कितनी परेशानी होती है, कोई समझने को तैयार ही नहीं है। वे मर रहे हैं। उनकी प्रजातियाँ ख़त्म हो रही हैं। उनके बिना जी लोगे तुम ? अरे हर छोटे से छोटा जीव भी जरूरी है, फूड चेन का हिस्सा है बेवकूफों, फूड चेन का। कितने डग कहाँ से कहाँ तक जाने में भरे जाते हैं ये जानने में फ़ारसी की आँख नहीं लगती। अरे मुन्ना जरा समझा इन जाहिलों को।

पिछले दस बरसों से मुन्ना भैया की आवाज हममें से कभी किसी को नहीं आई है, लेकिन पिता जी को उनके उत्तर निर्बाध मिलते होंगे, तभी तो वे उन्हें सम्बोधित करते होंगे। पर कभी-कभी वे यह भी बोलते हैं कि मुन्ना तू तो ऐसे चुप हो गया जैसे साँप सूँघ गया हो तुझे। वे थोड़े तल्ख़ होकर कहते हैं। तेरे मुँह में ज़बान नहीं है क्या?  वे मानने को राजी ही नहीं कि ज़बान क्या मुन्ना भैया का तो मुँह ही नहीं है। मतलब मुन्ना भैया तो सारे के सारे ही नहीं हैं। पर पिता जी की ना मानने की सनक है तो है।

वे फिर बोले हैं, 

अँधेरे की तो आदमी को भी ज़रूरत है। कुछ पता भी है, स्किन में रिसेप्टर होते हैं रिसेप्टर, जो लाइट को पहचान कर आदमी के दिमाग को संदेश दे देते हैं। आँख बंद करने से कुछ नहीं होता, आँखें बंद हों और लाईट जली हो तो भी आदमी की स्किन दिमाग़ को बता देगी है कि अभी रौशनी है, अभी मत सो। रौशनी में तो गहरी नींद आदमी को आ ही नहीं सकती और फिर घेरती हैं हज़ार बीमारियाँ। तुम क्या जानों आदमी की स्किन कितनी चुगलख़ोर है, आदमी चतुर का बच्चा समझता नहीं है! बस खुद को ही समझता है तीस मारखाँ। वे आदिम बुजुर्ग की तरह सकल आदम जात को साधिकार झिड़कते हैं। वे लाइट ना जलाने के अपने पक्ष के समर्थन में कहते हैं कि तारों का प्रकाश कम से कम इतना तो होता ही है कि आदमी अंधेरी रात में भी, सामने पड़ी किसी चीज़ को देख सके। उससे बिना टकराए आ-जा सके। पर तुम तो बिजली ही इतनी जलाए रखते हो, तारों का प्रकाश तुम तक पहुँचेगा कैसे।

ओहो पिता जी! एक लाईट जली ही रह जाए तो क्या दिक्कत है आपको ? ऐसी क्या मजबूरी है जो अंधेरे में चले आदमी। मान लो कभी ना दिखे और आप टकरा जाएँ। चोट-फ़ीट लग जाएगी, लेने के देने पड़ जाएँगे किसी दिन, बता रहा हूँ। इस उमर में कोई हड्डी-वड्डी टूट गई तो जुड़ेगी भी नहीं।

नहीं, मैं नहीं टकराऊँगा।

वे अपने पक्ष में बोले हैं, पूरे आत्मविश्वास के साथ। वाकई वे आज तक, कभी, कहीं नहीं टकराए हैं। उनकी क़दमों की गिनती करने की तकनीक काफी कारगर है।

छोटे भैया ने समझाया है। आप नहीं तो कोई और टकरा सकता है पिता जी।

कोई और की कोई और जाने भई। मेरा दिमाग़ क्यों खराब करते हो…  बेवक्त प्रकाश के विरोध में, उनका यह आत्मविश्वास! क्या कहना।

उन दिनों नरमी के ब्याह की तैयारियाँ ही चल रही थीं। खूब म्यूज़िक बज रहा था, सब डांस कर रहे थे। यही कोई रात के बारह-साढ़े बारह बजे होंगे। पिताजी ने इसी तरह तब भी रात भर हंगामा किया था। हंगामा शब्द तो ख़ैर ठीक नहीं होगा, परंतु वह शनिवार की रात बहुत ही डरावनी थी।

पिता जी के अनुसार उस रात, सारे पेड़ धरती में समा गए थे। अपने सारे छोटे-बड़े बीजों तक को सीने से लगाकर। उनके अनुसार यह तो उन्होंने प्रत्यक्ष ही देखा था। जहाँ-जहाँ भी पेड़ थे, ठीक वहाँ-वहाँ, उनके नीचे धरती फटने लगी थी। सारे पेड़ अपनी जड़ के नीचे बने गड्ढे में गिरते जा रहे थे। गिरते नहीं, हौले से समाते जा रहे थे। उनकी जगह पल भर में सारी धरती पर ऊँची – ऊँची इमारतें उगती चली आई थीं। सारी धरती पर पेड़ों की जगह वे इमारतें ही दिखाई दे रही थीं । वे सब इमारतें एक-दूसरे के बेहद करीब उगी थीं। उतनी क़रीब जितने पेड़ भी एक – दूसरे के क़रीब नहीं थे। इतने करीब जिनके बीच से हवा भी नहीं जा सकती थी।

पिताजी ने वो सब खुद देखा था,जब पेड़ धरती में समा रहे थे तो पिताजी तेज-तेज जीना उतरकर घर से बाहर आ गए थे। कई पेड़ों की चोटियाँ पकड़कर गड्ढे में गिरने से रोकने का प्रयास भी किया था उन्होंने। पर कहाँ रोक पाए थे किसी एक भी पेड़ को। बस घर और आस-पड़ोस वालों को पुकारते ही रह गए थे, चीख-चीख कर। अंत में उन्हें लगा था कि अंतिम पेड़ मुन्ना भैया थे। जब वह धरती में समाते-समाते जरा सा ऊपर रह गया तो मुन्ना भैया का चेहरा था उसकी ऊपरी टहनियों पर। पिताजी ने उनका चेहरा पकड़कर उन्हें धरती में बने गड्ढे में समाने से रोकने की भरसक कोशिश की थी। पर सारी कोशिश बेकार गई। वह अंतिम पेड़ भी दरकी हुई जमीन में समा गया था। साथ ही मुन्ना भैया का चेहरा भी, उनके साथ ही सारी आदम जात भी। पिता जी विक्षिप्त से खड़े रह गए थे बस।

बड़ा बेटा यार-दोस्त जैसा हो जाता है। उस दिन पिताजी दुनिया में अपने बेटे के साथ-साथ यार-दोस्त विहीन भी हो गए थे। तभी तो निकली थी वह लम्बी सी चीख उनके मुँह से, जिसने छोटे भैया और घर भर की नींद को भी उड़ा दिया था। केवल हमारे घर भर की ही नहीं, उस दिन तो सारे आस-पड़ोसियों की नींद उड़ गई थी।

***

उस रात डॉक्टर दास, हमारे घर आए तो रात भर जा ही ना सके। वो पूर्णमासी की रात थी। डॉक्टर दास कहते हैं पूर्णमासी की रात दिमाग में भी ज्वार उठता है। ठीक वैसे ही जैसे समुद्र में। वे बताते हैं, दिमाग में भी तो उतने ही प्रतिशत पानी होता है जितना धरती पर समुद्र में। डॉक्टर दास ने विस्तार से चर्चा की थी उस रात। पिताजी और अम्मा की आँखों ने संसार को कितना बदलते देखा है। वे दोनों ही हैरान हैं। ठीक-ठीक कहें तो कन्फ्यूज़्ड हैं। बैलगाड़ी के लकड़ी वाले खड़खड़ाते पहियों को उन्होंने हवाई जहाज के रबड़ वाले टायरों में तब्दील होते देखा है। सरसों के तेल से जलने वाले मिट्टी के दीयों को दृष्टि चुँधिया देने वाली हाई पावर एल ई डी लाइट्स में बदलते देखा है। फूँस की झोपड़ियों को चालीस-पचास मंजिला इमारतों में बदलते देखा है। वे सहज कैसे रह पाएँगे? बदलाव के सौ बरस और निरीह पिताजी, बेचारी अम्मा। जैसे दोनों ही बुजुर्ग बदलाव के इन बरसों के भारी बोझ तले दबे पड़े हैं। मानव सभ्यता के विकास का यही तो समय रहा, जो अपनी तीव्रतम गति के साथ दौड़ा है। भले ही अब हाँफ ही क्यों ना रहा हो।  एक बात और, जब डॉक्टर दास यह सब बता रहे थे, हम यह भी ठीक-ठीक नहीं कह सकते कि  हम सबी वहाँ थे भी या नहीं, सब गड्ड-मड्ड है।

***

उस रात घर हम सब थक कर सो चुके थे। अम्मा अपनी, बिना नींद वाली नींद में बिना परकास के ही चुपचाप बिस्तर पर पड़ी थीं। उस रात पिता जी को नींद नहीं आ रही थी। वे अपने पलंग के पास रखी लाठी उठा कर ठक-ठक करते लघुशंका के बहाने बालकनी के अंतिम छोर पर बने बाथरूम तक चले गए थे। वे अपने कमरे के अटैच बाथरूम को शौच के लिए कभी प्रयोग नहीं करते।

आसमान की खुली छत से ना जाने क्या बरसा है। पिता जी वहाँ से दर्द और जलन के मारे बुरी तरह तड़पते हुए लौटे । उनके पूरे शरीर पर नीले-जामुनी रंग के चकत्ते पड़ गए। मुन्ना, मुन्ना चिल्लाते हुए वे वापस आए हैं । मुन्ना देख तो ये क्या बरसा आसमान से मेरे ऊपर। मेरा पूरा शरीर जल गया। मुझे बेहद दर्द हो रहा है मुन्ना।

वो पेड़, सबके सब धरती में समा गए ।  बादलों का सारा पानी ख़त्म हो गया मुन्ना, देख बादल में से क्या निकला। मैं जल गया। पिता जी अपनी जली हुई त्वचा मुन्ना भैया को दिखा रहे हैं। मुन्ना भैया यों तो उस रात धरती में समा गए थे उस पेड़ की ऊपरी फुनगियों पर रखे। लगता है पिता जी ने खुद देख कर भी विश्वास नहीं किया। वे अपनी पुरानी धुन में, अब भी उन्हें ही पुकारते हैं।

अगर पिता जी हमेशा मुन्ना भैया को ही पुकारते हैं, उनसे संवाद भी करते हैं। तो भी क्या मुन्ना भैया वाकई नहीं हैं ? ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता।

छोटे भैया डॉक्टर दास से पूछ रहे हैं, 

 

यह क्या है डॉक्टर दास ? 

क्या ये केवल पिता जी का मतिभ्रम मतलब हैल्युसिनेशन ही है ?

यार अंकल को कोरे हैल्युसिनेशन नहीं भी हो सकते संजय। डॉक्टर दास छोटे भैया से कह रहे हैं।

मतलब ? इस मतलब का उत्तर देने से पहले डॉक्टर दास जैसे गूँगे हो गए हैं। दरअसल नेचर को डॉक्टर दास ने बनाया तो है नहीं, जो वे सारे रहस्य जान सकें और सब कुछ ठीक-ठीक बता सकें। उन्होंने तो इंसानी दिमाग से सम्बंधित एक सीमित पाठ्यक्रम ही पढ़ा है बस। मुझे तो शक है कि हम सब वहाँ थे भी या नहीं डॉक्टर दास से पूछने के लिए।

***

बच्चे-बड़े हम सब बैठे हुए, पिता जी की ही बातें कर रहे हैं।  

दादू की एक बात बताऊँ बुआ? यह छोटे भैया की बेटी ऋचा है।

हाँ-हाँ बताओ। मैंने पूछा है।  

हमारे स्कूल-कॉलेज की छुट्टियाँ चल रही थीं। बहुत ही गर्मियाँ थीं उन दिनों। रातें ऐसी गरम जैसे सन अपनी सारी हीट अर्थ पर फेंक कर चला गया हो। दादू को बुरी तरह स्वेटिंग हो रही थी, इन फ़ैक्ट वे पूरे भीगे हुए थे। फिर भी दादू ए सी चलवाने के लिए मना कर रहे थे।

नहीं-नहीं ए सी मत चलाओ। अरे क्यों धरती की जान लेने पर आमादा हो। उन्होंने कहा और हम सब के सब हो-हो कर हँस पड़े।

दादू धरती में जान भी होती है ? चिंकी ने उन्हें छेड़ा। 

हाँ-हाँ अकल के दुश्मनों, पूरी जान होती हैं। कोई मुर्दा भी किसी को जिंदा रख सकता है क्या ? धरती तो तुम जैसे गँवारों के साथ-साथ, अरबों-खरबों जीव-जंतुओं को पालती है, जिंदा रखती है। बेवकूफों की तरह हें-हें कर रहे हो। कुछ पढ़ते-लिखते नहीं हो क्या तुम ?

उस दिन दादू ने जो हम सबकी वाट लगाई है, माई गॉड, बुआ!  इत्ती डाट लगाई ना हम सबकी कि पूछो ही मत। ऋचा तू चुप कर मैं बताता हूँ,यह अशेष बोला है। अशेष मुन्ना भैया का छोटा बेटा है और बहुत ही शैतान है।

बुआ मैं दादू से बोला, दादू किस दुनिया में जी रहे हो आखिर ?  ए सी आपको नहीं चाहिए। लाईट आपको नहीं चाहिए। थोड़ी वाइन चलेगी ? चिल करो, दादू चिल। मेरी मानो वाइन लेलो। पापा के साथ बैठकर पीना, अपने मुन्ना के साथ।

सच्ची कह रहा हूँ बुआ । वाइन के ऑफ़र पर दादू ने होठों ही होठों में थोड़ी सी स्माइल पास की । कुछ इस तरह कि कोई नोटिस ना कर ले। वो स्माइल उनके भीतर से निकली थी बुआ, मतलब उन्होंने पास की नहीं थी, उनसे सडनली पास हो गई थी।

मैं चाचा से बोला। 

चाचा दादू को वाइन चाहिए देखो आप, कैसे मुस्कुरा रहे हैं वाइन के नाम पर। और वो खूब ज़ोर से हँसा। उस दिन दादू खिसिया गए थे। सच्ची बुआ।

तो तुमने उन्हें वाइन दी या नहीं ? मैंने अशेष से पूछा।

ऋचा बोली।  हाँ-हाँ पापा ने दी थी रेड वाइन। और दादू खूब आराम से सोए। उस रात ना प्रकाश ज्यादा हुआ, ना अंधेरा कम पड़ा। सारे बच्चे हँस दिए ।

***

 

आज ही नरमी पहली बार अपनी ससुराल से घर आई है। सब उसकी बातों में व्यस्त हैं। मैं अगले दिन न्यू जर्सी वापस जाने वाली हूँ , तो मैं बातें करते-करते अपनी पैकिंग भी कर रही हूँ । आधी से ज्यादा रात बीत गई है, पिताजी को नींद नहीं आ रही।

वे घबरा कर मुन्ना भैया को पुकार रहे हैं। उस रात कोई तो था जिसने, तारे तो तारे, चाँद और सूरज तक को बंदी बना लिया था। धरती पर प्रकाश का कोई एक टुकड़ा भी नहीं छोड़ा था। घर घने अंधकार से भर गया था। बल्कि कहूँ तो केवल घर नहीं, संसार ही अंधेरे में डूब गया था। अम्मा की आवाज़ आ रही थी दूर कहीं सौ बरस पीछे से,

“अरे कोई  जरा सा परकास तो कर दो भले मानुसो।” 

फिर अचानक तेज रोशनी, सघन ताप और हवा गायब ! पिता जी तड़प उठे। उस दिन तो धरती की ऊपरी सतह जल कर पलट गई थी, वह जली हुई परत ऐसी लग रही थी जैसे किसी नववधू को दहेज के लोभियों ने मिट्टी का तेल छिड़ककर जला डाला था। उसका पूरा शरीर जल कर काला कोयला बन गया था। धरती की त्वचा ही क्या, भीतरी सतह भी जल गई है। उस दिन संसार को एक काल्पनिक वस्तु में परिवर्तित होते हुए पिताजी ने खुद देखा था। वे कह रहे थे कि वह धरती का अंतिम दिन है? ख़ैर यह तो पिता जी कह रहे थे,  मुझे कतई पता नहीं।

सारी धरती जंगल, पेड़-पौधों, झरनों, नदियों, तालाबों और समुद्र तक, सबसे खाली हो गई थी। उस बिना जंगलों वाली सपाट धरती से शेर, चीते, हाथी, भेड़िए, जंगली सूअर, नुकीले दाँतों वाले पीले बबून, खाली पड़े सवाना जंगलों से भागे आए थे। समुद्र की बड़ी मछलियाँ शार्क और व्हेल और भी ना जाने कौन-कौन से समुद्री जीव। हमारे शहर की ओर दौड़े चले आ रहे  थे। पिता जी डर  कर भागे, तो वे सब के सब उनके पीछे भागने लगे।

पिता जी बस भागते चले जा रहे थे, भागते चले जा रहे थे। इस तलाश में कि कहीं जंगल का कोई एक छोटा सा ही टुकड़ा हाथ आ जाए। जहाँ बस कुछ दूर तक तो पेड़-पौधे, झाड़-झंकाड़ हों ताकि पिता जी के पीछे दौड़ते जानवर वहाँ शिकार करने लगें और पिता जी उन्हें चकमा देकर भाग सकें। वे मनुष्य को गालियाँ दे रहे हैं। मूर्खों ने सारे जंगल काट डाले, हवा-पानी सब खराब कर दिए, जीव-जंतुओं की जरा परवाह नहीं की। अब कोई चारा नहीं। खुद तो मरेंगे ही मुझे भी मारकर ही छोड़ेंगे।

इंसान को कोसते, वे मीलों भागते रहे, भागते रहे परंतु उन्हें धरती पर जंगल का पेड़-पौधों वाला कोई एक टुकड़ा भी दिखाई नहीं दिया। सारे जानवर उनके पीछे बदहवासी में दहाड़ते, गुर्राते दौड़े चले आ रहे हैं । हालाँकि इस दिन पिताजी  बूढ़े नहीं हैं, इस दिन वे ना जाने कैसे युवा हो गए हैं, एक ऐसे युवा  जिसमें  अथाह बल है, जो मीलों भाग सकता है। भागे भी तो हैं । पर जानवरों के पास ताक़त अधिक है, रफ़्तार भी। वे किसी ताकतवर से ताकतवर युवा से भी अधिक भाग सकते हैं। और फिर हवा ने भी तो साथ नहीं दिया है। पिता जी हैरान हैं कि जानवर कैसे दौड़ रहे हैं आखिर! हवा तो इन जानवरों को भी चाहिए ही।

पिता जी उस दिन को याद कर रहे हैं जब वे चिल्ला रहे थे। मुन्ना देख तो ये कौन लोग हैं । कौन हैं देख, जो धरती की सारी हवा को गुब्बारों में भर कर ले जा रहे हैं। अगर वे लोग धरती की सारी हवा ले गए तो हम बिना हवा के कैसे जिएँगे। मुन्ना, ए मुन्ना…

मुन्ना भैया अगर जीवित होते तो, पिता जी से पूछते तो ज़रूर ही कि पिताजी अभी आप और कितने बरस जीने की तमन्ना रखते हो ?  क्या – क्या और किस – किस को धरती में समाते देखना चाहते हो आखिर ? प्लीज बताओ तो…

उनके सोचने से उनकी रफ्तार धीमी पड़ गई है, इसलिए उन्होंने भागने पर ध्यान दिया है।

अंत में उन्हें लगा कि वे अकेले नहीं है। उनके साथ दुनिया के सब युवा भाग रहे हैं। जानवरों की संख्या भी अचानक कई गुना बढ़ गई है। जंगलों के सारे जानवर पिता जी सहित दुनिया भर के युवाओं के पीछे भाग रहे हैं, भागते-भागते लगा कि उनके पैरों में जैसे कोई बोझ बाँध दिए गए हैं। जानवर हैं कि हवाओं की रफ़्तार से दौड़े चले आ रहे हैं।

एड़ी-चोटी का जोर लगा कर भी पिता जी और उनके साथ भागने वाले दुनिया भर के युवा, खुद को बचा नहीं सकेंगे। वे समझ गए हैं। वे अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए एक-दूसरे का हाथ पकड़कर भाग रहे हैं। जानवर एक-एक कर दुनिया भर के युवाओं को दबोचकर भागते जा रहे हैं। इस तरह एक-एक कर हाथ छूटते जा रहे हैं। सभी को जानवरों ने दबोच लिया है। अंतिम पिता जी ही बचे हैं। वे जानते हैं कि अब उनके लिए भी बस पल भर ही शेष है… इस बार पिता जी ने मुन्ना भैया को नहीं, अम्मा को पुकारा है। और हम सब पिताजी को पुकारते रह गए हैं…

 

 

 

 

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