रक्षा का वह बन्धन कहां

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हरी राम यादव, अयोध्या (उ. प्र.)

           रक्षा का वह बन्धन कहां

हमारा देश भारत विभिन्न जातियों, धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं, संस्कृतियों और बोलियों का देश है। देश के कण-कण में रची बसी अनेकता के कारण सभी धर्मों और सम्प्रदायों के अपनी-अपनी मान्यता और परम्परा के अनुसार त्यौहार भी हैं। हमारी भारतीय धर्म संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का त्यौहार एक ऐसा ही त्यौहार है जो कि सावन महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्यौहार भाई-बहन के स्नेह बंधन का त्यौहार है। इस दिन बहनें अपने भाईयों को राखी का सूत्र बांधती हैं और भाई अपनी बहन की रक्षा का वादा करते हैं।

यदि हम इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की बात करें तो इतिहास में श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कहानी प्रसिद्ध है, जिसमें युद्ध के दौरान श्री कृष्ण की उंगली में चोट लग गई थी। श्री कृष्ण की इस चोटिल उंगली को जब द्रौपदी ने देखा तो उन्होंने तुरन्त अपनी साड़ी को फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बाँध दिया था। श्रीकृष्ण जी ने द्रौपदी को हमेशा सहायता करने का वचन दिया था। श्रीकृष्ण जी ने अपने बचन को बड़ी शिद्दत के साथ उस समय निभाया भी, जब भरी सभा में दुर्योधन और दुशासन के द्वारा उनको निर्वस्त्र किया जा रहा था। द्रौपदी की एक ही पुकार पर श्रीकृष्ण ने साड़ी का अंबार लगा दिया। दुशासन खींचते खींचते थक गया लेकिन साड़ी के ओर छोर कोई पता नहीं लगा।

रक्षाबंधन के ऐतिहासिकता के साथ एक दूसरी कहानी प्रचलित है जो कि राजस्थान के मेवाड़ की रानी कर्मवती से जुड़ी हुई हैं। मेवाड़ की रानी कर्मावती को अपने गुप्तचरों से सूचना मिली थी कि बहादुरशाह मेवाड़ पर हमला करने वाला है। रानी बहादुर शाह के सामने स्वयं को लड़ऩे में असमर्थ पा रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने राज्य और जनता के हित को ध्यान में रखकर मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेज कर राज्य की रक्षा के लिए कहा। हुमायूँ ने राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए रानी कर्मवती व उनके राज्य की रक्षा की।

रक्षाबंधन के इस पावन त्यौहार के संबंध में एक तीसरी कहानी जो प्रचलित है वह है सिकन्दर की पत्नी और हमारे देश के राजा पुरूवास की। सिकन्दर की पत्नी ने राजा पुरूवास को राखी बाँधकर अपना मुँहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकन्दर को न मारने का वचन लिया। राजा पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बँधी राखी का मान रखा और अपने दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकन्दर को युद्ध में जीवन दान दिया।

बहरहाल हमारे देश में रक्षा बंधन के पर्व की जो भी ऐतिहासिकता रही हो और जो भी सामाजिक और धार्मिक कारण रहे हों, उनका सबका उद्देश्य नारी समाज की बेहतरी था। अगर हम आज से चालीस साल पीछे मुड़कर देखें तो पाएंगे कि गांव के समाज में बहिनों का बहुत सम्मान था। गांव की किसी की भी बेटी पूरे गांव की बेटी होती थी। आज समाज में महिलाओं के साथ जो हत्या और बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं, वह न के बराबर थीं। जातीयता और धार्मिकता से भरे गंदे चुनावी माहौल के कारण समाज का टूटना महिलाओं के संग हो रहे अत्याचार के लिए मुख्य रूप से दोषी है।

आज समाज का वह माहौल हो गया है कि यदि किसी बेटी के साथ कुछ ग़लत होता है और वह बेटी अपने जाति, धर्म, समाज, दल की विचारधारा को मानने वाले परिवार से हैं तो सड़क से लेकर संसद तक खूब हल्ला मचाओ, धरना दो, प्रदर्शन करो, नारेबाजी करो। लेकिन पीड़ित यदि बेटी दूसरे जाति, धर्म, समाज, दल की विचारधारा को मानने वाले परिवार से हैं तो एकदम चुप रहो। यह केवल समाज ही नहीं राज्य और राष्ट्र की सरकारों में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों में भी है। जहां पर किसी दल की सरकार है और वहां महिलाओं के साथ बलात्कार और हत्या जैसे घृणित कर्म होते हैं तो सत्ता में बैठे लोग हर संभव कोशिश करते हैं कि बात जनता तक न पहुंचे, उसे सत्ता के बल पर दबा दिया जाय। सरकारी मशीनरी उसे दबाने के लिए जुट जाती है। यदि अपराधी सत्ता दल का हुआ तो फिर क्या कहने हैं उसको बचाने के लिए सरकार के मुखिया तक लग जाते हैं। तब वह यह भूल जाते हैं कि वह एक संवैधानिक पद पर बैठे हैं, वह किसी दल , जाति, धर्म के नहीं बल्कि जनता के मुखिया हैं।

महिला उत्पीडन में बढ़ोतरी के लिए समाज के बाद चुनाव, राजनेता, राजनीतिक दल और मीडिया चारों सबसे बड़े जिम्मेदार हैं। स्वयं को राजनेता कहने वाले ज्यादातर लोग अपनी काबिलियत और काम के बल पर नहीं बल्कि जाति, धर्म , सम्प्रदाय, विषवमन और रेवड़ी कल्चर के बल पर चुनाव जीत कर आते हैं। ऐसे में वह कैसे किसी भी बेटी के साथ निष्पक्ष खड़े हो सकते हैं। उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता पहले होती है, पीड़ित बेटी की बाद में। यह दोहरी मानसिकता महिलाओं के हितों के साथ खड़ा होने के लिए सबसे घातक है। हमारे देश की विज्ञापन पोषित मीडिया भी राजनीतिक लोगों की ही तरह काम करती है। वह भी अपना नफा नुकसान देखकर ही पीड़ित महिलाओं के पक्ष में खड़ी होती है।

यदि हम महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों पर राष्ट्रीय महिला आयोग की महिला उत्पीडन और घरेलू हिंसा से संबंधित इस साल की रिपोर्ट देखें तो अब तक राष्ट्रीय महिला आयोग को कुल 12600 शिकायतें मिली हैं । इन 12600 शिकायतों में से उत्तर प्रदेश से 6470 , दिल्ली से 1113, महाराष्ट्र से 762, तमिलनाडु से 301, कर्नाटक 305, बिहार 584, मध्य प्रदेश 514, हरियाणा 509, राजस्थान 408, पश्चिम बंगाल से 306 शिकायतें हैं। एन सी आर बी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ कुल 445,256 अपराध के मामले दर्ज किए गए, जो 2021 में दर्ज 428,278 से चार प्रतिशत अधिक है।

महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचार में दिन प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है। अपराध रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं। यह तब है जब थानों में अपराध न के बराबर दर्ज किए जाते और महिलाओं को या तो रिपोर्ट को दर्ज करवाने के लिए न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है या आत्मदाह करने जैसा जघन्यतम कदम उठाने को मजबूर होना पड़ता है। समाज अब समाज न होकर राजनीति का अखाड़ा हो गया है। लोगों के दिल दिमाग को राजनीतिक लोगों ने गुलाम बना लिया है और इस गुलामी की सजा सबसे ज्यादा महिलाओं को भुगतनी पड़ रही है। जब तक समाज का हर पुरुष हर महिला को अपनी बहिन और बेटी नहीं समझेगा तब तक महिलाओं पर रोज हो रहे अत्याचार बंद नहीं होंगे और ऐसे माहौल में महिला दिवस, कन्या पूजन और रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार केवल दिखावा मात्र हैं। इन त्योहारों की प्रासंगिकता तब है जब हम “यत्र नार्रयस्तु पूज्यंते , रमंते तत्र देवता” जैसे वेदवाक्य के साथ खड़े होने का दम रखते हों। श्रीकृष्ण जैसे वचन को पूरा रखने का दिल रखते हों और राजा पुरूवास जैसे योद्धा की तरह दिमाग रखतें हों जिन्होंने अपने दुश्मन की पत्नी को भी दिया बचन बहन मानकर पूरा किया।

 

 

 

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