विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गुरु वंदना
अंधेरों में ज्ञान की ज्योति जला दे जो गुरु हैं वो,
भटके हुए मुसाफिर को राह दिखा दे जो गुरु हैं वो,
पहचान कर प्रतिभा को निखारा करते हैं जो,
हाथ संभार अंदर चोट बाहर करे जो गुरु हैं वो !!
गुरु विश्वामित्र ना होते तो राम श्रीराम ना बन पाते,
अर्जुन ना सर्वश्रेष्ठ बनते जो द्रोणाचार्य ना मिल पाते,
श्रद्धा हो एकलव्य सी मूर्ति भी गुरु सा ज्ञान देती है,
तराशते ना चाणक्य जो चंद्रगुप्त सम्राट ना बन पाते !!
इंद्रभूति गौतम ने आज ही जब महावीर का दर्शकिए,
मान गलित हुआ सभी वै मुनिपद
स्वीकार सहर्ष किए,
तिरेषठ ऋद्धि प्रगट हुई तत् गणधर पद पे आसीन हुए,
पावन हुआ पर्व गुरू शिष्य परम्परा का प्रस्तुत आदर्श किए !!
कुछ बनना चाहो तो ये जीवनगुरु को
अर्पित कर दो,
बिना किसी संदेह के ये तन मन सब समर्पित कर दो,
शिरोधार्य हो गुरू की आज्ञा चाहे प्राण ओ तन जाए,
उपकार सदा मानो गुरु का वाणी को सारगर्भित कर दो !
स्व पर ज्ञान की ज्योति जला तमस मिटाते हैं शिक्षक,
अंधियारी रात्रि में ज्ञान का दीप जलाते हैं शिक्षक,
चुनौतियों से लोहा लेते जीत का मंत्र सिखाते हैं,
असत्य के भ्रम दूर भगा सन्मार्ग दिखाते हैं शिक्षक!
यूं तो मात पिता शिशु के प्रथम गुरू कहलाते हैं,
पर गुरु शिष्यों के प्रति सच्चा मातृधर्म निभाते हैं,
अंतर हाथ धरे बाहर से चोट अनुशासन रूप करें,
अनगढ़ माटी को ज्ञान आकार दे पवित्र घट बनाते हैं!
शिष्यों में नैतिक मूल्यों को पल्लवित करते हैं शिक्षक
विद्वत्ता संग सद्चारित्र को आरोहित करते हैं शिक्षक,
स्वस्थ राष्ट्र समाज निर्माण में नींव का पत्थर बनते हैं,
लौकिक पारमार्थिक विद्या में पारंगित करते हैं शिक्षक !!
देवतुल्य पुनीत ओज पुंज शिष्य हितैषी विमल वाणी,
धीर गंभीर सौम्य अनुशासित उत्प्रेरक
ऊर्जित प्राणी,
गुण अनंत हैं इनमें संभव नहींशब्दों में कह पाना,
आदर्श प्रस्तोता शिष्यों हेतु तपोरत्ता ज्ञानी ध्यानी!!
शिष्य गुरु का मानव जीवन मेंअद्भुत नाता है,
हर विद्यार्थी गुरु चरणों में श्रद्धा सुमन चढाता है,
एक दूजे के पूरक दोनों मान सम्मान बढ़ाते हैं,
गुरुवाणी आत्मसात कर भारत विश्व गुरु कहलाता है!!
गुरु ही दीप, गुरु ही बाती,
गुरु ही ज्योति अपार हैं,
गुरु से ही जीवन के सारे सुंदर होते संस्कार हैं,
जिनके चरणों में झुककर मिट
जाता मन का अज्ञान,
गुरु के द्वारे ही जग में मिलते सत्य के द्वार हैं।
जो गिरने पर हर बार हमें फिर से
चलना सिखलाते हैं,
हार के बाद भी जीत का विश्वास सदा जगाते हैं, अनुभव रूपी अमृत दे जीवन धन्य कर देते हैं,
ऐसे गुरुवर सचमुच ईश्वर का ही रूप कहलाते हैं।
गुरुवर तुमसे ही जीवन में भक्ति
का विस्तार हुआ,
मन का सूना मंदिर भी गुरु नाम से साकार हुआ,
तेरी कृपा की एक किरण जब मेरे
अंतस में उतरी,
तब से हर श्वास में मेरा केवल तेरा सार हुआ।
गुरु ही गंगा, गुरु ही यमुना, गुरु ही
मुक्ति धाम हैं,
गुरु ही मेरे महावीर हैं, गुरु ही मेरे राम हैं,
उनकी वाणी जिनवाणी है, उनका चिंतन
ध्यान है,
गुरु चरणों में ही बसता मेरा सारा सम्मान है।
गुरुवर! तुम सम्यक् दर्शन के प्रथम प्रभात
समान हो,
मोह-अँधेरे हरने वाले निर्मल दिव्य विहान हो,
तेरे चरणों में झुककर पाया आत्मा का
पावन पथ,
तुम ही मेरे पथ-प्रदर्शक, तुम ही परम स्थान हो।
गुरु चरणों की धूलि से मन का कलुष
उतर जाता है,
उनकी कृपा के एक कण से ही जीवन
निखर जाता है,
जिस पर होती दृष्टि गुरु की, वह धन्य-धन्य
हो जाता है,
सूखा उपवन भी उनके आशीषों से पुन:
संवर जाता है।
गुरु कृपा से बुद्धि में विवेक का सूरज उगा
जाता है,
ज्ञान के निर्मल गंगाजल से मन का मैल
बहा जाता है,
जिसके जीवन में गुरु का आशीष सदा
बना रहता ,
उसके जीवन का हर संघर्ष स्वयं ही झुका
जाता है।
गुरु बिना यह ज्ञान अधूरा, गुरु बिना
सम्मान कहाँ,
गुरु से ही मिलता जीवन को सच्चा
आत्मज्ञान यहाँ,
तन, मन, वाणी, कर्म सभी जब गुरु
चरणों में अर्पित हों,
तब जाकर मिलता मानव को जीवन
का वरदान वहाँ।
जब-जब मन भ्रम के जंगल में राह
भटकने लगता है,
तब गुरु का विश्वास हृदय में दीपक
बनकर जगता है,
सच्चे गुरु का साथ मिले तो जीवन धन्य
हो जाता है,
पत्थर जैसा साधारण मन भी हीरा बन
चमकता है।
गुरु की वाणी अमृत बनकर मन
की प्यास बुझाती है,
सूनी राहों में भी चलने का साहस हमें
दिलाती है,
भाग्य नहीं, पुरुषार्थ लिखो—यह मंत्र
दिया जिसने,
गुरु की हर शिक्षा जीवन को स्वर्णिम
पथ दिखलाती है।
गुरु के चरणों में झुककर जब अपना
शीश नवाया है,
तब जाकर जीवन का सच्चा अर्थ समझ
में आया है,
ईश्वर को तो बाद में जाना, पहले गुरु
को पाया है,
जिन्होंने मेरे भीतर बैठा परमात्मा दिखाया है।
मिट्टी था मैं, गुरु ने मुझको घट सा मंगल
आकार दिया,
बिखरे हुए स्वप्नों को फिर जीने का
आधार दिया,
जो हूँ, जितना भी हूँ, सब उनकी ही
कृपा का फल है,
गुरु ने अपने हिस्से का भी मुझको
सारा संसार दिया।
गुरु कृपा से ही भवसागर का पथ
सरल हो जाता है,
पत्थर जैसा कठोर हृदय भी निर्मल
जल हो जाता है,
अहंकार का अंधकार जब गुरु-दृष्टि
से मिट जाता,
तब जीव स्वयं परमात्मा सम उज्जवल
हो जाता है।
मन-मंदिर में गुरु विराजें, दीपक-सी
मुस्कान लिए,
ज्ञान, विद्या और सुधा प्रमाण का अमृतमय वरदान लिए।उनको देखूँ तो लगता है ईश्वर स्वयं पधारे हैं,
मानव तन में दिव्य चेतना का श्रेष्ठतम
स्थान लिए!
गुरु की महिमा शब्दों में कब पूरी लिखी
जा पाती है,
उनकी करुणा से सूनी बगिया फिर खिल
जाती है।
प्रभु का दर्शन दुर्लभ हो पर, गुरु का
सान्निध्य मिले यदि,
उनकी छाया में ही जीवन की नैया
पार लग जाती है॥
हृदय-वेदिका पर गुरु विराजें,
आराध्य स्वरूप महान,
उनकी कृपा से खिल उठता है जीवन का हर एक विहान। प्रभु तक जाने वाले पथ का प्रथम चरण हैं गुरुवर,
उनको अर्पित तन-मन-जीवन,
उनको अर्पित मेरे प्राण॥







