संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
संकल्प, संघर्ष और समर्पण: बदलाव की राह दिखाती तीन अनूठी कहानियाँ।
इंसानी जज्बे के सामने जब दृढ़ संकल्प खड़ा हो जाए, तो कोई भी रुकावट बड़ी नहीं रहती। हमारे समाज में लगातार ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जो यह साबित करती हैं कि नीयत साफ़ और इरादे मजबूत हों तो साधनहीनता भी राह का रोड़ा नहीं बन सकती। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और मुंबई से आई तीन अलग-अलग कहानियाँ इसी अदम्य साहस और सकारात्मकता की मिसाल पेश करती हैं।
पर्यावरण संरक्षण की एक अनोखी मिसाल मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में देखने को मिली। यहाँ के 20 वर्षीय बीएससी छात्र सुरेंद्र सिंह चौधरी, जिन्हें सोशल मीडिया पर लोग ‘बिट्टू तबाही’ के नाम से जानते हैं, ने अपने क्षेत्र की अजनार नदी को गंदगी और प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने का बीड़ा उठाया। इस अभियान की शुरुआत उन्होंने गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी के दिन अपने साथियों के साथ मिलकर की थी। लेकिन नदी की अत्यधिक दुर्गंध और कीचड़ के कारण धीरे-धीरे उनके साथियों ने उनका साथ छोड़ दिया। इसके बावजूद सुरेंद्र ने हार नहीं मानी और अकेले ही हाथों में दस्ताने व कचरा खींचने वाले उपकरण लेकर नदी में उतर गए। गंदे पानी के कारण उन्हें त्वचा का संक्रमण भी हुआ और शुरुआत में लोगों ने उनका उपहास भी उड़ाया, लेकिन उन्होंने अकेले ही कई महीनों की मशक्कत से नदी के विभिन्न घाटों को पूरी तरह से साफ़ कर पानी के प्राकृतिक बहाव को बहाल कर दिखाया। उनके इस निस्वार्थ प्रयास की सराहना देश-विदेश में हुई और नीदरलैंड्स की प्रसिद्ध संस्था ‘द ओशियन क्लीनअप’ के संस्थापक ने भी उनके काम को सराहा।
इसी प्रकार, मातृत्व के त्याग और समर्पण की एक हृदयस्पर्शी कहानी महाराष्ट्र के बीड जिले के अंबाजोगाई क्षेत्र से सामने आती है। यहाँ की रहने वाली 47 वर्षीय विधवा महिला रमाबाई रणवीर घरों में खाना बनाकर अपना और अपनी दो बेटियों का पालन-पोषण करती हैं। जब उन्हें अपनी बेटी की पढ़ाई और रहने के खर्च के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी, तब उन्होंने एक स्थानीय मैराथन प्रतियोगिता में भाग लेने का फैसला किया। पारंपरिक साड़ी पहने और पैरों में साधारण चप्पल डालकर दौड़ीं रमाबाई की चप्पलें रास्ते में गीली मिट्टी के कारण फिसलने लगीं, तो उन्होंने चप्पलें हाथ में ले लीं और बिना किसी खेल के जूतों के नंगे पैर ही लगभग 3 किलोमीटर की दौड़ पूरी की। अपनी बेटियों की शिक्षा के लिए दौड़ रही इस माँ ने पहला स्थान हासिल कर ₹3,000 की पुरस्कार राशि जीती, जिसे आयोजकों ने उनके समर्पण को देखकर बढ़ाकर ₹5,000 कर दिया। इस राशि का उपयोग उन्होंने अपनी बेटियों की कॉपियों, किताबों और पढ़ाई के खर्च के लिए किया।
सकारात्मकता और कड़ी मेहनत का तीसरा रूप व्यावसायिक सफलता में देखने को मिलता है। वर्ष 1954 में दादाजी द्वारा स्थापित ‘रीगल शूज’ की नींव से शुरू हुआ कारोबार एक साधारण शुरुआत थी, जो मुंबई के हीरा पन्ना शॉपिंग सेंटर में महज 100 वर्ग फीट की छोटी सी दुकान के रूप में आगे बढ़ा। इस पारंपरिक व्यवसाय में 1998 में नई सोच लेकर आए परिवार की तीसरी पीढ़ी के भाई-बहन—अल्मास नंदा और अमीन विरजी। उन्होंने महिलाओं के लिए आरामदायक और फैशनेबल फुटवियर की कमी को पहचाना और ‘Inc.5′ नामक ब्रांड लॉन्च किया। गुणवत्ता, अंतरराष्ट्रीय डिजाइन और बेहतरीन ग्राहक अनुभव के दम पर इस छोटे से विचार ने बड़ा रूप लिया। वर्ष 2001 में मूल कंपनी और नए ब्रांड का विलय किया गया, और आज बिना किसी अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के केवल कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के बल पर यह व्यवसाय लगभग 240 से 270 करोड़ रुपये के सालाना टर्नओवर वाली एक बेहद सफल कंपनी बन चुका है।
ये तीनों ही घटनाएँ दर्शाती हैं कि चाहे जल संरक्षण का व्यक्तिगत प्रयास हो, औलाद की पढ़ाई के लिए नंगे पैर दौड़ती माँ का संघर्ष हो या 100 वर्ग फीट की दुकान से करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने वाली उद्यमिता हो—जब इंसान अपनी मेहनत पर भरोसा करता है, तो वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।







