राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
रिस्पॉन्सिबल फूफा जी !
(व्यंग्य)
भारतीय परिवारों (खासकर उत्तर भारत के हिंदी भाषी इलाकों) में फूफा जी मजाक का पसंदीदा पात्र इसलिए बन गए हैं. क्योंकि वे एक बहुत ही खास और रिलेटेबल स्टीरियोटाइप व्यक्ति बन गए हैं। इसकी मुख्य वजहें हैं, दरअसल फूफा जी याने रिटायर्ड जीजा वाली स्थिति जब बुआ की शादी होती है तो उनका पति जगत “जीजा” होता है । नया-नया दामाद, खूब खातिरदारी, आगे की कुर्सी, सब कुछ मनमाफिक,,,
समय बीतने के साथ जब वह भतीजे-भतीजी का फूफा बन जाता है, तो वैल्यू थोड़ी कम हो जाती है। लेकिन फूफा जी अभी भी उसी पुराने जीजा वाला ट्रीटमेंट/ इज्जत चाहते हैं।
जब नहीं मिलता / मिलती तो मुंह फुला लेते हैं, यही “नाराज फूफा” वाला किरदार पैदा होता है। इन्हीं को हर अच्छी बुरी के लिए रेस्पॉन्सबल मान लिया जाता है।
इतिहास गवाह है कि फूफा जी अर्थात VIP प्रोटोकॉल की उम्मीद आगे की सीट चाहिए, कोई काम नहीं करवाना (“फूफा जी आराम करिए”) शादी-ब्याह में खास इज्जत, थोड़ी-सी लापरवाही पर रूठ जाना। यह सब इतना कॉमिक और रिलेटेबल है कि चुटकुलों, स्किट्स और स्टैंड-अप में बार-बार इस्तेमाल होता है।
फूफा, परिवार का अघोषित “स्थायी विपक्ष”
न तो घर के अंदर का सदस्य है (जैसे चाचा-ताऊ), न पूरी तरह बाहरी वह बीच का रिश्ता या घड़ी का पेंडुलम होता है जो हमेशा थोड़ा नाराज, थोड़ा प्रोटोकॉल वाला और थोड़ा ड्रामा करने वाला लगता है। शादियों में तो वह अक्सर “विलेन” या “कॉमिक रिलीफ” दोनों बन जाता है।
फूफा नामक प्राणी हर घर / परिवार में मिल जाता है। ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवारों में कम से कम एक ऐसा फूफा जरूर होता है जो देर से आता है, डांस करते समय ताली नहीं बजने पर नाराज़ हो जाता है या फिर बिना बताए आ जाता है और फिर शिकायत करता है कि साले उसका सम्मान नहीं करते साली बदल गई है। इसी वजह से यह इतना यूनिवर्सल मजाक बन गया है कि कहीं कहीं तो ससुराल पहुंचने पर सेवा निवृत्त जीजा और तथाकथित फूफा जी को देखकर सभी के कान कुत्तों जैसे खड़े हो जाते हैं।
वास्तव में फूफा जी को मज़ाक का पात्र इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वे प्यार भरे ड्रामा के जीवंत उदाहरण हैं। परिवार वाले उन्हें चिढ़ाते हैं, लेकिन असल में उनका आवश्यकता अनुसार मान भी रखते हैं। यही वजह है कि “नाराज फूफा” अब राजनीतिक भाषा में भी घुस गया है, तो अगली बार जब कोई फूफा जी पर जोक सुनाए, तो समझ लेना यह सिर्फ मजाक नहीं, भारतीय परिवार की बहुत पुरानी और प्यारी हकीकत है।
हम लोग भी किसी न किसी के फूफा जी हैं पर हमारी सच्चाई कुछ अलग है पहले गरीब सास- ससुर पर रहम करना, दूसरे साली / सालों को सगे भाई / बहिन से ज़्यादा ख़र्च करना। शादी में आगे रहो, खर्च करो, भतीजे/ भतीजी पैदा होने से उनके पढ़ने तक जी भरकर खर्च करना, लेकिन फूफा जी क्या बुआ पर मुसीबत आ जाए तो स्वार्थी भाई जीजा जी को नैतिकता का ज्ञान देगा,, और ससुराल में गलती कोई भी करें,, तो छछूंदर भतीजा कहेगा,, फूफा जी यू आर रिस्पॉन्सिबल ,,,






