संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
राख का वो काला तूफान जिसने ढहा दिए दो विशाल साम्राज्य

वर्ष 536 ईस्वी में आइसलैंड या उत्तरी अमरीका के ज्वालामुखीय विस्फोट और वर्ष 540 ईस्वी में एल साल्वाडोर के इलोपांगो (Ilopango) महाविस्फोट ने धरती को विशाल सल्फर डाइऑक्साइड और राख की चादर से ढंक दिया। सूरज की रोशनी महीनों तक बेअसर रही और वैश्विक तापमान में 1.5 से 2.5 डिग्री सेल्सियस की गिरावट आई, जिसने ‘लेट एंटीक लिटिल आइस एज’ को जन्म दिया। इस अचानक आए जलवायु परिवर्तन ने फसलों को तबाह कर दिया और दुनिया भर में अकाल व बीमारियों का दौर शुरू कर दिया।
इसके गंभीर सामाजिक और राजनीतिक परिणाम देखने को मिले। पूर्वी रोमन यानी बाइजेंटाइन साम्राज्य में सम्राट जस्टिनियन प्रथम के काल में 541 ईस्वी में “जस्टिनियन प्लेग” फैला, जिसने भुखमरी से बेहाल आबादी का एक-तिहाई हिस्सा खत्म कर दिया। यद्यपि साम्राज्य तुरंत पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था और सैन्य शक्ति पूरी तरह चरमरा गई। दूसरी ओर, भारत में गुप्त साम्राज्य, जिसकी कमान उस दौर में कुमारगुप्त तृतीय जैसे शासकों के हाथों में थी, पहले से ही हूणों के आक्रमण झेल रहा था। इस प्राकृतिक आपदा ने कृषि उत्पादन और व्यापार-वाणिज्य को ध्वस्त कर दिया, जिससे केंद्रीय वित्तीय तंत्र बिखर गया और स्थानीय सामंत शक्तिशाली होकर स्वतंत्र हो गए।
यह ऐतिहासिक घटना इस सत्य को रेखांकित करती है कि प्राकृतिक और भौगोलिक परिवर्तन विश्व इतिहास की दिशा बदलने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। जब-जब पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है, तब-तब बड़े-बड़े साम्राज्य, सभ्यताएं और उनके आर्थिक ढांचे धाराशायी हो जाते हैं। इतिहास केवल इंसानी युद्धों या नीतियों से ही नहीं बनता, बल्कि प्रकृति के विनाशकारी थपेड़े भी महान साम्राज्यों के उत्थान और पतन की पटकथा लिखते हैं। 536 ईस्वी को विश्व इतिहास का सबसे काला वर्ष कहा जाता है।







