संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
प्रथम पूज्य श्री गणेश: वैदिक काल से सार्वजनिक पंडालों तक का प्रामाणिक ऐतिहासिक सफर।

ऋग्वेद के प्राचीन मंत्र ‘गणानां त्वा गणपतिं हवामहे’ (हम गणों के स्वामी गणपति का आवाहन करते हैं) में भले ही भगवान गणेश का शुरुआती स्वरूप छिपा हो, लेकिन एक गजमुख और एकदंत देवता के रूप में उनका स्पष्ट भौतिक और पुरातात्विक स्वरूप कुषाण काल (पहली से तीसरी शताब्दी) की मथुरा कला में सबसे पहले उभर कर सामने आता है। इस दौर की मूर्तियों में गणेश जी को पहली बार उनके खास स्वरूप में देखा गया, जहां वे अपने हाथ में मिठाइयों का प्याला लिए हुए नजर आते हैं। इसके बाद गुप्त काल के दौरान उनका यह स्वरूप भारतीय जनमानस में गहराई तक उतर गया। मध्य प्रदेश के उदयगिरि की गुफा संख्या 6 (लगभग 401 ईस्वी) की चट्टानों पर उकेरी गई गणेश जी की मूर्ति इतिहास की सबसे प्राचीन और स्पष्ट रॉक-कट मूर्तियों में से एक है, जिसमें वे बड़े कान और मोदक के साथ दर्शाए गए हैं। इसी स्वर्ण युग में भूमरा (गुमराह) के प्रसिद्ध शिव मंदिर में भी उनकी एक बेहद मनमोहक और अलंकृत प्रतिमा स्थापित की गई, जो आज भी उस दौर की बेजोड़ मूर्तिकला की गवाही देती है।
भारत की सीमाओं से बहुत दूर, 6वीं शताब्दी के दौरान अफगानिस्तान के गर्देज़ शहर में ‘महाविनायक’ की एक बेहद खूबसूरत संगमरमर की मूर्ति स्थापित की गई थी। हिंदू शाही वंश के राजा खिंगल द्वारा स्थापित इस मूर्ति में गणेश जी को एक शक्तिशाली और भव्य रूप में उकेरा गया था, जो साबित करता है कि प्राचीन काल में ही गजानन की महिमा मध्य एशिया तक फैल चुकी थी। दक्षिण भारत की ओर चलें, तो 6वीं सदी में चालुक्य राजाओं द्वारा बनवाई गई बादामी की गुफाओं (गुफा संख्या 1) में नटराज के ठीक बगल में भगवान गणेश की शानदार रॉक-कट मूर्ति विराजमान है। इसके बाद राष्ट्रकूटों के समय में महाराष्ट्र की एलोरा गुफाओं ने इस कला को चरम पर पहुंचा दिया।
एलोरा की गुफा संख्या 14 (रावण की खाई) और गुफा संख्या 16 (प्रसिद्ध कैलाश मंदिर) की ठोस चट्टानों को काटकर गणेश जी की बेहद जीवंत और विशाल प्रतिमाएं गढ़ी गईं। अरब सागर के बीच स्थित एलीफेंटा की गुफाओं (5वीं-7वीं सदी) में भी शिव परिवार के विशाल भित्ति चित्रों के साथ गणेश जी को बेहद भव्यता से उकेरा गया है।
सुदूर दक्षिण में पल्लव राजाओं ने 7वीं सदी में महाबलीपुरम के समुद्री तट पर एक विशालकाय चट्टान को तराश कर पूरा का पूरा ‘गणेश रथ’ मंदिर ही बना डाला, जो आज भी अपने द्रविड़ वास्तुकला के लिए दुनिया भर में मशहूर है। पल्लवों के बाद चोल साम्राज्य (जैसे तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर) में मंदिरों के परिसरों के भीतर गणेश जी के लिए अलग से विशाल और स्वतंत्र मंदिर बनवाने की परंपरा ने जोर पकड़ा।
वहीं उत्तर और मध्य भारत में गुर्जर-प्रतिहार और चंदेल राजाओं (8वीं से 12वीं सदी) के शासनकाल में हर बड़े मंदिर के प्रवेश द्वार (ललाटबिम्ब) के ठीक बीचों-बीच गणेश जी की मूर्ति स्थापित करने का कड़ा नियम बन गया। चंदेलों द्वारा खजुराहो में बनवाई गई ‘नृत्य करते गणेश’ (नृत्य गणेश) की मूर्ति तो इतनी ऊर्जावान है कि पत्थर में भी गति का अहसास होता है।
14वीं से 18वीं सदी के बीच महाराष्ट्र में भगवान गणेश की भक्ति ने एक नया और संगठित रूप लिया, जब ‘अष्टविनायक’ (आठ स्वयंभू गणेश मंदिरों) की तीर्थयात्रा बेहद लोकप्रिय हुई। मोरेश्वर, सिद्धिविनायक, महागणपति, विघ्नहर, चिंतामणि, गिरिजात्मज, बल्लालेश्वर और वरदविनायक—ये आठ मंदिर मराठा संस्कृति का केंद्र बन गए। शिवशाही यानी छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में गणेश जी मराठा साम्राज्य के प्रमुख आराध्य रहे। उनके बाद जब पेशवाओं का शासन आया, तो उन्होंने भगवान गणेश को अपना कुलदेवता (पारिवारिक देवता) मान लिया। पेशवाओं ने पुणे के प्रसिद्ध शनिवार वाड़ा के भीतर भगवान गणेश के लिए एक अत्यंत भव्य, कलात्मक और स्वर्ण-जड़ित पूजा स्थल का निर्माण करवाया, जिससे महाराष्ट्र के हर घर में गणेश भक्ति की लहर दौड़ गई।
सदियों तक मंदिरों, गुफाओं और घरों के आंगनों में पूजे जाने वाले भगवान गणेश का यह सफर 19वीं सदी के अंत में एक क्रांतिकारी मोड़ पर आ पहुंचा। 1892 में पुणे के भाऊसाहेब लक्ष्मण जावले (जिन्हें भाऊ रंगारी के नाम से जाना जाता है) ने पहली बार घरेलू पूजा से बाहर निकलकर ‘सार्वजनिक गणेशोत्सव’ की शुरुआत की और लकड़ी का एक भव्य रथ बनवाया। ठीक एक साल बाद, 1893 में, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने इस धार्मिक उत्सव की असीम ताकत को पहचाना और अपने अखबार ‘केसरी’ के जरिए इसे एक विशाल राष्ट्रीय आंदोलन में बदल दिया। उन्होंने इस उत्सव को ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ सभी जातियों और वर्गों के भारतीयों को एकजुट करने का सबसे बड़ा सांस्कृतिक हथियार बना दिया। इस तरह, वैदिक काल के एक रहस्यमयी देवता से लेकर, गुप्त और चोल काल की गुफाओं व मंदिरों से होते हुए, भगवान गणेश भारत की आध्यात्मिक चेतना और अंततः स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े सूत्रधार बन गए।







