राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आत्मचंतन
कितने मेले हैं राहों में, हर मेला एक छलावा है,
हर मोड़ पे खड़े हैं राही, हर शख्स छद्मछाया है। महफिल में मशहूर हैं, तो जग अपना कह देता है,
खुशियों की धूप में तो, परछाई ही हमसाया है। तारीफों की बहती हवाएं, वाह-वाही करती हैं,
वक्त हमेशा हमारा रहे, रीत नहीं मन भरमाया है।
अक्सर आती हैं गंभीर घड़ी, परीक्षा लेने मन की,
घिरा अंधेरा चारों ओर, जो डराने लगा पश्चतावा है।
अब समझे जग की रीत, भीड़ में दिखी तन्हाई है,
मिल लो एक दूजे से, अब आने वाला बुलावा है।






