संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
डीप टेक क्रांति: भारत की सर्विस इकोनॉमी से बौद्धिक संपदा संचालित वैश्विक नेतृत्व की ओर ऐतिहासिक यात्रा।
भारत दशकों तक दुनिया के बैक-ऑफिस और आईटी सर्विसेज के हब के रूप में जाना जाता रहा, लेकिन आज देश एक बड़े आर्थिक और तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। भारत अब केवल सेवाओं के निर्यात तक सीमित न रहकर गहन तकनीक यानी ‘डीप टेक’ और बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) के दम पर नए-नए क्षेत्रों में वैश्विक लीडर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, बायोटेक, क्वांटम कंप्यूटिंग और स्पेस टेक जैसे जटिल क्षेत्रों में भारतीय स्टार्टअप्स न केवल नवाचार कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। देश में वर्तमान में 1,40,000 से अधिक सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स का एक विशाल पारिस्थितिकी तंत्र बन चुका है, जिसमें डीप टेक स्टार्टअप्स की संख्या 3,000 से अधिक हो चुकी है। इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा प्रमाण भारत का स्पेस-टेक सेक्टर है, जहां प्राइवेट स्पेस पॉलिसी और इन-स्पेस (IN-SPACe) के गठन के बाद अभूतपूर्व क्रांति आई है। आज भारत में 200 से भी अधिक स्पेस-टेक स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जो सैटेलाइट मैन्युफैक्चरिंग से लेकर रॉकेट लॉन्चिंग तक में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। स्काईरूट एयरोस्पेस ने देश का पहला निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ सफलतापूर्वक लॉन्च कर इतिहास रचा, तो वहीं अग्निकुल कॉस्मॉस ने दुनिया का पहला 3D-प्रिंटेड सिंगल-पीस इंजन ‘अग्निबाण’ तैयार करके भारत की तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया। इसी तरह, पिक्सल (Pixxel) हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ-इमेजिंग सैटेलाइट्स का अपना एक अलग तारामंडल स्थापित कर रहा है, जबकि स्पेस ज़ोन इंडिया और ध्रुव स्पेस जैसे स्टार्टअप्स लो-अर्थ ऑर्बिट मिशनों के लिए किफायती और टिकाऊ समाधान प्रदान कर रहे हैं। स्पेस के अलावा बायोटेक और हेल्थकेयर के क्षेत्र में भारत में 6,000 से ज्यादा बायोटेक स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं, जो जेनोमिक्स, बायो-मैन्युफैक्चरिंग और एडवांस थेरेप्यूटिक्स में वैश्विक कंपनियों को चुनौती दे रहे हैं। एआई और रोबोटिक्स में भी भारत की क्षमता तेजी से बढ़ी है, जहां सर्वम एआई जैसे भारतीय एआई मॉडल्स क्षेत्रीय भाषाओं में क्रांति ला रहे हैं और एथर एनर्जी तथा ओला इलेक्ट्रिक जैसे मोबिलिटी आधारित डीप टेक वेंचर्स भारत को ग्रीन मोबिलिटी का केंद्र बना रहे हैं। इस मजबूत इकोसिस्टम को खड़ा करने में भारत सरकार की दूरदर्शी नीतियों, जैसे कि एनआरएफ (नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) के लिए 50,000 करोड़ रुपये का आवंटन, 10,000 करोड़ रुपये का फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (FFS), बायोटेक के लिए बीआईआरएसी (BIRAC) और डीप टेक के लिए विशेष राष्ट्रीय नीति का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अतिरिक्त, सेमीकंडक्टर मिशन के तहत 76,000 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन भारतीय डीप टेक इकोसिस्टम के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हो रहा है। निजी और वैश्विक वेंचर कैपिटल (VC) निवेशकों का रुख भी अब पारंपरिक कंज्यूमर-टेक से हटकर भारत के डीप टेक स्टार्टअप्स की ओर तेजी से बदला है। भारतीय डीप टेक कंपनियों ने पिछले कुछ वर्षों में अरबों डॉलर का निजी निवेश आकर्षित किया है और देश में अब तक 110 से अधिक यूनिकॉर्न बन चुके हैं, जिनमें से कई सीधे तौर पर डीप टेक और एडवांस इंजीनियरिंग से जुड़े हैं। भारत में पेटेंट फाइलिंग की दर में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह साबित करती है कि भारतीय युवा अब सर्विस डिलीवरी से आगे बढ़कर स्वदेशी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। यह परिवर्तन भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय, उच्च-तकनीकी और नवाचार-संचालित अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित कर रहा है। यदि यह गति बरकरार रहती है, तो आगामी दशक में भारत न केवल ‘मेक इन इंडिया’ बल्कि ‘डिजाइन एंड इनोवेट फ्रॉम इंडिया’ के मंत्र के साथ डीप टेक का निर्विवाद विश्व विजेता बनकर उभरेगा।







