राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मेनपाट , छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“सुकून”
(नज्म)
अगर चाहते हो दिली- सुकूँ,
तो गुनगुनाना सीख लो,
जहाँ बहस बे-वजह की हो,
वहाँ से हंसके जाना सीख लो।
हर बात पर सही होना ही
लाज़मी नहीं होता, दोस्त !
कुछ खामोशियों में छुपा है
जिंदगी का असली मजा।
लफ़्ज़ों के पैने तीरों से
किसी ने दिल जीता नहीं,
जहाँ दलीलें बे-असर हों,
वहाँ चुप रह जाना सीख लो।
ये दुनिया है, यहाँ हर शख़्स
अपनी ही धुन में गाता है,
अपनी जिद पे अड़ा रहता है
वो सच कहाँ सुन पाता है?
अना की इस जंग में सिर्फ़
वक्त का नुक़सान होता है,
सच्चाई को अपने हाल पर
खुद आजमाना सीख लो।
सुकून एक कीमती शय है,
इसे यूँ ही न गँवाया करो,
दूसरों की इस उलझन में
खुद को न आजमाया करो।
चाहते हो रूह की गहराईयों में
चैन-ओ-अमन जिंदगी भर
तो बे-मानी बातों को
हवा में उड़ाना सीख लो।







