सम्पादक रुद्रप्रयागः लक्ष्मण सिंह नेगी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सिद्धपीठ कालीमठ में शारदीय नवरात्र
की अष्टमी-नवमी मेला संपन्न।
सदियों पुरानी परंपराओं का विधिवत निर्वहन,
उमड़ा आस्था का जनसैलाब।
ऊखीमठ: सिद्धपीठ कालीमठ में शारदीय नवरात्रि में ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक आस्था के प्रतीक सिद्धपीठ कालीमठ में सप्तमी ,अष्टमी की रात्रि तथा नवमी के दिन लगने वाले मेलों का परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ विधिवत आयोजन हुआ। सदियों से चली आ रही इन अनूठी परंपराओं के साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर प्रांगण एवं आसपास के क्षेत्र में उमड़े।सप्तमी के दिन लक्ष्मी मंदिर में भंडार से विभिन्न न्योजा-निशान तथा पूजन के लिए आवश्यक सामग्री पहुंची। इस अवसर पर आचार्यों, पुजारियों, ब्राह्मणों, कालीमठ के निवासियों और हक-हकूकधारियों द्वारा विधिवत विशेष पूजन संपन्न किया गया।अष्टमी की रात्रि को परंपरा के अनुसार शुभ घड़ी पर ब्यूंखी के ग्रामीणों ने पुजारी एवं स्थानीय हकधारियों के साथ महाकाली मंदिर में स्थित महाकाली कूप को खोला और काली कूप की सफाई की। इस दौरान मंदिर परिसर की सभी बत्तियां एवं प्रकाश बुझा दिए गए। कूप के स्वच्छ हो जाने के उपरांत उसे सरस्वती नदी के निर्मल जल से पुनः भरा गया।
इसके बाद कालीमठ के निवासियों ने परंपरा के अनुसार मशालें तैयार कीं। पुजारी की अगुवाई में ढोल, नगाड़े, घंटे, भंकोरे और सीटी आदि की दिव्य ध्वनियों के बीच काली माता के मंदिर समूहों की मशालों सहित परिक्रमा की गई। मान्यता है कि इस परंपरा से भूत-प्रेत एवं राक्षसी शक्तियां दूर भागती हैं। अंत में सभी मशालें सरस्वती नदी के तट पर स्थित रक्तबीज शिला पर फेंकी गईं। यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है, और लोक मान्यता है कि इसके साथ रक्तबीज शिला पुनः रक्तरंजित हो जाती है।तत्पश्चात लक्ष्मी मंदिर में स्थित मां भगवती की चल विग्रह डोली, जिसे पुजारी द्वारा तैयार किया जाता है, पूरे लाव-लश्कर और न्यौता-निशानों के साथ सभी मंदिरों की परिक्रमा करती हुई कालीमठ एवं अन्य हक-हकूकधारियों द्वारा काली मंदिर पहुंचाई गई। यहां मां भगवती काली और चल विग्रह माता लक्ष्मी का पूजन हुआ।कालीमठ के निवासियों ने परंपरा निभाते हुए प्रत्येक परिवार की ओर से अर्घ्य अर्पित किया। पुजारी द्वारा पूजन-अर्चन और आरती के उपरांत सभी अर्घ्य भगवती के भंडार में भेजे गए। इसके बाद मां की चल विग्रह डोली भंडार,भैरवनाथ मंदिर सहित अन्य स्थानों का भ्रमण करते हुए उमड़े जनसैलाब को दर्शन एवं आशीर्वाद देकर अपने मंदिर लक्ष्मी के गर्भगृह में पुनः स्थापित हुई।इस दौरान महाकाली मंदिर में कालीमठ के निवासी श्री कुंवर सिंह राणा ने मां भगवती की ओर से वर्षभर चलने वाली गतिविधियों, विश्व कल्याण तथा विभिन्न व्यवस्थाओं के सुचारू संचालन के संबंध में धार्मिक भावना के साथ वचन (भविष्यवाणी) बोले, जिनका अनुसरण स्थानीय निवासी सदियों से करते आए हैं। ब्यूंखी के निवासियों ने भी अपने विशेष हकों का निर्वहन करते हुए अपनी भूमिका निभाई। वहीं मां भगवती की छोटी चल विग्रह डोली लक्ष्मी मंदिर से कालीमठ मंदिर परिसर में शेरसी के ब्राह्मणों के सिर पर सजकर पुजारियों के सहयोग से श्रद्धालुओं को दर्शन देने पहुंची।नवमी तिथि को महाकाली ने अपने पश्वा के शरीर में अवतरित होकर सभी भक्तों को आशीर्वाद दिया। मंदिर प्रांगण एवं आसपास भक्तों का तांता लगा रहा। मेले में स्थानीय उपयोग की वस्तुओं, खिलौनों, मिठाइयों तथा विविध सामग्रियों की दुकानों ने मेले को आधुनिक स्वरूप प्रदान किया।
गणमान्य जनो की उपस्थिति
इस अवसर पर नवयुवक मंगल दल अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह राणा, क्षेत्रपाल के पश्वा राकेश राणा,मां भगवती के पुजारी सुरेशानंद गौड़, चंद्रप्रकाश गौड़, सुभाष चंद्र भट्ट, सतीश गौड़, शिवम, प्रबंधक बद्री-केदार मंदिर समिति अजय शर्मा, प्रधान प्रदीप सिंह राणा, मठपति अब्बल सिंह राणा, दीपक असवाल, अंकित राणा, केदार सिंह राणा, देवेंद्र सिंह राणा, आशीष राणा सहित अनेक श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कालीमाई पंचगाई समिति कालीमठ के अध्यक्ष लखपत सिंह राणा ने कहा कि कालीमठ एक प्रसिद्ध सिद्धपीठ है, जिसका प्रचार-प्रसार अभी और होना आवश्यक है।कहा कि मास्टर प्लान के तहत यहां अनेक विकास कार्य कराए जाने जरूरी हैं, ताकि दिनोंदिन बढ़ती यात्रियों की संख्या के अनुरूप सुविधाएं जुटाई जा सकें। उन्होंने यह भी कहा कि कालीमठ निवासी तथा बद्री-केदार मंदिर समिति के अधिकारी एवं कर्मचारी मेले को सुचारू रूप से संपन्न कराने में सराहनीय योगदान देते हैं।कालीमठ का यह मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति, सामूहिक सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए यह सिद्धपीठ आस्था, शक्ति और संस्कृति का अनुपम केंद्र है।








