अंतर्यात्रा: शोर से संगीत तक

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युगपुरुष सूर्य जी

बागपत, उ. प्र.

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                                (w) 6395080071

 

लेख:

 

                अंतर्यात्रा: शोर से संगीत तक

                              – युगपुरुष सूर्य जी

 

 

सहजता का सौंदर्य और विराट हृदय

 

 

”वाणी संयम राखिए,

व्यर्थ न करिये शोर।” 

 

 

     भीतर का संगीत सुनना! पर रुको, दौड़ मत लगाते जाओ। हमने निराशा का अंतिम रूप खुशी के रूप में अनुभूत किया है। अगर हमारे जीवन में निराशा आ जाए तो याद रखें, इसका आखिरी रूप खुशी ही होता है। हमने अतीत में देखा है कि जो कुछ भी नया था, उसका अधिकांश उपहास उड़ाया गया, निंदा की गई और उसे दबाया गया। किन्तु जो संघर्ष शक्तिशाली है, वह उससे ही और अधिक विजयी होकर उभर कर आया है।

 

 

           मनुष्यों को ये ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि अधिक सोचकर जब हम समस्या खड़ी कर लेते हैं तो ज्यादा सोचने से हमको बचना है। दुनिया के लोग आपकी निंदा और प्रशंसा दोनों ही करेंगे पर तुम्हें फर्क बिल्कुल भी नहीं पड़ना चाहिए। फर्क पड़ेगा तो समस्या होती है, फर्क नहीं पड़ेगा तो सही रहता है। खुद को समझकर अपने मूल्यों को संरक्षित रखना चाहिए।

 

संसार के वासियों, इस बात का ख्याल रखना कि अच्छाइयों का दुनिया कभी सम्मान नहीं करेगी, वो बुराई का करेगी। दुनिया में कठोरता है, अच्छाई कम है पर जो है उसी से ये धरा थमी हुई है। जो संवेदना से ओत-प्रोत होते हैं, वो अपनी व्याकुलता से चीखते-चिल्लाते भी हैं पर एक दिन वो एकदम शांत हो जाते हैं और जिंदगी को बड़ी सहजता से जीने लगते हैं। सहजता और सादगी में ही सबसे ज्यादा सुंदरता होती है जो मानवों को दिखावे और छल-कपट से मुक्त रखती है। माफ करने की क्षमता ही हमें विराट हृदय का बनाए रखती है।

दुनिया से परे हो जाओ! अपने भीतर की यात्रा करो!

 

 

(लेखक परिचय: यह लेख आध्यात्मिक विचारक, दार्शनिक, मानवतावादी तथा संस्कृति एवं समरसता के संरक्षक, युगपुरुष ‘सूर्य जी’ द्वारा लिखित है, जो एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी हैं।)

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