राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग- 5)
हीरा केवल दुखों को सहने वाली नारी नहीं है, बल्कि वह उस अमानवीय व्यवस्था की सबसे बड़ी भुक्तभोगी है जहाँ एक माँ, पत्नी और बहन के रूप में उसकी भावनाएं रोज कुचली जाती हैं। भाई छेकोड़ी की प्रताड़ना उसकी सामाजिक असुरक्षा को दिखाती है, तो वहीं जुड़वा बेटी देविका की बीमारी से मृत्यु और बेटे का लगातार बीमार रहना उसके मातृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा से जूझ रही है। इसके बावजूद, वह बिखरते हुए भी पूरे घर को संभाले रखने का प्रयास करती, पति गणेश सामंतों द्वारा बंधुआ मजदूर बना लिया जाता साठ के दशक के इस दौर में श्रम का किस तरह बेरहमी से तन -मन – धन से शोषण किया जाता। सचमुच गणेश की भूमिका एक ऐसे लाचार पिता और पति की है, जो अपनी आँखों के सामने अपने परिवार को भूखा मरते और बच्चों को बीमार पड़ते देखता है, लेकिन बंधुआ मजदूरी की बेड़ियों में जकड़े होने के कारण वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता, उसका चरित्र सामंती क्रूरता का सीधा प्रामाणिक साक्ष्य है।
मुन्ना का स्कूल मास्टर की यातना सहकर रोज रोते हुए घर आना, तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था के क्रूर और असंवेदनशील चेहरे को उजागर करता , मुन्ना बचपन इस बात को रेखांकित कर रहा है कि गरीब बच्चों के लिए शिक्षा का मार्ग भी कितना पथरीला और अपमानजनक होता है। वह बचपन के उस मासूम दर्द को दिखाता है जहाँ पेट में भूख है और स्कूल में प्रताड़ना एक साथ चल रही है। संकट की इस घड़ी में माँ पार्वती, एक ‘संकटमोचक’ और मानसिक संबल देने वाली बुजुर्ग ममता से भरी माँ है। जब हीरा भीतर से पूरी तरह टूट जाती है, तब पार्वती उसे जीवन की व्यावहारिक समझ (समझाते हुए) देकर ढांढस बंधाती हैं। पार्वती न केवल मुन्ना और बीमार बच्चे का ध्यान रखती हैं, बल्कि घर की रीढ़ बनकर सबको मानसिक रूप से बिखरने से बचाती हैं।
कला एक सहयोगी और सह-साधना करने वाली बेटी की है। जिसे गरीबी के कारण हीरा पढ़ाने के लिए स्कूल नहीं भेज पाती, उसके मन में लाल सिंह जैसे शैतान भय आज भी व्याप्त है । कला अपनी छोटी बहन देविका को खोने के गम के बावजूद, वह अपनी माँ हीरा के काम में हाथ बंटाती है और छोटे भाई मुन्ना व बीमार जुड़वा भाई का ख्याल रखती है। कला, को गरीबी और आपदाएं बच्चों से उनका बचपन छीनकर उन्हें समय से पहले जिम्मेदार बना रहीं हैं।
छेकोड़ी समाज के उस स्वार्थी और असंवेदनशील जीत – जागता रूप है, जहाँ खून के रिश्ते भी संकट के समय साथ देने के बजाय प्रताड़ित करने लगते हैं। उसकी प्रताड़ना हीरा के मायके के रास्ते को भी बंद कर देती है, जिससे हीरा की लाचारी और अधिक गहरी हो जाती है। सामंत और स्कूल मास्टर (शोषक वर्ग के क्रूर चेहरे) ‘खलनायक’ (Antagonists) के रूप में है। सामंत जहाँ गणेश के शारीरिक और आर्थिक श्रम का शोषण करते हैं, वहीं स्कूल मास्टर मुन्ना के मानसिक और शारीरिक शोषण का कारण बनता है। इन दोनों पात्रों के बिना ‘कर्मफल’ की सामाजिक लड़ाई, गरीबी, भूख, सामंती उत्पीड़न, और लचर स्वास्थ्य व शिक्षा व्यवस्था का एक जीवंत सच्चाई है।
(भाग 6 आगे)







