अंजनी सक्सेना
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
हाशिये के शब्द (पुस्तक चर्चा)
विवेक रंजन श्रीवास्तव की सद्यः प्रकाशित कृति ‘हाशिये के शब्द’ समकालीन जीवन, समाज, संस्कृति और मानवीय अंतर्विरोधों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण ललित निबंध संग्रह है। पुस्तक का शीर्षक ही इसकी वैचारिक दिशा को स्पष्ट करता है – लेखक उन विषयों, विचारों और संवेदनाओं को विमर्श के केंद्र में लाते हैं, जिन्हें प्रायः हमारी सामाजिक दृष्टि हाशिये पर छोड़ देती है।
लेखक ने इस संग्रह में शब्दों की बुनावट को शिल्प के रूप में साधने का प्रयत्न किया है। उनकी दृष्टि में ललित निबंध केवल साहित्यिक विधा नहीं, बल्कि पाठक के साथ किया गया आत्मीय और मौन संवाद है। इसी कारण इन निबंधों में दार्शनिक प्रश्न, चाय की प्याली और पुरानी स्मृति के इर्द-गिर्द विचार सिमट आते हैं और अतीत की गलियाँ वर्तमान के चश्मे से देखी जाती हैं।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय-विविधता है। धर्म के निहितार्थ, लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान-परंपरा, इरादे बनाम बहाने, स्व का बोध, सर्वनाम से संज्ञा की यात्रा, नाक, कविता, भाषा, प्रकृति और पर्यावरण जैसे पच्चीस से अधिक विषयों पर लेखक ने चिंतन किया है।
धर्म पर विचार करते हुए लेखक मंदिर की घंटियों से आगे बढ़कर भूखे बच्चे, श्रमिक और वंचित मनुष्य की पीड़ा को धर्म की वास्तविक कसौटी बनाते हैं।- इरादे बनाम बहाने_ जैसे निबंध में नए वर्ष के संकल्पों के बहाने वे मनुष्य की आत्म-प्रवंचना की प्रवृत्ति को उजागर करते हैं।- लोकतंत्र और भारतीय ज्ञान-परंपरा-में सभा, समिति और बौद्ध संघ की चर्चा के माध्यम से वे लोकतांत्रिक मूल्यों की ऐतिहासिक जड़ों तक ले जाते हैं।
भाषा और रोजमर्रा के जीवन से जुड़े निबंध इस संग्रह के विशेष आकर्षण हैं। ‘मैं, तुम, वह, हम’ जैसे सर्वनामो के माध्यम से संबंधों के सूक्ष्म अर्थ खोलना या ‘नाक’ जैसे सामान्य विषय को सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में देखना लेखक की सूक्ष्म दृष्टि का प्रमाण है।
प्रकृति-पर्यावरण से जुड़े निबंधों में रासायनिक खाद, गिरता भूजल स्तर और नदियों के प्रदूषण को लेकर लेखक की चिंता केवल सूचनात्मक नहीं, बल्कि एक नागरिक की जिम्मेदारी का बोध कराती है।
विवेक जी की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और विचारोत्तेजक है। वे हजारी प्रसाद द्विवेदी की सांस्कृतिक वैभव की परंपरा और विद्यानिवास मिश्र के लोक-स्पर्श दोनों के बीच अपना संतुलन साधते हैं। जटिल विषयों को सामान्य पाठक तक पहुँचाने का उनका प्रयास सफल रहा है। कुछ स्थलों पर विचारों का विस्तार थोड़ा अधिक लगता है, जहाँ और कसाव की गुंजाइश थी, परंतु इससे पुस्तक की समग्र पठनीयता बाधित नहीं होती।
आज जब ललित निबंध कम लिखे जा रहे हैं, ऐसे समय में ‘हाशिये के शब्द’ एक सजग और सार्थक हस्तक्षेप है। यह शोर नहीं मचाती, बल्कि सन्नाटा तोड़ती है। यह उन पाठकों के लिए है जो साहित्य में केवल फूल-सुगंध नहीं, बल्कि उस फूल के नीचे की मिट्टी में सने हाथों को भी देखना चाहते हैं। यह कृति हाशिये पर खड़े मनुष्य को सेंटर स्टेज पर लाने का एक ईमानदार प्रयास है।
पठनीयता, वैचारिक स्पष्टता और भाषा-माधुर्य के कारण यह पुस्तक सुधी पाठकों की साहित्यिक मेज पर एक आत्मीय मित्र की तरह रहेगी। हिंदी जगत इस नवाचारी कृति का स्वागत करता है।
(विभूति फीचर्स)






