अदिती कुशवाहा
बैकुंठपुर (कोरिया) छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जब भी शाम ढलती है
जब भी शाम ढलती है,
आँखों में एक चेहरा उतर आता है…
भीड़ भरी इस दुनिया में भी
मुझे बस “पापा” याद आते हैं।
लोग कहते हैं —
“समय के साथ सब ठीक हो जाता है…”
पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं,
जो समय से नहीं,
साँसों से जुड़े होते हैं।
मैंने कोशिश की मुस्कुराने की,
खुद को समझाने की,
पर हर खुशी के पीछे
उनकी कमी चुपचाप खड़ी मिलती है।
कभी-कभी लगता है
शायद मेरे भाग्य में
पिता का सुख अधूरा ही लिखा था…
तभी तो भगवान ने
इतना प्यारा इंसान
इतनी जल्दी दूर कर दिया।
अब हर शाम
मैं आसमान को देखती हूँ,
और सोचती हूँ —
क्या वहाँ कहीं
मेरे पापा भी मुझे याद करते होंगे?
मेरी आँखों में जो आँसू हैं,
वो सिर्फ दुःख नहीं…
वो उस प्यार की निशानी हैं
जो कभी खत्म नहीं होगा।
क्योंकि कुछ लोग
जिंदगी से जाते जरूर हैं,
पर दिल से कभी नहीं जाते…
और पिता —
तो बेटी की धड़कनों में बस जाते हैं।







