अनामिका अर्श
वाराणसी, उत्तर प्रदेश
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
‘मानमर्दन’
उनकी गुस्ताखियों पर राक्षस भी शर्मिंदा हैं….
अपने अंतस के सड़ांध को संत के चोले से ढक रखा है….
अपने क्षुद्र अहंकार की चोटी पर बैठ, करते रहते हैं वास्तविक संतो की निंदा….।
स्वार्थी सुपर्णखाओ को नचाते हैं अपने इर्द गिर्द….
अपनी हवस/वासनाओं को देते हैं….
कृष्ण की रासलीला नाम….
सात्विक/आत्मिक प्रेम का ककहरा भी जिन्हें नहीं मालूम….
वो देते हैं प्रेम रसिकों को प्रेम का दुर्लभ ज्ञान….।
अपने कुकृत्यों/कुत्सित मानसिकता से….
मां सरस्वती के मंदिर को करते हैं प्रदूषित….
सनातन धर्म/संस्कृति का करते हैं अपमान….।
शिष्य बनने की पात्रता नहीं जिनमें….
गुरु बने फिरते हैं, धर्म के आडम्बर से अपनी छद्म छवि गढ़ते हैं….
अपनी चारित्रिक हीनता का नहीं इन्हें कोई भान….।
श्री कृष्ण से अपनी तुलना करते…
कटती नहीं इनकी जुबान….
दुर्योधन/दुशासन हैं ये
श्री कृष्ण के वास्तविक स्वरूप से…..
अभी हुई ही कहां है इनकी पहचान…।
निश्छल प्रेमियों के लिए है….
कृष्ण की बासुंरी की मोहक है तान….
अहंकारियों/अधर्मियों के विनाश हेतु सुदर्शनचक्र….
यही है श्री कृष्ण की गीता का विज्ञान…।
अहम के अंधकार में सोए हैं ….
उन्हें कैसे हो सत्य का दर्शन….
कैसे समझ में आए दिव्य प्रेम /सहज समर्पण….
अहम/वहम का है एक ही है उपचार….
करना पड़ेगा इनके मिथ्या मान का मर्दन…।







