आशीष त्रिवेदी, मुजफ्फरपुर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“संविधान और हम”
राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक पारदर्शिता और नए भारत का संकल्प की ओर एक कड़ा कदम।
हाल के वर्षों में भारत ने अपनी आंतरिक सुरक्षा, प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण विधायी बदलाव किए हैं। इन सबमें सबसे चर्चा में रहने वाला और दूरगामी प्रभाव डालने वाला निर्णय विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन अधिनियम (FCRA Amendment) रहा है।
इस कानून ने देश के भीतर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी धन की प्रक्रिया को सख्त और जवाबदेह बना दिया है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता और आन्तरिक सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक फैसला है।
विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता की क्यों थी आवश्यकता?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक और कल्याणकारी कार्यों का स्वागत हमेशा होता है, लेकिन जब कल्याणकारी कार्यों की आड़ में विदेशी धन का इस्तेमाल देश के भीतर अस्थिरता, असंतोष या असंतुलन पैदा करने के लिए होने लगे, तो सरकार का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। अतीत में ऐसी कई रिपोर्टें सामने आईं जहाँ ‘समाज सेवा’ के नाम पर मिली विदेशी फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा संदिग्ध गतिविधियों या कुछ चुनिंदा संस्थाओं के निजी हितों की पूर्ति में इस्तेमाल हो रहा था।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ में किए गए संशोधनों ने इस अनियंत्रित व्यवस्था पर पूर्ण विराम लगाने का काम किया है।
इस संशोधन के प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं-
1. केंद्रीयकृत वित्तीय ट्रैकिंग, विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए एसबीआई दिल्ली की मुख्य शाखा में खाता होना अनिवार्य किया गया, जिससे धन के लेनदेन की निगरानी पारदर्शी और सुलभ हो सके।
2. फंड के पुनः हस्तांतरण पर रोक – एक संस्था द्वारा प्राप्त विदेशी धन को किसी अन्य छोटी संस्था को ट्रांसफर करने पर रोक लगाई गई, जिससे फंडिंग की प्राथमिक श्रृंखला को छुपाया न जा सके।
3. प्रशासनिक खर्चों की सीमा- विदेशी फंड का 20% से अधिक हिस्सा प्रशासनिक खर्चों (वेतन, कार्यालय आदि) पर खर्च करने पर रोक लगाई गई, ताकि पैसा असल जनहित के काम में लगे।
राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता का आधार
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के इस दौर में कई बार बाहरी ताकतों द्वारा विकासशील देशों की नीतियों को प्रभावित करने या आंतरिक रूप से अस्थिर करने के लिए ‘सॉफ्ट पावर’ या ‘फंडिंग नेटवर्क्स’ का सहारा लिया जाता है।
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ संशोधन का मुख्य संदेश स्पष्ट है—“ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” की नीति केवल सरकारी विभागों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी गैर-सरकारी संगठनों पर भी लागू होती है जो सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। जो संस्थाएं वास्तव में निस्वार्थ भाव से समाज सेवा में लगी हैं, उन्हें इन कड़े नियमों से कोई परेशानी नहीं है; संकट केवल उन तत्वों के सामने आया है जिनकी नींव बिना पारदर्शी जवाबदेही के चल रही थी।
कानून व्यवस्था और आधुनिक फॉरेंसिक व्यवस्था
जब भी देश में कोई बड़ा नीतिगत बदलाव लागू होता है, तो कुछ असामाजिक या हिंसक तत्वों द्वारा विरोध प्रदर्शन की आड़ में कानून-व्यवस्था को चुनौती देने की कोशिश की जाती है। परंतु आज का प्रशासन केवल जमीनी पुलिस बल तक सीमित नहीं है। डिजिटल इंडिया के दौर में सीसीटीवी, डिजिटल ट्रैकिंग, फिंगरप्रिंट और फॉरेंसिक साक्ष्यों के जरिए उपद्रवियों की सटीक पहचान की जा रही है। कानून हाथ में लेने वालों को यह समझना होगा कि आधुनिक जांच प्रणाली के तहत दर्ज होने वाले आपराधिक मामले और पुलिस रिकॉर्ड उनके भविष्य के लिए गंभीर कानूनी बाधाएं उत्पन्न कर सकते हैं, चाहे वह सरकारी नौकरी की बात हो या पासपोर्ट सत्यापन की।
इस संशोधन को किसी राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय हित के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। कोई भी मजबूत देश अपनी आंतरिक नीतियों या सुरक्षा को बाहरी धन के प्रभाव के हवाले नहीं कर सकता। कानून की यह सख्ती देश के नागरिकों के विश्वास को और मजबूत करती है कि भारत अपनी नीतियों का निर्धारण अपनी सरजमीं और अपनी जनता की प्राथमिकताओं के आधार पर ही करेगा।







