कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी
… चन्दू
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तरखण्ड)
“नारी को बस नारी मत समझना”
नारी को बस नारी मत समझना, उसकी शक्ति को लाचारी मत समझना। जिसे समझते हो तुम केवल फूल, उसके भीतर की चिंगारी को कम मत समझना।
रूप देखकर जो उपमा देते, कभी चाँद, कभी तारा कहते। कभी कली, कभी कोमल लता, कभी उसे फूलों से भी प्यारा कहते।
पर उसकी आँखों में झाँक जरा, वहाँ एक इतिहास दिखाई देगा। उसके मौन को पढ़ना सीखो, उसमें संघर्षों का आकाश मिलेगा।
वह केवल श्रृंगार नहीं है, वह संस्कारों की गंगा है। वह जननी है, वह जीवन है, वह धरती जैसी धैर्यवती है।
जिसने वीर शिवा को गढ़ डाला, वह जीजाबाई का तेज भी है। अन्याय के आगे शीश न झुकाए, वह दुर्गावती का वेग भी है।
वह झाँसी की रानी बनकर, रणभूमि में ललकार उठी। मातृभूमि की आन बचाने, हाथों में तलवार उठी।
वह अहिल्याबाई बनकर देखो, न्याय का दीप जलाती है। टूटे मंदिर, उजड़े तीर्थों में, फिर से आस्था सजाती है।
वह पन्ना धाय का त्याग बनी, अपने लाल को देश पर वार गई। राजधर्म की रक्षा की खातिर, ममता को भी पीछे छोड़ गई।
वह सावित्री की दृढ़ता है, जो मृत्यु से भी लड़ सकती है। वह सीता का धैर्य समेटे, अग्निपरीक्षा सह सकती है।
वह मीरा का निर्मल प्रेम लिए, विष का प्याला पी सकती है। पर जब कोई मर्यादा लाँघे, दुर्गा बनकर जी सकती है।
वह ऊदा देवी की हुंकार बनी, रण में शत्रु को ललकार गई। वह मातंगिनी की अंतिम साँसों में, ‘वंदे मातरम्’ पुकार गई।
वह बेगम हजरत महल बनी, अंग्रेजों से टकराती है। वह भीखाजी कामा बनकर, परदेस में ध्वज फहराती है।
वह कनकलता की निर्भीकता, तिरंगा लेकर आगे बढ़ती है। देश की खातिर हँसते-हँसते, बलिदान की राह पर चढ़ती है।
तुम उसकी चूड़ी मत गिनना, उसकी हिम्मत को पहचानो। तुम उसके गहने मत तौलो, उसके त्याग का मूल्य जानो।
उसके चेहरे की चमक से आगे, उसकी आत्मा को पढ़ना सीखो। जो आँसू पीकर मुस्काती है, उसके दर्द को समझना सीखो।
वह घर की नींव संभालती है, फिर दुनिया से भी लड़ती है। अपने हिस्से की धूप सहकर, सबके जीवन में छाँव करती है।
वह बेटी है तो आँगन महके, वह बहन है तो स्नेह मिलेगा। वह पत्नी बन जीवन सँवारे, माँ बने तो संसार मिलेगा।
उसको केवल देह समझने वाले, अपनी दृष्टि बदलना सीखो। नारी के सम्मान से बढ़कर, कोई धर्म नहीं—यह मानना सीखो।
वह कोमल है तो प्रेम की खातिर, वह कठोर है तो सत्य की खातिर। वह झुकती है रिश्तों की खातिर, पर लड़ती है अपने सम्मान की खातिर।
उसके आँचल में सृष्टि पलती, उसके मन में सागर बहता। वह टूटे तो घर टूटे सारा, वह हँसे तो संसार है हँसता।
इसलिए नारी को बस नारी मत समझना, उसको कोई बेचारी मत समझना। जिस दिन उसने खुद को पहचान लिया, उस दिन दुनिया की तस्वीर बदल जाएगी।
वह शक्ति है, वह भक्ति है, वह ममता का साकार रूप है। वह जीवन की प्रथम पाठशाला, वह सृष्टि का आधार-स्वरूप है।
नारी को बस नारी मत समझना, उसके भीतर संसार देखना। रूप नहीं, उसके कर्म देखना, उसमें भारत का गौरव देखना।
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जब से प्रीति भई उर से
जब से प्रीति भई उर से,
मन में मधुरिम राग जगा है।
नैनन में बसि रूप तुम्हारा,
जीवन का अनुराग जगा है।
सूनी-सूनी राहों में भी,
फूलों का अनुराग जगा है।
तुमसे मिलकर प्राणों में फिर,
जीने का नव भाग जगा है।
जब से प्रीति भई उर से,
सुध-बुध अपनी भूल गई हूँ।
तेरी ही छवि साँसों में भर,
दुनिया सारी भूल गई हूँ।
तेरे नाम की धुन में साजन,
हर पीड़ा को भूल गई हूँ।
तुमको अपना मान लिया तो,
खुद को भी मैं भूल गई हूँ।
चाँद तुम्हारा मुखड़ा लागे,
तारे तेरी आँख लगें हैं।
मधुर-मधुर मुस्कान तुम्हारी,
जैसे फूलों के रंग सजें हैं।
तेरी बातें मन को छूकर,
बनकर मीठे गीत बजें हैं।
तुम जो मिलते जीवन में तो,
सारे सपने सत्य लगें हैं।
जब से प्रीति भई उर से,
मन मंदिर उजियार हुआ है।
सूखे अधरों पर भी जैसे,
मधुर प्रेम का प्यार हुआ है।
जीवन की हर राह सुहानी,
हर मौसम गुलजार हुआ है।
तेरे प्रेम-सुधा से मेरा,
यह जीवन साकार हुआ है।
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दिल की बातें कहना चाहूँ, कह न पाऊँ
दिल की बातें कहना चाहूँ, कह न पाऊँ,
मन में उठते भाव तुम्हारे, सह न पाऊँ।
चैन चुराया दिल का तुमने,
तुझ बिन रह न पाऊँ, तेरी यादों के सागर में,
डूबूँ उतराऊँ।
नैनों से जो बात कहूँ मैं, तुम समझो तो,
मौन अधर की पीड़ा मेरी, तुम समझो तो।
मन की धड़कन नाम तुम्हारा, तुम सुन लो तो, बिन बोले ही मेरी चाहत, तुम चुन लो तो मैं इतराऊँ?
रात अँधेरी, चाँद अकेला, मैं भी अकेली,
तेरी यादों ने फिर छेड़ी, प्रेम की सहेली।
तकिया भीगा, नींद रूठी, आँखें हैं गीली,
तेरे बिन ये साँसें लगतीं, जैसे कोई पहेली
सह न पाऊँ?
चुपके-चुपके तेरा चेहरा, मन में आता,
तेरी बातें याद करके, मन मुस्काता।
कोई पूछे हाल तो मेरा, कुछ कह न पाता,
तेरा नाम जुबाँ पर आते, दिल धड़क सा जाता, मैं घबराऊँ?
तेरी एक झलक को तरसे, ये नैना मेरे,
तेरी एक हँसी पर कुर्बां, सपने सारे मेरे।
तुम जो कह दो “पास हूँ तेरे”, मिटें अँधेरे,
फिर तो लगने लगें मुझे ये, चाँद-सितारे
मैं खिल जाऊँ?
तुमसे मिलकर बात अधूरी, पूरी कर दूँ,
दिल में छुपी हुई हर धड़कन, तुम पर धर दूँ। साँस-साँस में नाम तुम्हारा, लिखकर रख दूँ,
तुम मिल जाओ तो इस जीवन को,
तुम पर वारूँ।
दिल की बातें कहना चाहूँ, कह न पाऊँ,
चैन चुराया दिल का तुमने, तुझ बिन रह न पाऊँ। तेरी प्रीत लगी है ऐसी, खुद को भी मैं भूल सी जाऊँ, तुम जो मिल जाओ जीवन में,
फिर कुछ और न चाहूँ महक मैं जाऊँ
तुम हो मेरे गीत की सरगम, तुम ही मेरे तराना, तुमसे ही तो सीखा मैंने, हँसना-मुस्काना।
तुम बिन मेरा कौन यहाँ है, अपना कहलाना,
तुम ही मेरी चाहत हो और, तुम ही अफसाना एहसास यह पाऊँ?
दिल की बातें कहने को अब, दिल बेताब है,
तेरी मेरी प्रेम कहानी, खुद एक किताब है।
तुम पढ़ लेना आँखों से जो, लिखा जवाब है,
मेरे हर इक प्रश्न का उत्तर, बस तेरा ख्वाब है
मैं तुमको पढ़ जाऊँ
दिल की बातें कहना चाहूँ, कह न पाऊँ,
चैन चुराया दिल का तुमने, तुझ बिन रह न पाऊँ। सारी दुनिया छोड़ भी दूँ मैं, तेरा साथ निभाऊँ,
तू जो मेरा बनकर रहना, मैं भी तेरी हो जाऊँ।






