डॉ0 हरि नाथ मिश्र
(पूर्व विभागाध्यक्ष-अंग्रेजी)
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
रिम-झिम (लोक-गीत)
रिम-झिम पड़ेला फुहार सवनवाँ
त आय गईलें सखिया,
पेड़वा पे झुलेला झलुवा त दिलवा
रसाय गईलें सखिया।।
पुरुवा के झोकवा से आवेले बयरिया,
पनिया के बूँदवा में टिके ना नजरिया।
त मनवाँ में उठै ले कसकिया-
सँवरिया भुलाय गईलें सखिया।।
रिम-झिम….
काले-काले बदरन कै छटा हौ निराली,
बिजुरी ज चमके त भागूँ हाली-हाली।
बिरहा के अगिया से जली मोरि-
सरीरिया कुम्हिलाय गईलें सखिया।।
रिम-झिम….
एको पल सोऊँ नाहीं, जागूँ सारी रतिया,
का करूँ रामा हमरे आवे नाहीं बतिया।
त हथवा कै गिनीला अँगुरिया-
रतिया अपार भईलीं सखिया।।
रिम-झिम….।।
पिया बिनू तनिको सुहाय ना सवनवाँ,
लागै नाहीं कतहूँ उदास मोर मनवाँ।
अब त लागै जईसे बहुतै फीका-
सोरहो सिंगार भइलें सखिया।
रिम-झिम पड़ेला………..।।






