राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
गजल
हवा ने माफी तो मांग ली ,
पर दरख्त के पत्ते गिरे हुए थे।
जो फूल कल तक खिले थे,
आज मिट्टी में बिखरे हुए थे।
कहीं कोई घाव न रह जाए,
ये चाहत थी उसकी आँखों में
मगर जो जख्म दिए थे उसने,
वो अभी भी हरे – हरे थे।
वो आया था माफ़ी मांगने को,
हाथों में फूल लिए हुए,
जिस आग को उसने जलाया था,
उसके शेष अंगारे डरे – डरे थे।
सुकून की तलाश में निकला था,
दिल का बोझ उतारने को,
जो वादे उसने करे थे राह में,
वो सब पूरी तरह मरे -मरे थे।






