राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
मैनपाट, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
यक्ष प्रश्न !
(कविता)
व्यस्त रहना काफी नहीं,
उद्देश्य भी होना चाहिए
चींटियाँ भी दौड़ती रहतीं दिन-रात।
दाना-दाना जोड़तीं वे, जीने के लिए
लक्ष्य उनका स्पष्ट और साफ।
हम भी भागते सुबह से शाम,
मीटिंग, मेल, मोबाइल की आवाज।
पर थककर जब रात गिराती है पलक,
तो मन पूछता किस मंज़िल की तलाश है?
व्यस्तता तो एक रास्ता भर है,
मंजिल नहीं, न ही अर्थ का सार।
हम भूल गए अपना असली उद्देश्य।
क्या सिर्फ रोटी, नाम और दौलत के लिए?
या कुछ ऊँचा, कुछ सच्चा, कुछ प्यारा?
समय बीतता, साँसें गिनती रहतीं,
पर भीतर से खाली, ये कैसा व्यापार?
रुककर सोचो एक पल ठहरकर,
क्यों इतना भाग रहे हो बेचैन?
व्यस्त रहो, पर अर्थ के साथ,
वरना जीवन सिर्फ चींटी जैसा खेल।
यक्ष प्रश्न है हम किस लिए व्यस्त?
उत्तर ढूँढो अपने ही दिल की गहराई में।
तभी व्यस्तता बनेगी सार्थक यात्रा,
न कि निरर्थक दौड़ की दुखांत कहानी।






