अदिती कुशवाहा
बैकुण्ठपुर (कोरिया), छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
एक कुर्सी आज भी खाली है…
मेरे पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि (5 सितंबर 2026) पर एक बेटी की भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
मेरे पापा के लिए मैं क्या लिखूँ…?
आप मेरे लिए सिर्फ पिता नहीं थे, मेरी पूरी दुनिया थे… और आज भी हैं।
5 सितंबर 2025… वो दिन जब आप मुझे छोड़कर चले गए।
आज ठीक एक साल बाद, 5 सितंबर 2026 को, आपकी प्रथम पुण्यतिथि पर… घर में आपकी एक कुर्सी आज भी खाली है।
पर सच कहूँ पापा… मेरे लिए वो कुर्सी कभी खाली नहीं रही।
मेरी नजरों में अब इस दुनिया के हर माता-पिता में मैं आपको ही देखती हूँ।
मैं उस खाली कुर्सी में हर उस माँ-बाप का चेहरा देखती हूँ, जो अपने बच्चों के लिए जीते हैं, और कभी कुछ नहीं माँगते।
पापा, आपके जाने के बाद मैंने माँ को टूटते हुए भी मुस्कुराते देखा है…
उनकी आँखों में दर्द है, पर होंठों पर हिम्मत।
उनकी उम्र बढ़ रही है… और उनके साथ बढ़ रहा है उनका अकेलापन।
आप होते तो सच में… उनका वन भी वृंदावन बन जाता।
ईश्वर से मेरी बस एक ही प्रार्थना है—
खुशियाँ भले आप अपने साथ ले गए,
पर मेरी माँ को हिम्मत देना…
और मेरे पापा की आत्मा को शांति देना।
ये शब्द सिर्फ मेरे पापा के लिए नहीं हैं…
ये उन सभी बच्चों के लिए हैं, जो अपने ही माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं—
कभी वृद्धाश्रम में, कभी घर के एक कोने में, तो कभी अपने व्यवहार से।
मैं उन बच्चों से हाथ जोड़कर कहना चाहती हूँ—
एक बार उनसे पूछो, जिनके पास अब माँ-बाप नहीं हैं…
हर त्योहार पर एक कुर्सी खाली रह जाती है…
हर दुख में एक आवाज़ याद आती है, जो कहती थी—
“मैं हूँ न…”
माता-पिता ने हमें पालना अपना कर्तव्य समझा, और उसे पूरी निष्ठा से निभाया।
अब हमारी बारी है…
उन्हें सिर्फ दो वक्त की रोटी ही नहीं,
बल्कि दो पल की खुशी, अपनापन और सम्मान देना भी हमारी जिम्मेदारी है…
ताकि उनके जीवन के बाकी दिन मुस्कुराते हुए बीतें।
आज, मेरी आप सभी से विनती है—
मेरे पिताजी की प्रथम पुण्यतिथि पर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें…
और एक संकल्प लें—
हम अपने माता-पिता को कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।
क्योंकि…
माता-पिता बोझ नहीं होते,
वे हमारे जीवन की नींव होते हैं।
और अगर नींव ही हिल जाए…
तो घर कैसे बचेगा…?








