कवयित्री चन्द्रमती चतुर्वेदी (चन्दू)
बस्ती, अयोध्या धाम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
जज्बात हमारे रह गए दिल में मचलकर,
हम देखते रहे तुझको अपना समझकर।
कहाँ रुक गया दिल, जाने कब तुझ पर ठहरकर,
हम खुद को भूल बैठे तेरा होकर, सँवरकर।
काश मेरे हालात को तुम समझ पाते,
आँखों में छिपे दर्द को पढ़कर समझ पाते।
फिर तो हम इस जीवन को खुशहाल समझते,
तेरे संग बिताए हर पल को कमाल समझते।
मगर रहा अफसोस, तुम्हें फर्क ही न पड़ा,
हम टूटते रहे और तेरा दिल न पिघला।
हमने हर दर्द को हँसकर सहा है मुस्काकर,
तुमने हाल तक पूछा नहीं कभी पास आकर।
तेरी बेरुखी ने हमें इतना अकेला किया,
जिसे अपना माना, उसी ने पराया किया।
अब भी ये दिल तेरी ही राह देखता है,
हर साँस में तेरा ही नाम लेखता है।
शिकवा नहीं तुमसे, बस इतना मलाल है,
तू पास होकर भी मेरे लिए दूरहाल है।
जज्बात हमारे आज भी दिल में पल रहे,
तुम बेखबर रहे और हम तुझमें ढल रहे।







