पीयूष गोयल
(दर्पण छवि लेखक, मोटिवेशन स्पीकर)
दादरी गौतमबुद्ध नगर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सूरतगढ़ कस्बे में एक मध्यवर्गीय परिवार रहता था, जिनका अपना पुस्तेनी पंसारी का काम था, कस्बे में सेठ का नाम था।
काम भी बहुत अच्छा था, सेठ के एक बेटा और एक बेटी थी।
सेठ को खाना बनाने का व खिलाने का बहुत शौक था, कस्बे के लोग सेठ को अक्सर खाना कैसा बना हैं, चेक करवाने के लिए बुलाते थे, व्यापारी सेठ तन मन से आयोजन को सफल बनाने में भी पूरा सहयोग करते थे।
सेठ तीन भाइयों में सबसे बड़े थे सबके अपने अपने मकान व दुकान थी, ईश्वर का सभी भाइयों पर पूरा आशीर्वाद था।
सेठ ने अपने बड़े बेटे की शादी बड़े ही धूम धाम से मनाई और कुछ समय के बाद
सेठ ने अपनी बेटी की भी शादी कर दी,
समय गुजरता रहा, घर में ख़ुशी का माहौल था।
सेठ का बेटा अपनी माँ को अपनी पत्नी के साथ अस्पताल ले जाता हैं।
सेठ की पत्नी अपने बेटे से बोली बेटा मुझे बड़ी बेचनी हो रही हैं, बहू की तकलीफ देखी नहीं जा रही हैं।
पता नहीं क्या होगा, बेटा अपनी माँ से बोला जो भी होगा सही होगा और खुशियाँ ही आयेंगी चाहें बेटा हो या बेटी, और घर में खुशियों के रूप में बेटी ने जन्म लिया और सेठ के बेटे ने अपनी बेटी का नाम बाद में खुशी ही रखा।
परिवार में जब से खुशी आई हैं घर खुशियों से भरा हैं सेठ के व्यापार को आज 20-25 लोग संभाल रहें हैं अब खुशी बीटियाँ इतनी बड़ी हो गई हैं, पापा खुशी के लिए एक बेटा ढूँढ रहें हैं।
इसमें कस्बे का नाम बदला हुआ हैं सिर्फ़
ये एक सच की कहानी हैं, मेरे मित्र की बताई हुई हैं एक दिन अचानक मित्र से पूछ लिया तुमने अपनी बेटी का नाम ख़ुशी क्यों रखा उसने मुझे ये सब बताया, और बताते हुए जोर जोर से रोने लगा, मेरी भी आँखे भर आई, रोते हुए बोला कुछ समय बाद अपने घर चली जाएगी मेरी बेटी “खुशी”
चुकी मेरा मित्र (छोटा भाई) मुझे अब सब पता हैं।
सच में जब से खुशी बीटियाँ आई हैं
परिवार में खुशियाँ ही खुशियाँ लाईं हैं।
बिटिया मतलब खुशियों से भरा परिवार






