रचनाकार – बाल कवि अनुराग बघेल
बिजराकापा खुर्द मुंगेली (लोरमी) छ.ग.
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
छत्तीसगढ़ के महिमा
तरिया म फूले कमल फूल जइसे तोर आँखी।
चारों कोती मया के बंधाये हे उज्जर पाँखी।।
खेत लहलहावय जइसे सोन के चादर ओढ़े हे।
कोयली के कुहू-कुहू म मोर माटी के गीत गढ़े हे।।
महानदी के धार कस पावन, हमर नानी के लोरी हे।
एकर पानी पीके तो, हर छत्तीसगढ़िया गोरी हे।।
भाखा हमर मीठ अइसन, कुसियार ल घलो सिट्ठा कर दे।
एक-एक शब्द सुन ले, तो परदेसी मन ल अपन बना दे।।
चीला-बरा के सुवाद म, महतारी के हाथ बसे हे।
पुरखा के मान रखे बर, अब्बड़ जतन सजे हे।।
करमा, ददरिया के धुन म, जब गाँव जाग जाथे।
थके-हारे मनखे के पाँव घलो खुदे नाचे लगथे।।
बस्तर के ढोलकी जब जोर-जोर ले बाजे हे।
सुनके तो माटी के कण-कण सुग्घर साजे हे।।
हमर छत्तीसगढ़िया मन, सबले जादा सच्चा हें।
एखर हिरदे म बस मया के एक्के ठन बच्चा हे।।






