महाभारत महागाथा

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बाल कृष्ण मिश्रा 

    नई दिल्ली 

 

                 (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)                                              (w) 6395080071

 

       

        || महाभारत महागाथा ||

 

धीवर-कन्या का वह बंधन, शांतनु का व्याकुल अंतर्मन,

भीष्म की वह भीषण प्रतिज्ञा, जिसने हिलाया सिंहासन।

पर हाय, नियति का चक्र चला! हस्तिनापुर का भाग्य जला,

था अंधराज सिंहासन पर, न्याय जहाँ घुट-घुट कर मरा!

 

बढ़ता गया कौरव का मद, ईर्ष्या की ज्वाला विकट, प्रचंड,

पर जनमे पांडव पांच वीर, लेकर अपना पौरुष अखंड।

सीखी द्रोण से धनुर्विद्या, जागा अर्जुन का शौर्य-भान,

पर शकुनि के छलों ने बदला, पावन भारत का भाग्य-वितान।

 

लाक्षागृह की धधकती आग, पीकर निकले जब सिंह-शावक,

पांचाल नगर में गूँज उठा, अर्जुन के गांडीव का पावक।

मत्स्य-वेध कर खींचा जब, पौरुष का महा-उद्घोष वहाँ,

द्रौपदी को जीत चले पांडव, काँप उठा तब दुष्ट जहाँ!

 

रच दिया इंद्रप्रस्थ अद्भुत, पौरुष की अमिट कहानी से,

पर कुरु-सभा थर्रा उठी विकट, कौरव की ईर्ष्या-पानी से।

द्यूत का वह पासा फेंका, जुए में हारा सब संसार,

भरी सभा में खींच रहे, कुलवधू का दुष्ट दुराचार!

 

पर कड़क उठे तब कृष्ण-मुरारी, अंबर तक उनका हाथ बढ़ा,

चीर बढ़ाकर लाज बचाई, जब दुःशासन था काल खड़ा।

मिला वनवास, अज्ञातवास, सहते-सहते विपदा भारी,

लौटे जब लेकर न्याय-भाग, तब काँप उठी दुनिया सारी!

 

महाकाल खुद शांति-दूत बन, कुरु-द्वार पर गरज उठे,

महासमर की ज्वाला थामने, न्याय-भिक्षा पर उतर आए।

“न्याय नहीं तो सर्वनाश होगा, तनिक होश में आओ तुम,

या दे दो केवल पाँच ग्राम, वरना रण की विभीषिका पाओ तुम!”

 

पर विनाशकाले विपरीत बुद्धि, दुर्योधन का अहंकार भड़क उठा,

त्रिलोकीनाथ को बाँधने का, उस नीच में दुस्साहस जग उठा!

तब अट्टहास कर उठे माधव, काँप उठा त्रैलोक्य सारा,

दसों दिशाएँ थर्रा उठीं, फूटा क्रोध का महा-अंगारा!

“रे मूर्ख! देख मेरा विकराल रूप, ब्रह्मांड अभी निगलूँगा मैं,

तेरी सत्ता, तेरे मद को, पैरों तले कुचलूँगा मैं!”

 

सज गया कुरुक्षेत्र का मैदान, आमने-सामने काल खड़ा,

पर गांडीवधारी अर्जुन का, साहस सहसा था मौन पड़ा।

आँखों में आँसू भर बोले, “केशव, मैं असि न उठाऊँगा,

अपने ही भाइयों के लोहू से, मैं कैसे राज सजाऊँगा?”

 

तब गरजे सारथी जगन्नाथ, “उठ पार्थ! यह कायरता छोड़,

तू अमर आत्मा का अंश वीर, मत मोह-जाल से नाता जोड़!

ये मरे हुए हैं पहले ही, तू तो बस केवल निमित्त है,

क्षत्रिय का धर्म निभा रण में, तेरा बस कर्म में चित्त है!”

 

फिर अठारह दिन तक चला युद्ध, थर्राया अंबर, रोई मही,

भीष्म पितामह तीरों पर सोए, मर्यादा कहीं बची न रही।

द्रोण का शीश कटा रण में, अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ गया,

अकेला सात-सात रथी से लड़, अमर कहानी छोड़ गया!

 

रथ का चक्का जब धँसा भूमि, कर्ण का तब काल पुकार उठा,

अर्जुन का बाण चला ऐसा, जयद्रथ का मस्तक टूट गिरा।

जंघा टूटी दुर्योधन की, अश्वत्थामा का पाप बढ़ा,

गांधारी का श्राप भयंकर, पांडव के माथे आन मढ़ा।

 

राजतिलक युधिष्ठिर का अद्भुत, पर सूने श्मशानों पर था,

मिला शांति का काल अल्प, पर कलियुग का रथ द्वार पर था।

यदुवंश मिटा, वैभव छूटा, आया कलियुग का महा-काल,

पर गूँज रही है आज यही, कुरुक्षेत्र की वाणी विकराल-

 

न्याय, धर्म और कर्म का, यह महाकाव्य ललकार है,

महाभारत केवल युद्ध नहीं, जीवन का असली सार है!

 

 

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