ब्यूरो मध्य प्रदेशः प्रेरणा गौतम।
लद्दाख की जनता बर्फ़ में जमी या सरकार का शेड्यूल लेह का खनिज?
लद्दाख की सर्द ज़मीन पर आजकल राजनीति का पारा तेज़ है। एक ओर जनता भूख हड़ताल और प्रदर्शनों के जरिए आवाज़ उठा रही है राज्य का दर्जा दो, 6th शेड्यूल दो, स्थानीय नौकरियों में आरक्षण दो। दूसरी ओर सरकार है, जो हर मांग पर मुस्कराकर कह देती है “देखेंगे, कमेटी बनाएँगे, रिपोर्ट आएगी।” मानो जनता का भविष्य किसी सरकारी फाइल की तरह धूल में पड़ा हो, जिस पर हर बार सिर्फ़ “ लंबित” की मुहर लगती है।
लेकिन असली खेल कुछ और ही है। सरकार जनता की आवाज़ से ज़्यादा लद्दाख की ज़मीन के नीचे दबे खज़ाने पर नज़र गड़ाए बैठी है लिथियम। वही लिथियम जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों और मोबाइल बैटरियों का “दिल” है। यानी जनता के लिए लोकतंत्र “लो बैटरी” मोड में है, और खदानों के लिए “फुल चार्ज।”
व्यंग्य यह है कि सरकार जनता को अधिकार देने के मामले में तो सुरक्षा, पर्यावरण और संवेदनशील सीमा का हवाला देती है। लेकिन जब खनन की बात आती है, तो यही खतरे अचानक “प्रबंधनीय मुद्दे” बन जाते हैं। जनता बोल रही है “हमारे हक़ दो,” तो जवाब है “संविधान बड़ा जटिल है।” कॉर्पोरेट कहे “खनन दो,” तो जवाब है “देश को आत्मनिर्भर बनाना है।”
लद्दाख में लिथियम की खोज 2022-23 से चल रही है। मेराक ब्लॉक और आसपास के इलाक़ों में सर्वे हुआ, रिपोर्ट में रिज़र्व छोटा और गुणवत्ता औसत बताया गया। लेकिन फिर भी सरकार की चमकती आँखें यह कह रही हैं कि “बैटरी क्रांति” यहीं से शुरू होगी। जनता पूछे “हमें 6th शेड्यूल चाहिए,” तो सरकार हंसकर कहे “वो तो लिथियम का शेड्यूल है, जनता का नहीं।”
युवाओं का ग़ुस्सा यह देखकर और भड़क रहा है। वे सोचते हैं कि हमारी ज़मीन पर खनन होगा, संसाधन बाहर भेजे जाएँगे, मुनाफ़ा कॉर्पोरेट जेब में जाएगा और हमें मिलेगा सिर्फ़ बेरोज़गारी और प्रदूषण। क्या यही लोकतंत्र है? क्या यही नया भारत है?
दिल्ली की राजनीति का गणित भी अजीब है। जनता के आँकड़े छोटे “कुछ हज़ार प्रदर्शनकारी।” लेकिन खनिज के आँकड़े बड़े “हज़ारों टन लिथियम।” सत्ता के लिए जनता महज़ हेडलाइन है, और खनिज असली डेडलाइन।
अब सवाल उठता है क्या सरकार को जनता का इंतजार था या कॉर्पोरेट का? कहीं ऐसा तो नहीं कि दाल में थोड़ा नहीं, बल्कि पूरा कडाणी मसाला मिला हुआ है?







