दूसरों के लिए लड़ना भी एक नग्गापन ही है…?

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प्रभारी सम्पादक मध्य प्रदेशः राजेन्द्र सिंह जादौन

            (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

     दूसरों के लिए लड़ना भी एक नग्गापन ही है…?

 

 

 

दूसरों के लिए लड़ना अपने-आप में एक अलग किस्म का नग्गापन है, और समाज इस नग्गेपन को कभी समझ नहीं पाता। समाज की दृष्टि में नंगा वही होता है जो सच बोल दे, गलती पर उंगली रख दे, और सबसे खतरनाक वो व्यक्ति जो किसी और के लिए खड़ा हो जाए। यहाँ लोग अपने लिए ही बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, तो जो आदमी अपने हित से हटकर किसी और की लड़ाई लड़ता है, वह उन्हें तुरंत “नंगा”, “गैर-ज़रूरी” और “ओवर-स्मार्ट” लगने लगता है।

 

समाज का बड़ा दिलचस्प तंत्र है। लोग कपड़े पहने रहते हैं सूट, टाई, कुर्ता, पगड़ी, जेब में पेन, चेहरे पर सभ्यता पर उनकी रीढ़ पूरी तरह नंगी होती है। पर यह नंगापन उन्हें दिखाई नहीं देता। उन्हें वही नंगा दिखता है जो विरोध करता है, आवाज उठाता है, या भ्रष्टाचार, अन्याय और पाखंड पर सवाल पूछता है। उनकी आंखें उस आदमी पर टिकी रहती हैं जो बोल रहा होता है, न कि उन पर जो गलत कर रहे होते हैं। इसलिए जब मैं दूसरों के लिए लड़ता हूँ, तब मेरा नग्गापन उन्हें चुभता है, क्योंकि मेरे खड़े होने से उनकी चुप्पी उजागर हो जाती है।

 

लोगों के लिए सबसे बड़ा अपराध यही है किसी और की लड़ाई में उतर जाना। उन्हें लगता है कि दुनिया में कुछ भी बिना स्वार्थ नहीं होता। जो आदमी दूसरों के लिए लड़ेगा, वह या तो मूर्ख होगा या फिर कुछ छुपा रहा होगा। इस सोच में जीने वाले लोग हर उस इंसान से डरते हैं जो उनके बनाए आरामदायक झूठों को छेद देता है। ऐसे लोग मान ही नहीं सकते कि बिना लालच कोई किसी और का पक्ष ले सकता है। इसलिए जब मैं किसी और के लिए आवाज उठाता हूँ, तो उन्हें लगता है कि मैं नंगा हो गया हूँ अपनी सुरक्षा, अपने हित और अपने फायदे का कपड़ा उतार दिया है।

 

लेकिन असलियत ये है कि मेरा नग्गापन उनकी सुविधा की दुनिया के लिए खतरा है। मेरी आवाज उनके मौन की दुकान बिगाड़ती है। मेरी जिद उनकी लापरवाही को उजागर करती है। मेरा सच उनके झूठ की धुलाई कर देता है। और यही वजह है कि मुझे नंगा कहा जाता है क्योंकि मैं वो कपड़ा नहीं पहनता जिसे पहनकर लोग अपनी जिम्मेदारियां छुपाते हैं।

 

समाज में एक अजब किस्म का फैशन चल रहा है जो जितना बड़ा स्वार्थी हो, उतना सभ्य दिखता है। जो जितना बड़ा खिलाड़ियों की तरह अपनी बात गोल-मोल घुमा ले, उतना समझदार माना जाता है। और जो आदमी सीधे, सच्चे तरीके से सवाल पूछ दे, वह तुरंत “नंगा” करार दे दिया जाता है। जैसे सच बोलने का मतलब किसी की इज्जत उतार देना हो। ये वही समाज है जो चोरी को गलती कह देता है, भ्रष्टाचार को सिस्टम का हिस्सा, पर सच बोलने वाले को अपराधी बना देता है।

 

यहाँ तक कि जब मैंने दूसरों के लिए लड़ना शुरू किया, तभी सबसे ज़्यादा मज़ा आया। लोग असहज होने लगे, चेहरों पर नकली मुस्कानें तैरने लगीं, और कानाफूसियाँ बढ़ गईं। उन्हें समझ नहीं आता था कि आखिर मैं क्यों बोल रहा हूँ। उन्हें यह भी समझ नहीं आता था कि चुप रहना भी एक अपराध होता है। पर वे इतने अभ्यस्त हो चुके हैं अपनी सुविधा वाली चुप्पी के कि कोई बोलता हुआ इंसान उन्हें नग्गा, अजीब और बेवजह बहादुर लगने लगता है।

 

लोगों की नजर में मैं नंगा हूँ क्योंकि मैं डर की पैंट नहीं पहनता, स्वार्थ की कमीज़ नहीं डालता और चुप्पी की चादर नहीं ओढ़ता। पर मेरी नजर में उनका नंगापन ज़्यादा बड़ा है क्योंकि उनके पास कपड़े भी हैं, पद भी हैं, मौके भी… फिर भी रीढ़ नंगी है। और आश्चर्य की बात यह है कि समाज सच बोलने वाले को अपमानित महसूस करवाने की कोशिश करता है। लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं जानता हूँ कि जब आप किसी और की लड़ाई लड़ते हैं, तब अपमान नहीं होता तब भीतर से एक अजीब-सी पवित्र संतुष्टि मिलती है। ऐसा लगता है जैसे सत्य किसी गर्म दहकती लौ की तरह शरीर से मिल गया हो। जो लोग मुझे नंगा कहते हैं, वे यह समझ ही नहीं सकते कि सच बोलना शर्म नहीं, बल्कि तपस्या जैसा है।

 

मेरी नजरो में मेरा नग्गापन उस अंतिम नग्गेपन जैसा है जो चिता के लिए बचता है। आखिर में तो सब कुछ उतर ही जाना है। लोग कपड़ों सहित जाएंगे, और मैं अपनी लड़ाईयों, अपने सच और अपने नग्गेपन के साथ।

 

कम से कम मेरे पास यह सुकून तो है कि मैंने चुप्पी की शर्म नहीं पहनी। बाक़ी दुनिया चाहे जो कहे, नंगा वही है जो सच से भागे।

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