संजय सोंधी
(संयुक्त सचिव भूमि एवं भवन विभाग)
दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, देहरादून)
व्यंग्यात्मक संस्मरण
मेरी 42 वर्षीय ‘श्वेत क्रांति’: हुड़दंग से संन्यास की आत्मकथा
मैंने 42 साल से होली नहीं मनाई। हाँ, बिल्कुल सच! 1984 में जब मैं दस साल का था, तब होली ने मेरे साथ ऐसा खेल खेला गया कि मैंने उसी दिन होली के त्योहार से संन्यास ले लिया। मैं होली के रंगों का दुश्मन बन गया। अब लोग कहते हैं, “अरे संजय भाई, इतनी सनक?” अरे सनक नहीं, ये तो क्रांति है—श्वेत क्रांति! सफेद कपड़े, सफेद मन, सफेद जिंदगी। बाकी दुनिया रंगों में डूबी रहे, मैं तो होली का शुद्ध ब्रह्मचारी बनकर बैठा हूँ।
याद है वो दिन? जब मैं 10 साल का बच्चा था और क्लास 6th में पढ़ता था। होली आई और इलाके के बाल ‘वीर’ योद्धाओं ने मुझे पकड़ लिया। गुलाल, कीचड़,वार्निश और गरम पानी मेरे ऊपर फेक दिया। चेहरा रगड़ा, मैं रोया, चिल्लाया, लेकिन वो बोले, “अरे बुरा ना मानो होली है”। इस मस्ती से मेरा दिल टूट गयाIपिछले 4-5 सालों से मेरे साथ ऐसा ही व्यवहार हो रहा था।
उसके बाद फैसला हो गया—बस, अब रंग नहीं! 42 साल बीत गए। न टीका, न अबीर, न पिचकारी। लोग रंग उछालते हैं, मैं दरवाजा बंद करके अंदर बैठा सफेद चादर ओढ़े चाय पीता हूँ। होली का दिन आता है तो फोन और कॉल बेल की रिंग सुनकर दिल धक-धक करता है। लगता है बाहर कोई ‘रंग-यमदूत’ या रंग आतंकवादी खड़ा है, हाथ में बाल्टी लिए पुकार रहा है, “भाई साहब, थोड़ा सा तो लगवा लो!” मैं दरवाजा नहीं खुलता कोई कितनी भी घंटी बजाए मैं बिल्कुल पिन ड्रॉप साइलेंस धारण कर लेता हूँ।मैं खिड़की तक से भी बाहर नहीं देखता
दुनिया कहती है, “होली है, खेलो!” अरे खेलो न, लेकिन मुझे नहीं खेलना लोग रंग में सने नहीं, गंदगी में लथपथ हैं। चेहरा काला-नीला, कपड़े फटे, मुंह से बदबू। और मैं? अंदर से चमकता हुआ, बाहर से बर्फ जैसा साफ। मेरी होली है ‘श्वेत होली’—कोई रंग नहीं, सिर्फ शांति। मैं इन दुनिया वालों के लिए अपने सतीत्व को भंग नहीं कर सकता।लोग कहते हैं, “अरे इतने साल हो गए, अब तो मना लो!” मैं हंसता हूँ और कहता हूँ, “भाई, मैंने 42 साल में जितनी शांति कमाई है, वो तुम्हारी सारी होलियों से ज्यादा बहुमूल्य है।” मैं कोई विश्वामित्र नहीं हूँ जिसकी तपस्या कोई भंग कर सकेI
तो ये रही मेरी होली के रंग विरोधी क्रांति। हुड़दंग से संन्यास। रंगों का बहिष्कार। अब अगर कोई पूछे, “होली खेलोगे?” तो मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—“नहीं भाई, मैं तो पहले से ही होली का बाल ब्रह्मचारी हूँ। मेरा रंग सफेद है, और वो कभी नहीं उड़ता!” मैंने पिछले 42 सालों से अपने इस किले को ढहने नहीं दिया है। “मैं 1984 में जिस रंग अप्रसार संधि में शामिल हुआ था मैं उसके लिए अभी भी प्रतिबद्ध हूं हालांकि इतनी लंबी अवधि में तो बड़े बड़े देश भी अपनी संधियों से मुकर जाते हैं।” इंदिरा गांधी के युग से लेकर आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग तक, मुझमें होली को लेकर कोई बदलाव नहीं आया है; मैं अभी भी वैसा का वैसा ही हूँ।







