नेकी         (लघु कथा)

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राजेंद्र रंजन गायकवाड 

      (सेवा निवृत्त)

केंद्रीय जेल अधीक्षक

 

                    (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

                                 नेकी

                                (लघु कथा)

 

पुराने जमाने की बात है एक छोटे-से गाँव में दो दोस्त रहते थे रामू और श्यामू,,,रामू बहुत सीधा-सादा और मेहनती था। वह सुबह-सुबह खेत में जाता, दिन भर मेहनत करता, शाम को घर लौटकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सादा भोजन करता और फिर सो जाता। उसके घर में न कोई दिखावा था, न चमक-दमक। मिट्टी के बर्तन, पुरानी चारपाई, और दीवार पर टँगी एक पुरानी लालटेन थी। लोग उसे “सीधा रामू” कहकर पुकारते थे।

श्यामू ठीक उल्टा, वह गाँव का सबसे चालाक और स्वार्थी आदमी माना जाता था। उसने कुछ जमीनें खरीद लीं, कुछ साहूकारों से मिलकर छोटा-मोटा धंधा शुरू कर दिया। वह हमेशा अच्छे कपड़े पहनता, गाँव के बड़े-बड़े लोगों के साथ घूमता, और हर किसी को अपनी आवभगत से प्रभावित करता। जब कोई सरकारी अधिकारी आता, तो श्यामू सबसे पहले उसके स्वागत में बिना बुलाए सबसे दौड़ता फूलमाला, मिठाई, और चापलूसी का पूरा खेल खेलता। गाँव के लोग कहते, “श्यामू तो बड़ा आदमी है, देखो कैसे सब उसका सम्मान करते हैं।”

रामू कभी-कभी व्यथित हो जाता और

सोचता, “मैं दिन-रात मेहनत करता हूँ, फिर भी लोग मुझे और मेरी लग्न को मानते क्यों नहीं? श्यामू तो कुछ खास नहीं करता, बस लोगों की खुशामद और सुरा सुंदरी में लगा रहता है और सब उसके ऊपरी आवरण और बड़ी बड़ी बातों से आवभगत देते हैं। क्या जीवन में सच्चाई और मेहनत का कोई मूल्य ही नहीं?” अरे ! ये भी कोई जीवन है?

एक दिन गाँव में बड़ा सूखा पड़ गया। नदी सूख गई, फसलें जल गईं। गाँव के लोग परेशान हो गए। अनाज की कमी हो गई, पानी की समस्या बढ़ गई। श्यामू ने तुरंत मौका देखा उसने अपने साहूकार दोस्तों से मिलकर महँगे दामों पर अनाज बेचना शुरू कर दिया। जो लोग उसके पास जाते, उन्हें वह पहले चाय-पानी कराता, उनकी समस्याएँ सुनता, फिर दोगुने दाम पर अनाज देता। लोग मजबूरन उसके पास जाते, लेकिन मन ही मन उसे कोसते कितना स्वार्थी आदमी है। लेकिन वह किसी की नहीं सुनता, श्यामू की दिखावे की प्रवृत्ति और चमचागिरी अब भी जारी थी, लेकिन अब लोग उसे “लालची श्यामू” कहने लगे थे।

रामू ने अपनी थोड़ी-सी बचत और पिछले साल की कुछ बची अनाज की पूँजी निकाली। उसने गाँव के गरीब परिवारों को बिना ब्याज के अनाज उधार देना शुरू कर दिया जो लोग लौटा सकते थे, लौटाते जो नहीं लौटा सकते थे, रामू उनसे कुछ नहीं कहता। वह खुद भी कम खाकर दूसरों को देता। उसके घर में अब भी वही सादगी थी मिट्टी के बर्तन, पुरानी लालटेन लेकिन शाम को उसके आँगन में गाँव के बच्चे और बुजुर्ग इकट्ठा होने लगे, लोग उससे सलाह लेने लगे उसकी बात सुनने लगे।

सूखा कुछ महीनों बाद टला बारिश हुई, फसलें लहलहाईं और पूरे गांव की खुशी के लिए

एक शाम गाँव के मुखिया ने सबको इकट्ठा किया और कहा- 

इस सूखे में सबसे ज्यादा मदद जिसने की वह है हमारा रामू उसने अपने स्वार्थ को भुलाकर हमें सहारा दिया। आज गाँव में जो शांति और भरोसा, भाई चारा है वह रामू की वजह से है। श्यामू अपने चमचों के साथ रोज महंगी शराब पीकर कार्यक्रम में पहुंचा। देखा कि पूरा गांव तालियाँ बजाकर रामू की वाही वाही कर रामू को घेरकर खड़े हैं, उसकी तारीफ कर इसके गले लग रहे हैं। श्यामू का चेहरा और शराब का नशा उतर गया। उसकी सारी चापलूसी और आवभगत अब किसी काम की नहीं थी, लोग अब उसे सिर्फ़ लालची और स्वार्थी और जलनखोर समझते थे।

रात को रामू अपने घर लौटा। उसकी पत्नी ने पूछा, “आज तुम बहुत खुश लग रहे हो।”

रामू मुस्कुराया और बोला,

“सुनो जी, आज मुझे समझ आ गया।

स्वार्थ की दुनिया में आवभगत तो श्वेत वसन अपराधियों और चमक-दमक वालों को मिलती है लेकिन सच्चा सुख और सम्मान सादगी और नेकी में ही होता है। मैंने आज तक जो दिया, वह मेरे पास हमेशा के लिए रह गया। श्यामू ने जो लिया, वह सब आज उसके हाथ से निकल गया।”

उस रात रामू की पुरानी लालटेन की रोशनी में पूरा परिवार हँसते-बातें करते रहा। बाहर चाँदनी में गाँव शांत था, और रामू के मन में एक अनोखा सुकून था वो सुकून जो चमक-दमक वाले घरों में कभी नहीं मिलता।

सचमुच सुख की जिन्दगी सादगी में है।

जो दिखावा और स्वार्थ पर टिकी हो, वह सिर्फ़ दिखने में बड़ी लगती है, लेकिन अंदर से खोखली होती है, जो सादगी और नेकी से जीता है, उसे न तो कोई छीन सकता है, न कभी अकेला छोड़ सकता है।

 

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