हार से हौसला, असफलता से आ गाज

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सुश्री सरोज कंसारी 

कवयित्री-लेखिका-अध्यापिका 

नवापारा राजिम  

जिला-रायपुर (छ. ग.)

 

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

                           आलेख:

       हार से हौसला, असफलता से आ गाज

                  :सुश्री सरोज कंसारी

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  शुरुआत : एक निवेदन हर विद्यार्थी से

 

परीक्षा का परिणाम केवल अंकों का लेखा-जोखा नहीं, ज़िंदगी की किताब का एक पन्ना भर है। अगर इस पन्ने पर मनचाहे शब्द नहीं लिखे गए, तो याद रखना — पूरी किताब अभी बाकी है। असफलता अंत नहीं, एक नई शुरुआत का पहला अक्षर है। तुम भारत का भविष्य हो, और भविष्य कभी एक परीक्षा से नहीं रुकता।

 

परीक्षा में असफल हो जीवन से खिलवाड़ न करना, भारत के भविष्य हो तुम — एक नई शुरुआत करना। परीक्षा परिणाम तो शुरुआत हैं, आगे और भी इम्तिहान हैं।

 

परीक्षा परिणाम देखने की उत्सुकता हर विद्यार्थी को होती है। लेकिन एक बात अवश्य याद रखिए! किसी कारणवश असफल हो गए तो चिंतित न हों, बिल्कुल तनाव न लें। स्वीकार करें और उसी पल संकल्प करें कि अब पहले से अधिक मेहनत करके अच्छे अंक से उत्तीर्ण होंगे। नकारात्मक बिल्कुल न सोचें और उदास न रहें। अभी तो एक छोटी-सी शुरुआत है। जीवन के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ आपको सिर्फ पास नहीं होना है, अपने कर्तव्य से, अच्छी सोच से, सहयोग से एक नए मुकाम को पाना है। यह एक अवसर है फिर से मेहनत करने का। अपने जीवन से खिलवाड़ न करना, हर पल एक नया अवसर है, नई शुरुआत करना। परीक्षा परिणाम को देखकर ही कोई गलत फैसला न ले विद्यार्थी। अभी तो चलना सीखे हैं, और हार-जीत लगी रहती है।

 

‘परीक्षा’ यह शब्द सुनते ही मन में घबराहट होने लगती है। चाहे आप सालभर मेहनत किए हों, लेकिन यह शब्द ही ऐसा है कि कितने भी होनहार हों, कहीं न कहीं भय होता है — क्या होगा, कैसे होगा? आदि बातें मन-मस्तिष्क को चिंता से घेर लेती हैं। जैसे ही विद्यार्थियों की परीक्षा समाप्त होती है, परिणाम के लिए कुछ विद्यार्थी उत्सुक नजर आते हैं — कब आएँगे रिजल्ट? और कई ऐसे होते हैं जो उत्कृष्ट परिणाम के लिए सोचते हैं, अर्थात् प्रथम स्थान या मेरिट सूची में नाम। हर कोई मेहनत का फल पाना चाहता है। जो किसी कारणवश पढ़ाई में कमजोर होते हैं, वे मिन्नत करते हैं — हे भगवान! मुझे पास कर देना, फिर अगली बार मन लगाकर पढ़ाई पर फोकस जरूर करेंगे।

 

हर विद्यार्थी की स्मरण-शक्ति अलग होती है। किसी को जल्दी याद होता है, तो कोई रट्टू तोता। और अधिकतर ऐसे बच्चे होते हैं जो कितना भी याद करें, भूल ही जाते हैं। हर किसी की परिस्थिति एक-सी नहीं होती। अपने स्तर पर हर विद्यार्थी मेहनत करता ही है। और जिनका मन पढ़ाई में नहीं लगता, मेहनत नहीं करते, वो बच्चे भी परीक्षा में पास होना ही चाहते हैं। क्योंकि फेल होने पर डर होता है — माता-पिता की डाँट पड़ेगी, मित्र मज़ाक उड़ाएँगे, समाज में बदनामी होगी। और जो सिर्फ़ पढ़ाई पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं, ऐसे बच्चे भविष्य में उच्च शिक्षा के लिए कल्पना किए होते हैं — जो डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट बनना चाहते हैं, जिसके लिए अच्छे अंकों की जरूरत होती है।

 

परीक्षा दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘परि’ अर्थात चारों तरफ़, ‘ईक्षा’ का अर्थ है — देखना। जिसका तात्पर्य है चारों तरफ़ देखकर निष्कर्ष निकालना, जाँच-परख करना। परीक्षा में यह महत्त्वपूर्ण है कि जिस क्षेत्र में आप आगे बढ़ना चाहते हैं, उसके योग्य हैं या नहीं। आप उसके मापदंड में खरे उतरते हैं या नहीं? जिस विषय को आप पढ़े हैं, उसकी जानकारी को जानने-परखने के लिए परीक्षा आयोजित की जाती है। जिसमें एक पाठ्यक्रम होता है, उसी से प्रश्न आपको दिए जाते हैं। किस तरह से प्रश्न पूछे जाएँगे, क्या आएगा — इस बात की जानकारी नहीं होती। सरल शब्दों में, यह दूसरों की इच्छा पर आधारित होती है, जिसमें मेहनत के अनुसार फल मिलते हैं।

 

अधिकतर देखा जाता है कि जब भी स्थानीय कक्षा, बोर्ड, उच्च शिक्षा या प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम आते हैं, कहीं खुशी तो कहीं ग़म वाली स्थिति आती है। जो अच्छे अंकों से या सिर्फ पास भी हुए, वे खुश नज़र आते हैं और एक उत्साह का संचार होता है उनके मन में। तो ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो होशियार थे, अच्छे अंक की उम्मीद थी लेकिन नहीं आए, या जो फेल हो गए — उनके मन में निराशा आ जाती है, दुखी हो जाते हैं। कभी-कभी स्थिति बहुत गमगीन हो जाती है। जो संवेदनशील होते हैं, ऐसे विद्यार्थी डर में या हीनभाव से ग्रसित होकर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। अखबार में देखकर हृदय द्रवित हो जाता है। सिर्फ़ परीक्षा में असफल हो जाने से जीवन से खिलवाड़ कर बैठते हैं, जो कि सर्वथा ग़लत है। इस पर गंभीरता से विचार जरूरी है।

 

आज के माहौल में पढ़ाई का बोझ, प्रतिस्पर्धा का भाव व भविष्य के सपने युवावर्ग और विद्यार्थियों पर इस कदर हावी हैं कि सही-ग़लत का फैसला कर पाने में वे असमर्थ हैं, अंजान हैं वे। महज़ एक कागज़ का टुकड़ा आपकी जिंदगी का सफ़र तय नहीं करेगा। पढ़ाई सिर्फ एक डिग्री है, जिसमें पास या फेल हो जाने से कुछ हासिल नहीं होगा। असल परीक्षा तो पढ़ाई के बाद शुरू होती है — जिम्मेदारी की, कर्तव्य की, इंसानियत की और हुनर की। आप सिर्फ़ जीवन में एक-पक्षीय निर्णय न लें।

 

आज दुनिया में जितने काबिल लोग हैं, वे अपनी एक अलग सोच और हुनर की वजह से सफलता की दुनिया के बादशाह बने हैं। जिनमें कई ऐसे हैं जो कई बार फेल हुए परीक्षा में, लेकिन हार नहीं माने। कम पढ़कर या अनपढ़ व्यक्ति भी आज कई क्षेत्रों में — जैसे खेल, साहित्य, संगीत, चित्रकारी, नृत्य, फिल्म उद्योग में — पढ़े-लिखे लोगों से ज्यादा प्रतिष्ठा के पद पर हैं। देश, समाज और परिवार में योगदान देकर खुश हैं। हर व्यक्ति की अलग रुचि होती है। आप सबसे पहले किसी से तुलना करना बंद कर दीजिए। अपनी रुचि तय कर उस दिशा में प्रयास करें।

 

डिग्री तो मिल ही जाएगी, एक बार न सही फिर से कोशिश कीजिए। छोड़ दीजिए लोग क्या कहेंगे। फेल हो गए तो क्या जीना छोड़ देंगे? यह कायरता की निशानी है। अभी तो शुरुआत है। जिंदगी का हर कदम एक अवसर है और हर पल एक इम्तिहान है। जब आपके पास अवसर हैं तो क्यों निराश होना? सिर्फ़ डिग्री लेने से ही आप महान नहीं बनेगे। महान बनने के लिए अपनी कुंठित मानसिकता से लड़िए, विशाल बनाइए अपनी सोच को। देर किस बात की? हीनभाव को जड़ से निकाल फेंकिए अपनी ज़ेहन से। और कूद पड़िए मेहनत की आग में, जहाँ से आप तपकर कुंदन बनकर निखरेंगे। जो आपका मजाक बना रहे थे, वही देंगे सलामी आपको। विश्वास रखिए! मरने का नाम नहीं ज़िंदगी। जीते-जी कुछ कर गुजरने की लगन ही असल में बंदगी है। मरने से पहले एक बार विचार करना, जीते-जी खुद को वतन के नाम करना।

 

आज हम सब सिर्फ दौड़ रहे हैं, आगे जाना चाहते हैं। कुछ बनना और करना चाहते हैं। इसका मतलब नहीं कि अपने परिवार और उन बच्चों की अवहेलना करें जो पिछड़ गए हैं ज़िंदगी की दौड़ में। ये समस्त मानव समाज की जिम्मेदारी है कि मिलकर उन विद्यार्थियों को समझाएँ कि असफल होने से जिंदगी थमती नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत होती है। खासकर अभिभावकों को समझना है कि अपने छोटे बच्चे या युवा विद्यार्थियों के जीवन का मूल्यांकन सिर्फ पास और फेल होने से न करें। उनकी प्रतिभा को हर तरह से परखें और उन्हें मानसिक रूप से हौसला, प्रेम, स्नेह व अपनापन देकर उसी दिशा में आगे बढ़ाएँ जिसमें उसकी रुचि और क्षमता है। अपने बच्चों को फेल होने पर डाँट लगाने, मारने या गुस्सा होने की बजाय उन्हें फिर से कोशिश करने की हिम्मत दें। परीक्षा परिणाम को एकदम गंभीरता से न लें, सहजता से स्वीकार करें। अपने बच्चों के मित्र बने, उनके मन की हर बात जाने। अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकालें और उन्हें भरपूर सहयोग दीजिए। इतने भी अपने में व्यस्त न रहें कि अपने बच्चों की सोच से अंजान रहें और बाद में आपको पछतावा हो।

 

एक संकल्प! याद रखो, अंक तुम्हारी पहचान नहीं, तुम्हारा हौसला तुम्हारी पहचान है। गिरकर उठने वाला ही असली विजेता कहलाता है। परीक्षा में मिले नंबर बदल सकते हैं, पर तुम्हारे भीतर का जज़्बा नहीं। आज अगर असफल हुए हो तो कल की सफलता की नींव रख दी है तुमने। उठो, फिर से चलो। क्योंकि तुम रुकोगे नहीं, तुम झुकोगे नहीं — तुम भारत का कल हो।

 

क्या बिगाड़ पाएँगे चंद कागज के टुकड़े,  

विधाता ने लिखी जो आपकी मुकद्दर।  

निखरेंगे आप एक दिन अपने ही हुनर से,  

दुनिया के सामने बनकर एक सिकंदर।।

 

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