सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका, कवयित्री व शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
नवापारा-राजिम, (रायपुर, छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“वर्तमान में स्थित रहो। कर्म शांति से करो!”
: सुश्री सरोज कंसारी।
“जिंदगी एक पावन नदी है, इसे हर दिन खूबसूरत बनाते जाना है। “
===================================
परिस्थितियाँ कभी भारी नहीं होतीं,
वे तो बस बदलते मौसम हैं।
थका नज़रिया पहाड़ बनाता है,
दृष्टि बदले तो काँटा भी फूल है।
इस संसार में मनुष्य वास्तव में जी नहीं रहा, बस समय के साथ गुज़र रहा है। वह सीखने की बजाय लड़ रहा है, बार-बार वही गलतियाँ दोहरा रहा है, और फिर भी विश्व बन्धुत्व का पाठ रट रहा है। यहाँ विरोधाभास साफ है..मुँह से हम एकता की बात करते हैं, पर कर्म से अलगाव को पालते हैं। दर्शन यही कहता है कि जीवन का सार समाधान में नहीं, समाधान की दृष्टि में है। बुद्धिमान वही है जो समस्या के आने से पहले उसके बीज को पहचान ले, क्योंकि बीज को मिटाना आसान है, वृक्ष को नहीं। जो बुद्धिमान नहीं है, वह समस्या में गिरकर ही होश में आता है, और तब सीख की कीमत बहुत ऊँची चुकानी पड़ती है। शायद सच्चा ज्ञान यही है कि हम जीना सीखें, केवल गुज़रना नहीं; और लड़ने से पहले समझें, ताकि गलतियाँ गुरु न बनें, सबक बनें।
बाहरी परिस्थितियों को बदलना हमेशा मुमकिन नहीं होता, लेकिन खुद के भीतर की शांति को बनाए रखना ही मनुष्य की सर्वोच्च आध्यात्मिक और दार्शनिक विजय है। जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि ऊँचा उठने के लिए पहले झुकना पड़ता है। अहंकार हमें तानकर रखता है, और तनी हुई चीज़ जल्दी टूट जाती है। पर जो विनम्रता से झुकता है, वो ज़मीन से जुड़ता है, वहाँ से सीखता है, अनुभव बटोरता है, और जब उठता है तो खाली हाथ नहीं होता। झुकना कमज़ोरी नहीं, बल्कि ग्रहणशीलता है – जैसे पेड़ का झुककर फल देना, या नदी का झुककर रास्ता बनाना। सच्ची उन्नति वही है जो गिरकर नहीं, झुककर हासिल की जाए, क्योंकि झुकने वाला ही कुछ लेकर उठता है, और तनकर खड़ा रहने वाला अक्सर वही का वही रह जाता है।
आगे सोचें तो झुकने की कला सिर्फ सिर झुकाने तक सीमित नहीं है। कभी परिस्थितियों के आगे झुकना पड़ता है ताकि टूट न जाएँ, कभी अपने विचारों के आगे झुकना पड़ता है ताकि नए सत्य को जगह मिले। जो झुकना नहीं जानता, वो सीखना भी नहीं जानता, क्योंकि सीखने के लिए पहले ये मानना पड़ता है कि मैं सब कुछ नहीं जानता।
इसीलिए सबसे ऊँचे लोग अक्सर सबसे ज्यादा झुके हुए मिलते हैं। पहाड़ की चोटी जितनी ऊँची होती है, उसकी जड़ें उतनी ही गहरी जमीन में धँसी होती हैं। झुककर हम जड़ें मजबूत करते हैं, और मजबूत जड़ें ही हमें ऊपर तक ले जाती हैं। इसलिए जीवन में झुकाव को हार मत समझो, ये वो तैयारी है जिसके बाद उड़ान आती है।
जब हम किसी संकट पर तुरंत चिल्लाते या रोते हैं, तो वह एक’ अचेतन प्रतिक्रिया होती है। लेकिन जब हम शांत रहकर सोचते हैं, तो वह चेतन अनुक्रिया होती है। जो व्यक्ति अपने मन को काबू में रख लेता है, उसे दुनिया की कोई भी परिस्थिति तोड़ नहीं सकती।
इतिहास गवाह है कि सबसे बड़े बदलाव तलवार से नहीं, शांति से आए हैं। बुद्ध ने क्रोध पर मौन से विजय पाई, गांधी ने अहिंसा से साम्राज्य झुका दिया। प्रकृति भी यही सिखाती है — आंधी में जो पेड़ अकड़कर खड़े रहते हैं, वो टूट जाते हैं। पर जो बाँस की तरह झुक जाते हैं, वो तूफान निकल जाने के बाद फिर सीधे खड़े हो जाते हैं।
इसलिए अगली बार जब जीवन तुम्हें झुकाए, तो उसे हार मत समझना। समझना कि ब्रह्मांड तुम्हें जड़ें मजबूत करने का मौका दे रहा है। क्योंकि जो आज झुकना जानता है, वही कल इतना ऊँचा उठेगा कि दुनिया को नया नज़रिया देगा। सच्ची ताकत शोर में नहीं, उस मौन में है जहाँ मनुष्य अपने भीतर के तूफान को थाम लेता है।
मनुज को सदा वर्तमान में स्थित रहने का अभ्यास करना चाहिए। अतीत को स्मृति में रहने देना चाहिए, उसे पुनः सामने न लाना चाहिए। कर्म शांत चित्त से करना ही जीवन का सार है। जीवन स्वयं में कठिन नहीं, उसे कठिन मनुष्य की आसक्ति और विक्षेप बनाते हैं। अतः आत्म-प्रेम आवश्यक है, और आत्म-रक्षा ही सबसे बड़ी साधना।
———————————————————–
।। जय जय भारत ।।







