सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका, कवयित्री व शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति,
नवापारा-राजिम, (रायपुर, छ.ग.)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“जो कार्य आज हो सकता है, उसे कल के लिए मत टालो”
: सुश्री सरोज कंसारी
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हे ! मनुज, करुणा रख अपने मन में,
विवेक सजाए रख अपनी दृष्टि में।
बाँटता चल प्रेम व शांति का उजाला,
यही दीप जलेगा तेरे भीतर व बाहर में।
जिंदगी अपने स्वाभाविक प्रवाह में चलती रहती है—कभी हँसकर आशा जगाती है, तो कभी रोकर मन को निर्मल करती है। अतीत में जो घट चुका, वह लौटकर वही रूप में पुनः नहीं आता, क्योंकि काल की गति सदैव आगे की ओर होती है। यदि हम निराशा में डूबे रहें और बीती हुई बातों को प्रतिदिन स्मृति में चुभाए बैठे रहें, तो वर्तमान के क्षण अर्थहीन हो जाएँगे। इसलिए आवश्यक है कि हम अतीत की छाया से बाहर निकलकर वर्तमान के प्रकाश में कदम रखें, ताकि जीवन का प्रवाह अवरुद्ध न हो।
यह जिंदगी बड़ी अनमोल है—यह दोबारा नहीं मिल सकती, यह केवल एक बार मिली है। इसलिए इसे व्यर्थ की चिंताओं में नष्ट करना उचित नहीं। यह ज़िंदगी हँसने के लिए है, ताकि मन का भार हल्का हो; जीने के लिए है, ताकि हर क्षण का अनुभव किया जा सके; सीखने के लिए है, ताकि अनुभव से ज्ञान उपजे; और अविरल आगे बढ़ते रहने के लिए है, ताकि ठहराव हमें जड़ न कर दे। साथ ही, यह मन को सदा शांत और स्थिर रखने के लिए भी है, क्योंकि अशांत मन किसी भी उपलब्धि का सुख नहीं ले पाता।
आज का इंसान निरंतर दौड़ रहा है—पद, प्रतिष्ठा और भौतिक साधनों की ओर। पर इस तीव्र गति में वह भीतर का चैन और संतोष खो बैठा है। जितना अधिक पाता है, उतनी ही नई इच्छाएँ जन्म लेती हैं। जबकि सच्ची तृप्ति बाहर की प्राप्ति में नहीं, भीतर की स्थिरता में है। यदि जीवन को केवल दौड़ समझ लिया जाए, तो मंज़िल आने पर भी आनंद शेष नहीं बचता। हमेशा स्वयं को सकारात्मक रहें, प्रसन्न रहें, स्थिर रहेंऔर वर्तमान को सुंदर बनाने में निरंतर प्रयास करें।
आज का समय इस भीषण और संवेदनहीन संसार में जागरूकता लाने और स्वयं जागरूक बने रहने का है। जब चारों ओर स्वार्थ, छल और संवेदनशून्यता का बोलबाला हो, तब विवेक ही मनुष्य की सबसे बड़ी ढाल बनता है। हर तरह के मक्कार लोग हैं—जो मीठे वचनों से भ्रमाते हैं और अवसर पाते ही पीठ पीछे वार करते हैं।
इसलिए सबके भले की कामना अवश्य करो, क्योंकि करुणा मनुष्यता का मूल है। पर साथ ही यह भी ज्ञात रहे कि यह दुनिया सदैव सरल और निष्कपट नहीं है। यहाँ मक्कारी और संवेदनशून्यता भी उतनी ही वास्तविक है जितनी दया और सत्य। जागरूक व्यक्ति वही है जो हृदय में करुणा रखते हुए भी आँखों में विवेक रखता है।
जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करें, पर अपनी संभावनाओं को भी पहचानें। हर दिन एक नई शुरुआत है—यदि बीता कल बोझ था, तो आज उसे उतार देने का अवसर भी है। छोटे-छोटे सत्कर्म, सच्ची मुस्कान और निस्वार्थ सहायता ही जीवन को गहराई देते हैं। यही वे दीप हैं जो न केवल हमारा मार्ग आलोकित करते हैं, बल्कि दूसरों के अंधकार को भी मिटाते हैं। अंततः याद रखो—समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। जो आज किया जा सकता है, उसे कल पर मत टालो। प्रेम बाँटो, ज्ञान बाँटो, और शांति बाँटो। क्योंकि जो हम देते हैं, वही लौटकर हमारे पास आता है। यही जीवन का शाश्वत नियम है, यही इसकी सबसे बड़ी सीख।
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।। जय जय भारत ।।







