ब्यूरो भोपाल (म. प्र.): प्रेरणा गौतम
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
“डेढ़ सौ करोड़ आबादी वाले देश में 200 करोड़ पेड़ो की बलि,क्या ये है विश्व गुरु का विकास मॉडल??
जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच का समय भारत के पर्यावरणीय इतिहास में एक ऐसे दौर के रूप में सामने आया है, जो केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर सवाल है। कागजों पर पर्यावरण संरक्षण की बड़ी बातें करने वाली व्यवस्था के बीच जब हम जमीनी सच्चाई को देखते हैं तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है। यह तस्वीर बताती है कि विकास की दौड़ में प्रकृति लगातार पीछे छूटती जा रही है। जब इस स्थिति को व्यापक संदर्भ में देखा जाता है तो तस्वीर और भी भयावह हो जाती है। पिछले दो दशकों में देश में अनुमानित रूप से 200 करोड़ पेड़ों के बराबर ट्री कवर का नुकसान हुआ है। डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि अस्तित्व का संकट बनता जा रहा है।
सरकारी रिकॉर्ड और विभिन्न विश्लेषणों से यह स्पष्ट होता है कि विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर वन भूमि को समाप्त किया गया है। यह वही भूमि थी जो जलवायु संतुलन बनाए रखने, वर्षा चक्र को नियंत्रित करने और लाखों जीवों के जीवन का आधार थी। खनन परियोजनाएं, जलविद्युत योजनाएं और ट्रांसमिशन लाइनें विकास के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, लेकिन जब इनके लिए जंगलों का सफाया होता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह विकास किसके लिए है।
सरकार का तर्क हमेशा यही रहता है कि देश को आगे बढ़ाना है और विकास जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि विकास की परिभाषा क्या सिर्फ सड़कें, पुल, बिजली और ऊंची इमारतें हैं। क्या विकास का मतलब यह है कि हम अपनी ही सांसों को गिरवी रख दें। जब हर साल बढ़ती गर्मी लोगों को झुलसा देती है, जब हवा में घुलता जहर लोगों की सेहत को धीरे धीरे खत्म कर रहा है, जब पानी की गुणवत्ता गिरती जा रही है, तब यह तथाकथित विकास अपने असली रूप में सामने आता है। यह विकास मजबूत नहीं बल्कि अस्थायी और विनाशकारी दिखाई देता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह सब जानते हुए भी एक अजीब सी चुप्पी कायम है। सवाल उठाने वालों को अक्सर विकास विरोधी करार दिया जाता है, जैसे पर्यावरण की बात करना कोई अपराध हो। लेकिन असली अपराध तो वह है जो भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को आज ही खत्म कर रहा है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं बल्कि उस हकीकत का आईना है जिसमें नीतियां जनता के व्यापक हित के बजाय कुछ खास परियोजनाओं और ताकतवर हितधारकों के पक्ष में झुकी नजर आती हैं।
आज स्थिति यह है कि आम जनता की चिंता सड़कों तक पहुंच चुकी है। लोग अपनी आवाज उठा रहे हैं, विरोध कर रहे हैं, लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या यह आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है। या फिर वहां सुनने की संवेदनशीलता खत्म हो चुकी है। यदि यही स्थिति बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का आक्रोश व्यवस्था को झकझोर देगा।
सरकार को यह समझना होगा कि पर्यावरण कोई विकल्प नहीं है बल्कि जीवन की बुनियाद है। पेड़ सिर्फ लकड़ी नहीं होते, वे जलवायु संतुलन का आधार होते हैं, वे वर्षा चक्र को बनाए रखते हैं, वे मिट्टी को बचाते हैं और हवा को शुद्ध करते हैं। जब इतने बड़े स्तर पर पेड़ों का नुकसान होता है तो इसका प्रभाव केवल प्रकृति पर नहीं बल्कि सीधे तौर पर इंसानी जीवन पर पड़ता है।
विडंबना यह है कि एक ओर हरित योजनाओं, स्वच्छता अभियानों और पर्यावरण संरक्षण की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर जंगलों को समाप्त करने की अनुमति दी जाती है। यह दोहरा दृष्टिकोण अब छिपा नहीं रह गया है। यदि कुछ समय के लिए सुविधाओं के कृत्रिम साधनों को हटा दिया जाए तो शायद यह महसूस किया जा सके कि आम आदमी किस तरह की हवा और परिस्थितियों में जी रहा है।
यह लेख केवल आलोचना नहीं है बल्कि उस भरोसे की अभिव्यक्ति है जो धीरे धीरे टूटता जा रहा है। विकास जरूरी है, लेकिन वह विकास जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले। हमें ऐसे मॉडल की जरूरत है जो टिकाऊ हो, जो आने वाले समय को सुरक्षित करे और जो केवल आज के लाभ के लिए भविष्य को दांव पर न लगाए।
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम इस नुकसान की भरपाई कर पाएंगे। क्या हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण दे पाएंगे या फिर उन्हें केवल कंक्रीट के जंगल और जहरीली हवा का वारिस बना देंगे।
सरकार को अब मूक दर्शक बने रहने की आदत छोड़नी होगी। यह समय है जागने का, समझने का और अपनी नीतियों में बदलाव लाने का। क्योंकि यदि जनता का धैर्य टूट गया तो यह केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक बड़ा संकट बन जाएगा।
मेरा बस एक सवाल है पेड़ों की बलि देकर जो विकास सामने आ रहा है, क्या वह सच में विकास है या फिर विनाश का एक नया नाम।







