सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
ओहदा
एक बार शेर को दरबारियों ने बताया कि, जंगल में एक चूहा बहुत बुद्धिमान और चतुर हो गया है और वह अब आपके लिए खतरा बनता जा रहा है. शेर को हंसी आ गई. उसने पूछा.
“मुझे…और खतरा! वह भी एक चूहे से?
कुछ सोच विचार कर शेर ने दरबारियों से कहा.
“ठीक है, उसे मेरे सामने पेश करो. मैं भी देखना चाहूंगा कि, वह मेरे लिए कैसे खतरा बन सकता है?”
सिपाही शेर की आज्ञा का पालन करते हुए चूहे की खोज में निकल पड़े. दरबार में दरबारियों ने शेर को समझाया और बताया.
“चूहा बहुत वाक् पटु है इसलिए वह जब दरबार में लाया जाए तो आप उससे कुछ मत कहिएगा.बस चुप रहिएगा. बाकी हम संभाल लेंगे.”
शेर दरबारियों की बात मान लेता है.उधर चूहे को ढूंढ़ने गए सिपाही चूहे को ढूंढ़ कर लाते हैं और शेर के सामने पेश करते हैं. चूहा दरबार में चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहता है. शेर भी अपनी हंसी दबाए हुए चुपचाप चूहे को देखता रहता है. बहुत देर शेर को खामोश देखकर अंततः चूहे ने ही अपनी जुबान खोली और शेर से पूछा.
“मुझे बताया जाए कि, मुझे यहां क्यों लाया गया है? मेरा गुनाह क्या है?”
शेर ने कोई जवाब नही दिया और चुपचाप चूहे की ओर जिज्ञासा पूर्ण नजरों से घूरता रहा. सारे दरबारी भी शांत और खामोश बैठे रहते हैं. शेर को अपनी ओर घूरता देख चूहा जरा भी विचलित नहीं होता है और सभी से निडरता पूर्वक कहता है.
“ठीक है, आप लोगों को अगर मुझसे कुछ नहीं कहना है तो मैं स्वयं ही अपनी पैरवी कर लेता हूं.”
शेर अभी भी खामोश था. परंतु चूहे की बात सुनकर सारे दरबारी घबरा गए. तब उसमें से एक दरबारी ने चूहे को सारी बात बताई. चूहे ने उसकी बात बहुत ध्यान से सुनी और जोर जोर से हंसने लगा और शेर से बोला.
“जंगल के राजा मेरे बारे मे ये बातें आपको किसने बताई?”
शेर ने बिना कुछ बोले दरबारियों की ओर इशारा कर दिया. चूहा फिर जोर जोर से हंसने लगा. इस बार दरबारियों के साथ शेर भी आश्चर्यचकित होकर चूहे की ओर देखने लगा. सभी यह सोच रहे थे कि, आखिर चूहा अब किस बात पर हंस रहा है? शेर के दरबार का माहौल शांत होने पर चूहे ने शेर से कहा.
“आप ऐसे मूर्ख दरबारियों के साथ जंगल का राज पाट कैसे चला सकते हैं?”
दरबारियों को चूहे की बात बहुत बुरी लगी. तब एक दरबारी ने चूहे से कहा.
“तुम हमें मूर्ख कैसे कह सकते हो? अब तुम्हारा यहां से बचकर निकलना नामुमकिन है. क्या तुम अपने आप को बहुत बुद्धिमान और चतुर समझते हो?”
चूहे ने कहा.
“मैं तो ऐसा हरगिज नहीं मानता और ना ही ऐसा कहता हूं. यह तो तुम लोग कहते हो कि, मैं बहुत बुद्धिमान और चतुर हूं.”
शेर और सभी दरबारी चूहे की वाकपटुता के सामने निरुत्तर हो गए. शेर को भी अब समझ आने लग गया था कि, चूहा उन्हें अपनी बातों के जाल में फंसाता जा रहा है. शेर अपने दरबारियों की सलाह मानते हुए अभी भी चुपचाप चूहे की बातों को गौर से सुन रहा था. चूहे ने शेर से कहा.
“आपका और मेरा कोई मुकाबला ही नहीं है. आप मुझसे जीत भी गए तो आपको क्या मिलेगा? इससे आपके ओहदे में कोई बढ़ोतरी नहीं होने वाली है.”
शेर को चूहे की बातें अब सही लगने लगी थीं और यही बात शेर के दरबारीगण नहीं चाहते थे. इसलिए उन्होंने शेर से चूहे की बातों पर गौर करने से मना किया. तब चूहे ने अपनी बात समाप्त करते हुए कही.
“आप अपनी शक्ति और समय का सही उपयोग कीजिये. इसलिए अगर आपको मुकाबला ही करना है तो अपने पड़ोसी जंगल के शेर से कीजिए. उससे जीतने पर आपका ओहदा बढ़ेगा और आप उस जंगल के भी राजा बन जाएंगे.”
इतना कह कर चूहा बिना किसी से इजाजत लिए वहां से चला जाता है. चूहे के वहां से जाते ही सारे दरबारी शेर से पूछते हैं.
“आपने चूहे को रोका क्यों नहीं? उसे जाने क्यों दिया?”
शेर जो अब तब इतनी देर से शांत और खामोश अपने सिंहासन पर बैठा था. उसने अपने दरबारियों से कहा.
“वैसे उसने ग़लत क्या कहा था? चूहे ने जो सलाह मुझे दी वैसी सलाह तुम लोगों की ओर से मुझे मिलनी चाहिए थी.”
शेर का जवाब सुनकर सारे दरबारी निरुत्तर हो गए.







