प्रभारी सम्पादकः दिनेश शास्त्री
(नया अध्याय, देहरादून)

हिन्दी साहित्य के सूर्य भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की जयंती है आज, ,,,,,,,
डा. अतुल शर्मा
इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा जा सकता है। क्योंकि हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार और साहित्य में गौरव प्रदान करने वाले भारतेंदु हरिश्चन्द्र आज भी प्रासंगिक हैं।
जब मैने उनका लिखा नाटक,,, अंधेर नगरी पढ़ा तो यह रोचक होने के साथ साथ तीखा व्यग्य भी लगा।
पराधीन भारत में लिखे इस नाटक को लिखना किसी जोखिम से कम नहीं था।
सौ वर्षों से यह नाटक लगातार समय समय पर मंचित हुआ हैं।
आपातकाल में इस नाटक को बहुत खेला गया। विभिन्न नाट्य शैलियों में हमने इसकी प्रस्तुतियों को देखा है । बड़े रंग निर्देशकों ने इसे प्रस्तुत किया। लोकरंग को भी इसमे डाला जाता रहा है।
युग मंच नैनीताल ने कुमाऊँ के लोक संगीत और गायन का अद्भुत प्रयोग किया है। वरिष्ठ रंगकर्मी ज़हूर आलम और उनके साथियों ने इसे प्रस्तुत किया था।
मैने दून बाल नुक्कड़ नाटक दल के बाल रंग मंच द्वारा प्रस्तुतियां नुक्कड़ पर सैकड़ों बार दी है। देहरादून मसूरी ग्रीष्मोत्सव शरदोत्सव आदि मे हमारी यह प्रस्तुति आमंत्रित हुई है।
हिन्दी साहित्य का एक खास समय “भारतेंदु काल” के नाम से जाना जाता है। पं रामचंद्र शुक्ल से लेकर आजतक के आलोचकों ने भारतेंदु हरिश्चन्द्र को भाषा और कथ्य की दृष्टि से युग प्रवर्तक कहा है।
इनकी दूसरी कृति है भारत दुर्दशा। यह भी तब लिखा गया जब देश गुलाम था।
साहित्य के द्वारा भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने जन चेतना जगाई थी।







