राजेंद्र रंजन गायकवाड
(संरक्षक)
(आदर्श समाज स्वप्न साकार संस्था)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
(संस्मरण 26)
सम्मेलन की सार्थकता सिद्ध हो,,
मैं विगत चार दशकों में अनेक कार्यक्रम/ सम्मेलन में सहभागी और सहयोगी रहा हूं। इनसे मैने बहुत सीखा हूँ या सीख रहा हूं। बदलते परिवेश और वर्तमान के हालातों में विकास क्षेत्र (NGO/सोशल सेक्टर/ सामाजिक/ साहित्यिक / सांस्कृतिक/ राजनीतिक/ आर्थिक ) के सम्मेलनों को समावेशी बनाने के व्यावहारिक कुछ समस्याओं का समाधान “अतिरिक्त सुविधा” जोड़ने से नहीं, बल्कि सम्मेलन के डिजाइन, पावर स्ट्रक्चर और उद्देश्य को बदलने से होता है। जैसे अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व खत्म करना,बहुभाषी प्रारूप अपनाएं,मुख्य सत्र हिंदी/क्षेत्रीय भाषाओं में हों, अंग्रेजी में अनुवाद (simultaneous interpretation) उपलब्ध हो।
आधुनिक ऐप्स/ तकनीक का इस्तेमाल करें (जैसे भाषिणी, Cardzilla) और स्लाइड/सामग्री पहले से कई भाषाओं में उपलब्ध कराएं।
पैनलिस्ट्स और मॉडरेटर से अपेक्षा रखें कि वे सरल और सहज भाषा बोलें जटिल अंग्रेजी शब्दजाल से बचें। गैर-अंग्रेजी या तकनीकी भाषा बोलने वालों को प्रश्न पूछने और बोलने के लिए अलग से समय और प्रोत्साहन दें।
आजकल सबसे बड़ी समस्या फंडर्स और बड़े संगठनों का दबदबा कम करना एजेंडा को-डिज़ाइन करें जमीनी संगठनों, प्रभावित समुदायों और छोटे NGOs को एजेंडा बनाने में बराबर की भूमिका दें। सिर्फ “टोकन” प्रतिनिधि न बुलाएं। पैनल में 50% से ज्यादा सीटें जमीनी कार्यकर्ताओं, सामुदायिक नेताओं और प्रभावित लोगों के लिए आरक्षित रखें और उनका हौसला बढ़ाएं, उनके कथन / वक्तव्य को न दबाए।
फंडर्स को “सुनने” और “सीखने” की भूमिका में रखें, न कि मुख्य वक्ता के रूप में। पारंपरिक पैनल कम करें या खत्म करें उसकी जगह पीयर लर्निंग सर्कल्स, समस्या-समाधान वर्कशॉप्स और “समान चुनौतियों वाले संगठनों” के बीच खुली बातचीत रखें। साथ ही जमीनी कार्यकर्ताओं और प्रभावित समुदायों की भागीदारी बढ़ाना पूरी स्पॉन्सरशिप दें ,यात्रा, ठहरने, खाने और रजिस्ट्रेशन फीस का पूरा खर्च पहले से कवर करें (रिइंबर्समेंट का इंतजार न कराएं)। स्थान चुनते समय छोटे शहरों/जिलों को प्राथमिकता दें या हाइब्रिड फॉर्मेट अपनाएं। फ्लोर सीटिंग, साझा भोजन व्यवस्था और अनौपचारिक नेटवर्किंग स्पेस रखें, ताकि पदानुक्रम कम हो।
लाइव्ड एक्सपीरियंस (वास्तविक अनुभव) को ज्ञान का स्रोत मानें और प्रभावित समुदायों के लोगों को सिर्फ कहानी सुनाने के लिए नहीं, बल्कि नीति और समाधान बनाने में शामिल करें। साथ ही ध्यान रहें, ज्यादा और एक जैसे बोलने या एक ही बात को दुहराने वाले वक्ताओं को रोके।
उपलब्धियों के प्रदर्शन से सामूहिक सीख की ओर बढ़ना उद्देश्य स्पष्ट करें, “हम क्यों इकट्ठा हो रहे हैं?” अगर जवाब “फंडिंग दिखाना” या “नेटवर्किंग” है, तो फॉर्मेट बदलें। आर्ट, थिएटर, स्टोरीटेलिंग, ड्रम सर्कल्स या शेयरिंग सर्कल्स जैसे प्रारूप अपनाएं, जहां हर कोई योगदान दे सके।
हर सत्र के बाद “हमने क्या सीखा और आगे क्या करेंगे” का सामूहिक रिफ्लेक्शन रखें।
सफलता की कहानियों के साथ-साथ असफलताओं और चुनौतियों पर भी खुली चर्चा को प्रोत्साहित करें। किसी के सुझाव को गंभीरता से लें,,यथोचित चर्चा करें।
कार्यक्रम में समग्र समावेशी डिजाइन (शुरुआत से) संगठक टीम विविध हो (जाति, वर्ग, लिंग, विकलांगता, क्षेत्र, भाषा के आधार पर)।
विकलांगता समावेशन को शुरू से शामिल करें साइनेज, रैंप, साइनेज लैंग्वेज इंटरप्रिटर, ब्रेल सामग्री, साइलेंट रूम आदि। बजट का बहुत छोटा हिस्सा (अक्सर 3% से कम) इसमें लगता है।
“एक्सेस बिल्ड करना” के बजाय “बैरियर हटाना” का नजरिया अपनाएं।
रजिस्ट्रेशन फॉर्म में जरूरतों (भाषा, पहुंच, आहार, देखभाल) पूछें और उसी के अनुसार व्यवस्था करें। लागू करने के लिए व्यावहारिक कदम चरण क्या करें योजना विविध आयोजन समिति बनाएं, उद्देश्य और पावर डायनामिक्स पर चर्चा करें। बजटसमावेशन (अनुवाद, यात्रा सहायता, पहुंच) को मुख्य बजट में रखें
प्रारूप ,पैनल कम, इंटरैक्टिव और पीयर लर्निंग ज्यादा हो। मूल्यांकन कितने बड़े लोग आए” के बजाय “कितने नए आवाजें सुनी गईं और क्या सीखा” मापें और आगे की रणनीति तैयार करें।
मुख्य बात समावेशन कोई “अतिरिक्त काम” नहीं है। जब कार्यक्रम / सम्मेलन का मकसद सिर्फ फंडिंग या ब्रांडिंग न होकर सामूहिक सीख, पावर शिफ्ट और वास्तविक समस्या-समाधान हो, तो ये बदलाव स्वाभाविक रूप से संभव हो जाते हैं। कई संगठन (जैसे ड्रीम अ ड्रीम के “Change the Script” और कुछ क्लाइमेट/जेंडर इवेंट्स) पहले से ऐसे प्रयोग कर रहे हैं और दिखा रहे हैं कि यह संभव भी है और प्रभावी भी हो सकते हैं।






