ब्रिक्स 2026 और भारत: ‘पिरामिड’ से ‘साझेदारी’ तक

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✍ आशीष कुमार त्रिवेदी 

        (एडवोकेट)

         बिहार

 

               (नया अध्याम, उत्तराखण्ड)

 

 

ब्रिक्स 2026 और भारत: ‘पिरामिड’ से ‘साझेदारी’ तक

 

 

भारत के पास वर्ष 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता ऐसे समय आई है, जब वैश्विक राजनीति पुराने शक्ति-संतुलन से आगे बढ़कर अधिक जटिल और बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश कर रही है। व्यापारिक तनाव, युद्ध और भू-राजनीतिक संघर्ष, ऊर्जा असुरक्षा, आपूर्ति शृंखला की चुनौतियां, तकनीकी असमानता और वैश्विक संस्थाओं की प्रतिनिधिकता पर उठते सवाल—इन सबने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

 

ऐसे समय में भारत ने ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय वैश्विक दक्षिण और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग तथा वैश्विक शासन व्यवस्था में अधिक प्रतिनिधित्व की आवाज उठाने वाले मंच के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की है। भारत की 2026 की अध्यक्षता का मूल मंत्र—“सुदृढ़ता, नवाचार, सहयोग और टिकाऊपन के आधार पर भविष्य का निर्माण”—इसी दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।

 

ब्रिक्स अब केवल आर्थिक समूह नहीं-

ब्रिक्स का आरंभ ब्राजील, रूस, भारत और चीन के साथ हुआ था। 2006 में समूह के रूप में इसकी औपचारिक राजनीतिक समन्वय प्रक्रिया शुरू हुई और 2009 में पहला शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRICS हुआ। इसके बाद 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात तथा 2025 में इंडोनेशिया के शामिल होने से इसका दायरा और व्यापक हो गया। वर्तमान संरचना में 11 पूर्ण सदस्य हैं।

 

इस विस्तार ने ब्रिक्स के आर्थिक महत्व के साथ-साथ उसके राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व को भी बढ़ाया है। लेकिन इसके साथ एक बुनियादी चुनौती भी सामने आई है—क्या अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक प्राथमिकताओं और विदेश नीति वाले देशों को लंबे समय तक साझा मंच पर प्रभावी ढंग से साथ रखा जा सकता है? भारत का उत्तर टकराव नहीं, बल्कि सहमति के क्षेत्रों का विस्तार है।

 

मतभेदों के बीच साझा जमीन तैयार करना –

ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच कई महत्वपूर्ण मतभेद हैं। भारत और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और सीमा संबंधी विवाद हैं। रूस और पश्चिम के बीच गहरा तनाव है। पश्चिम एशिया के प्रश्नों पर भी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं और दृष्टिकोण पूरी तरह समान नहीं हैं। मतभेदों के बीच साझा जमीन तैयार करना मतभेदों के बीच साझा जमीन तैयार करना है। फिर भी व्यापार, ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक, विकास वित्त और आपूर्ति शृंखला जैसे क्षेत्रों में साझा हित मौजूद हैं। भारत की कूटनीति इसी साझा जमीन को मजबूत करने पर जोर देती दिखाई देती है। 

भारत का संदेश मूलतः यह है कि दुनिया के नियम और वैश्विक संस्थाओं की निर्णय-प्रक्रिया केवल पुराने शक्ति-संतुलन के आधार पर निर्धारित नहीं की जा सकती। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और विकास में ग्लोबल साउथ की भूमिका कहीं अधिक बड़ी है। इसलिए वैश्विक शासन संस्थाओं में भी उसकी भागीदारी अधिक प्रतिनिधिक होनी चाहिए। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार भारत की बहुपक्षीय कूटनीति का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। यह केवल भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का प्रश्न नहीं है। इसके पीछे एक व्यापक अवधारणा है—जो देश वैश्विक अर्थव्यवस्था और विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, उन्हें वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में भी प्रभावी भागीदारी मिलनी चाहिए। अर्थात विकासशील देश केवल नियमों का पालन करने वाले न रहें, बल्कि वैश्विक नियमों को आकार देने वाले बनें।

‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ से ‘साझेदारी की मेज’ तक पहुंचना इसी परिवर्तन का प्रतीक है।

 

पश्चिम-विरोध नहीं, रणनीतिक संतुलन-

भारत की विदेश नीति की विशेषता यह है कि वह किसी एक शक्ति-गुट के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय मुद्दों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंधों को संचालित करने की कोशिश करता है। इसी संदर्भ में ब्रिक्स को ‘एंटी-वेस्ट’ मंच के बजाय बहुध्रुवीय और अधिक संतुलित वैश्विक व्यवस्था के लिए सहयोग का मंच समझना अधिक उचित होगा।

भारत के लिए जहां राष्ट्रीय हितों की रक्षा आवश्यक है, वहां दृढ़ता महत्वपूर्ण है; जहां सहयोग की संभावना है, वहां सहयोग; और जहां मतभेद हैं, वहां संवाद। यही व्यावहारिक बहुपक्षवाद भारत की कूटनीतिक पहचान बनता जा रहा है।

 

साझा ब्रिक्स मुद्रा नहीं, व्यावहारिक वित्तीय सहयोग-

ब्रिक्स के आर्थिक विमर्श में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने का विचार महत्वपूर्ण है। लेकिन भारत के लिए प्राथमिकता किसी जल्दबाजी वाली साझा ब्रिक्स मुद्रा की बजाय स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, भुगतान प्रणालियों के बेहतर संपर्क और वैकल्पिक वित्तीय तंत्र विकसित करने की है। इससे सदस्य देशों के बीच लेन-देन की लागत कम करने, भुगतान जोखिमों को विविध बनाने और वित्तीय स्वायत्तता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

हालांकि इसे वैश्विक डॉलर व्यवस्था के तत्काल विकल्प के रूप में देखना वास्तविकता से दूर होगा। बड़ा बदलाव किसी एक घोषणा से नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्रा व्यापार, डिजिटल भुगतान और वैकल्पिक सीमा-पार भुगतान तंत्र के क्रमिक विस्तार से आएगा। यही भारत का अपेक्षाकृत संतुलित और व्यावहारिक रास्ता है।

 

डिजिटल इंडिया से ‘टेक डिप्लोमेसी’ तक-

भारत की एक बड़ी वैश्विक ताकत अब उसकी डिजिटल क्षमता भी है। यूपीआई और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने यह दिखाया है कि बड़े पैमाने पर कम लागत वाली डिजिटल सेवाओं का निर्माण केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विशेषता नहीं है। भारत अब डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल स्वास्थ्य, कृषि-तकनीक और डिजिटल शासन के अपने अनुभव को अंतरराष्ट्रीय सहयोग का हिस्सा बना रहा है। ब्रिक्स के भीतर इस क्षेत्र में सहयोग भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकता है। विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए ऐसी डिजिटल प्रणालियां उपयोगी हो सकती हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत कम लागत में बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके। यह भारत की वैश्विक छवि में भी महत्वपूर्ण बदलाव है। कभी भारत को मुख्यतः एक विशाल बाजार के रूप में देखा जाता था; अब वह समाधान देने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

 

आतंकवाद पर भारत की स्पष्ट रेखा-

भारत के लिए ब्रिक्स का सुरक्षा आयाम भी महत्वपूर्ण है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि आतंकवाद को अच्छे और बुरे आतंकवाद के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता।

आतंकी वित्तपोषण, आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकाने और सीमा-पार आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी सहयोग केवल भारत की चिंता नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा का प्रश्न है। ब्रिक्स जैसे व्यापक मंच पर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाना भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर है। हालांकि चुनौती यह है कि सदस्य देशों की सुरक्षा प्राथमिकताएं समान नहीं हैं। इसलिए भारत को राजनीतिक बयानबाजी के साथ-साथ व्यावहारिक और संस्थागत सहयोग पर भी जोर देना होगा।

 

ऊर्जा सुरक्षा: आदर्शवाद नहीं, व्यावहारिकता-

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ऊर्जा संक्रमण आवश्यक है, लेकिन विकासशील देशों की ऊर्जा जरूरतों को नजरअंदाज करके यह संक्रमण संभव नहीं होगा।भारत का दृष्टिकोण इसी संतुलन पर आधारित है। नवीकरणीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता का विस्तार हो, लेकिन साथ ही विश्वसनीय, सस्ती और पर्याप्त ऊर्जा की उपलब्धता भी सुनिश्चित हो। ब्रिक्स इस संदर्भ में ऊर्जा सहयोग का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है। विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला भविष्य की अर्थव्यवस्था का अहम मुद्दा है। बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के लिए जरूरी खनिजों तक सुरक्षित और विश्वसनीय पहुंच आने वाले वर्षों में रणनीतिक शक्ति का महत्वपूर्ण आधार बनेगी।

 

कृषि से एआई तक—विकास का नया एजेंडा-

ब्रिक्स का विस्तार उसके एजेंडे को भी व्यापक बना रहा है। कृषि, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और डिजिटल तकनीक अब सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन रहे हैं। भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए डिजिटल कृषि, मौसम आधारित सलाह, ड्रोन, जियोस्पेशियल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा आधारित खेती के भारतीय अनुभव को अफ्रीका, एशिया और अन्य विकासशील देशों के साथ साझा किया जा सकता है। यदि तकनीक को केवल व्यापारिक उत्पाद के बजाय विकास के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाए, तो ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण के लिए एक व्यावहारिक विकास मंच बन सकता है।

 

चीन के साथ संवाद: कमजोरी नहीं, रणनीतिक परिपक्वता-

ब्रिक्स की चर्चा भारत-चीन संबंधों के बिना अधूरी है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक संबंधों की जटिलताएं वास्तविक हैं। लेकिन यही कारण है कि बहुपक्षीय मंचों पर संवाद और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत का चीन के साथ संवाद करना कमजोरी नहीं, बल्कि रणनीतिक परिपक्वता का संकेत है। भारत यह समझता है कि प्रतिस्पर्धा और सहयोग हमेशा एक-दूसरे के पूर्णतः विरोधी नहीं होते। सीमा पर सतर्कता और वैश्विक मंचों पर संवाद—दोनों एक साथ चल सकते हैं। यही भारतीय विदेश नीति की व्यावहारिकता है।

 

ब्रिक्स की सबसे बड़ी चुनौती भी उसके भीतर-

ब्रिक्स की ताकत उसका विस्तार है, लेकिन यही विस्तार उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकता है। इतने विविध देशों के बीच हर मुद्दे पर एकमत होना संभव नहीं है। यदि ब्रिक्स केवल घोषणाओं, सम्मेलनों और राजनीतिक वक्तव्यों का मंच बनकर रह जाता है, तो उसकी विश्वसनीयता सीमित हो सकती है। इसलिए भारत की अध्यक्षता की वास्तविक कसौटी यह होगी कि वह राजनीतिक सहमति को कितने ठोस परिणामों में बदल पाती है। व्यापार में सुविधा, स्थानीय मुद्रा लेन-देन, डिजिटल सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति, स्वास्थ्य, कृषि और विकास वित्त जैसे क्षेत्रों में वास्तविक प्रगति इसका पैमाना होगी।

 

भारत की कूटनीति: न स्थायी दोस्ती, न स्थायी दुश्मनी-

भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण आधार उसकी रणनीतिक स्वायत्तता है। भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग बनाए रखता है। चीन के साथ सीमा और व्यापार संबंधों की जटिलताओं के बावजूद संवाद जारी रखता है। अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत करता है। जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड में सहयोग करता है और यूरोप के साथ आर्थिक तथा तकनीकी संबंधों को विस्तार दे रहा है। इसे विरोधाभास के रूप में देखने के बजाय बदलती विश्व राजनीति में भारत की बहु-संलग्नता के रूप में समझना अधिक उचित होगा। भारत न तो किसी एक शक्ति-गुट में बंधना चाहता है और न ही किसी दूसरे गुट के विरोध में अपनी विदेश नीति को परिभाषित करना चाहता है। उसकी रणनीति अधिक जटिल जरूर है, लेकिन राष्ट्रीय हितों की दृष्टि से अधिक व्यावहारिक भी है—रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-संलग्नता और वैश्विक जिम्मेदारी का संतुलन। ब्रिक्स भारत को इसी नीति को बहुपक्षीय स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर देता है।

 

पिरामिड से साझेदारी की ओर-

ब्रिक्स 2026 भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता नहीं है। यह उस वैश्विक परिवर्तन के बीच भारतीय कूटनीति की परीक्षा है, जिसमें शक्ति का केंद्र धीरे-धीरे अधिक व्यापक और बहुध्रुवीय हो रहा है। भारत की चुनौती यह नहीं है कि वह ब्रिक्स को किसी दूसरे शक्ति-गुट के मुकाबले खड़ा करे। उसकी चुनौती यह है कि वह ब्रिक्स को ऐसा प्रभावी मंच बनाने में योगदान दे, जहां विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में अधिक प्रभावी आवाज उठा सकें और साझा समस्याओं के व्यावहारिक समाधान विकसित कर सकें। यदि भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान सुदृढ़ता, नवाचार, सहयोग और टिकाऊपन को ठोस आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत परिणामों में बदलने में सफल होता है, तो ब्रिक्स 2026 उसकी विदेश नीति की उपलब्धि भर नहीं रहेगा। 

यह उस परिवर्तन का महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है, जिसमें दुनिया की वैश्विक व्यवस्था ‘विशेषाधिकार के पिरामिड’ से निकलकर ‘साझेदारी की मेज’ की ओर बढ़ती है, और भारत उस परिवर्तन में केवल सहभागी नहीं, बल्कि एक सक्रिय सूत्रधार के रूप में दिखाई देता है।

 

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