सुश्री सरोज कंसारी
(कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका)
रिपोर्टर एवं उद्घोषिका
नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
आलेख:
खुद को कमजोर न समझो, यकीन करो जो चाहते हो वो तुम कर सकते हो।
-सुश्री सरोज कंसारी
सकारात्मकता की ओर! असंभव कुछ भी नहीं :
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खुद को कमजोर न समझो, यकीन करो जो चाहते हो वो तुम कर सकते हो। जो किसी बात से मायूस नहीं होते, उन्हें नए विचार और राह मिलते हैं। साहस के साथ उठाया गया हर कदम मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा का संचार करता है। जो हर तरह से भय-मुक्त जिंदगी जीते हैं और खुद पर विश्वास रखते हैं, उनमें किसी भी कार्य को करने की दुगुनी शक्ति होती है। संदेह के दायरे में रहने से मानसिकता कमजोर होती है। एक फैसला करें और उस पर दृढ़ रहें, तभी सफलता मिलती है। हमारी सोच ही हर पग पर हमें दिशा देती है। पहले से दिमाग में बेवजह की बातों को संग्रहित कर, उसे बार-बार सोचने और निष्कर्ष न निकल पाने से उदास होने से हममें निष्क्रियता बढ़ती है। जीवन भले ही कठिनाइयों भरा है, लेकिन उसे दूर करने की क्षमता भी हममें होती है, लेकिन हम कोशिश करने, कोई विकल्प ढूंढने, सकारात्मक सोचने की बजाय जरा सी बात बिगड़ने पर बिना सोचे रोने लग जाते हैं, घबराते हैं। यही वजह है कि खुद की सामर्थ्य को नहीं पहचान पाते। नकारात्मक कल्पना ही मनुष्य को आगे बढ़ने से रोकती है। जिस बात पर ध्यान देना है और मेहनत करना है, उसे न कर जब भूत-भविष्य की चिंता करने लग जाते हैं, तब अपने उद्देश्य से भटक जाते हैं। इसलिए खुद से जो वादा करें, उसे किसी भी हालात में निभाने की पूरी कोशिश कीजिए। जब ऐसा कर लेते हैं, तब उत्साह मिलता है और सक्रियता आती है, फिर कोई भी असंभव कार्य आसान होने लगता है।
सीमित दायरे में रहकर ही सोचने से मानसिकता बोझिल होती है। अपने विचार को खुला रखिए, शांत रहिए और सुलझे रहिए, खुशमिजाज बनिए और मन लगाकर करें हर एक जिम्मेदारी को जो आपके हिस्से में है। जो किसी बात से मायूस नहीं होते, उन्हें नए विचार और राह मिलते हैं। अगर कोई चाह है आपके मन में जो आपके लिए जरूरी है, उसे करने से बेहतर परिणाम मिल सकता है, जो पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से भी लाभकारी है, जन-कल्याणकारी है, उसी तरफ ध्यान दें। बेचैन हैं और सोचते हैं काश! हो जाता तो… एक बार सोचिए और कहीं दिमाग मत उलझाइए, खुद की सुनिए, जो आपके हितैषी हैं, घर-परिवार में उन्हें बताइए और फैसला लें। एक बार संकल्प लेकर चलिए और फिर रुकिए मत। आज हम देखते हैं मन हर पल विचलित होता है, नई चीज की ओर आकर्षित हो जाता है। एक काम को ठीक से कर नहीं सकते, फिर दूसरी तरफ झुकाव हो जाता है। पल-पल मानसिकता बदल रही है तो समझ लीजिए आप एकाग्र नहीं हैं, दिल और दिमाग में संतुलन नहीं है।
तुम सर्वगुण सम्पन्न प्राणी हो, तुममें अदम्य शक्ति का भंडार है। समझो अपनी महत्ता और निकलो दुख के घेरे से। मनुष्य हो, मानवता को धारण करो और खुद में समाहित हर दुर्गुणों को धीरे-धीरे दूर करने का प्रयास करो। जब कुविचार मिट जाएंगे तो दैविक शक्ति उजागर होने से मानवता के रक्षक बन पूरे विश्व में फैली हर उस बुराई को जड़ से मिटाने के लिए एक मजबूत हथियार बन पाओगे, जो समस्त संसार के लिए विनाशकारी है। हम आपस में ही लड़कर, बैर पालकर विभिन्न समस्याओं को जन्म देते हैं। मन में जब सद्भाव भरेंगे तब चारों तरफ प्रेमपूर्ण माहौल बना पाएंगे। अच्छे भाव रखकर, एक दूसरे के सहयोगी बनकर समस्त मानव समुदाय में करुणा, दया, क्षमा, धर्म, नैतिकता के गुणों को विकसित करके इस दूषित वातावरण को पूरी तरह समाप्त करने में सफल हो सकते हैं। जब तक हम पूरी तरह सद्व्यवहारी नहीं बनेंगे, आसपास सुखद वातावरण का निर्माण नहीं होगा। खुद को बुराई से मुक्त करके औरों को प्रेरित कर सकते हैं। हर इंसान में इंसानियत लाने की जरूरत है। कोई भी काम कठिन हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं। हर मनुष्य विधाता की सुंदर रचना है और आनंदित जीवन व्यतीत करने, धर्म, अध्यात्म और सद्कार्य के लिए आया है, लेकिन अज्ञानवश हम अपने सही उद्देश्य से भटक गए हैं।
मानव मन में सद्भाव भरकर ही किसी भी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा की जा सकती है। संस्कार के अभाव में अधिक कमाने, जल्द अमीर होने, अपने शौक को पूर्ण करने के लिए लोग आतुर हैं। सहनशीलता, सब्र नहीं, इंतजार करना पसंद नहीं। आज गलत-सही से किसी को मतलब नहीं, अपना स्वार्थ पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। आज सर्वत्र पाश्चात्य की हवा है, आधुनिक दिखने की होड़ है। आज लोग एक दूसरे के लिए जीना, परवाह करना, अपनापन देना नहीं चाहते, बस भोग-विलासपूर्ण जीवन की ओर अधिक झुकाव है। एक दूसरे को बचाने के लिए कम ही आगे आते हैं। ऐसे माहौल से निकलने के लिए सात्विक बनना और हृदय में शुद्ध भाव रखना जरूरी है।
विश्व स्तर पर शांत, सुरक्षित और संगठित वातावरण के लिए पहले खुद में व्याप्त बुराइयों पर नियंत्रण जरूरी है। किसी को सजा देकर, कठोर बनकर ही सुंदर संसार नहीं बना सकते, हृदय में एक दूसरे के लिए स्नेह होना जरूरी है। आज हमारे चारों तरफ अपराध का एक गढ़ है, किसी की जरा सी बात को कोई सहन नहीं कर सकता, बहुत जल्द उग्र हो जाते हैं और होश खो बैठते हैं और बेहोश होकर कोई भी नेक कार्य नहीं कर सकते। समझौते, सहयोग, आपसी विचार, संवाद, गहन चिंतन, संस्कार नहीं के बराबर हैं। अपने कर्तव्य से विमुख होकर न जाने किस दिशा में जा रहे हैं हम। तनिक रुककर सोचने का समय नहीं, हमारा फर्ज क्या है? क्यों झूठे सपने, दिखावा और फैशन को जीने का आधार बना रहे हैं?
अपनों की आंखों में आंसू देकर गैरों को प्रभावित कर रहे हैं। आज मोबाइल की वजह से लोगों की मानसिकता बुरी तरह बिगड़ी है। चौबीस घंटे अपने दिल-दिमाग को इसमें व्यस्त रखने की वजह से आज शारीरिक-मानसिक दुष्प्रभाव पड़ रहे हैं, मानसिक संतुलन तक खो जाता है। गृह-कलह, किडनैपिंग, आतंक, भ्रष्टाचार, देशद्रोह, ठगी, ब्लैकमेल, बेईमानी, षड्यंत्र का यह प्रमुख माध्यम बन गया है। हर उस बात को आज छोटे बच्चे जानते हैं, जिसे बड़े समझने में असमर्थ हैं और अश्लील वीडियो, अमानवीय कृत्य, फूहड़ता देखकर उसे अपने व्यवहार में ला रहे हैं। सुबह से लेकर रात तक हर एक जरूरत के लिए इस पर निर्भर हैं, एक पल भी ध्यान नहीं हटाते। इससे अधिकतर समय सोशल मीडिया में व्यतीत करने के कारण अपने पारिवारिक जन, समाज, रिश्ते, मित्र और राष्ट्र के प्रति लापरवाही बढ़ी है। आज फेसबुक, इंस्ट्राग्राम, ट्विटर, यूट्यूब में हर वर्ग के लोग जुड़े हैं और इसे मनोरंजन और आधुनिकता का सबसे अच्छा माध्यम मानकर वास्तविक दुनिया से कोसों दूर होते जा रहे हैं। एक बुरी लत है मोबाइल, जिसकी वजह से अपनों से दूर होते जा रहे हैं, जिसे समय रहते न छुड़ाया गया तो इसके भयानक परिणाम होंगे। आज मानव समाज बर्बादी के कगार पर है। भले ही इसके सदुपयोग से जीवन में क्रांतिकारी विकास संभव है, सही कार्य में सीमित समय तक उपयोग करने से अनेक लाभ हैं, लेकिन दुरुपयोग होने के कारण हर घर में यह एक कलह का केंद्र बना है।
एक दूसरे के प्रति मानवीय संवेदनाओं को पुनः जीवित करने की आज आवश्यकता है। युद्ध पर विराम हो, बम-बारूद के ढेर पर बैठकर हम तकनीक का कमाल कहते हैं, जो एक पल में समस्त मानव के अस्तित्व को मिटाने में पर्याप्त है, इस बात का चिंतन करना जरूरी नहीं समझते। हम अकेले हर बुराई से नहीं लड़ सकते, लेकिन स्वयं में जो दुर्गुण हैं, कुविचार हैं, उसे तो दूर कर सकते हैं, उसके लिए एक दूसरे की भावनाओं से जुड़ना जरूरी है। आज हम अपनों से दूरी बनाकर जीवन यापन कर रहे हैं। सोशल मीडिया में सक्रियता और अपनों के प्रति निष्क्रिय हो गए हैं, जैसे मोबाइल ही जीने का सहारा बन गया है। अपराध को बढ़ाने में, मानवीय भावनाओं को शून्य करने में इसकी सबसे बड़ी भूमिका है। जो समय हम सुधार में लगा सकते हैं, उसे इन अजनबी लोगों के साथ जुड़कर समय की बर्बादी कर रहे हैं।
अगर हम सभी बदलना चाहते हैं इस घुटन भरे वातावरण को, तो अपने आचरण में वह सब गुण लाने होंगे जैसे हम दूसरों में देखना चाहते हैं। आइए मिल-जुलकर हम सुखद संसार का निर्माण करें, शांति हो हर एक कोना, कहीं न गम का शोर हो, बनें रक्षक दीन-दुखियों के, हर अत्याचार का अंत करें। चिंतन की इस बेला में एक प्रण करें, जब भी जिंदगी से मन टूट जाए, कोई उपाय न सूझे, जीने की कोई वजह न हो, उदास हो जाएं, तब और खुद से कहें – आप जो बनना चाहते हैं, ख्वाहिश है, भले ही उसमें लाख मुसीबत हो, पूर्ण होने तक चैन से मत बैठो, तुम कर सकते हो, महसूस करो और सारी क्षमता लगा दो, श्रेष्ठ समझो खुद को और हर उस अच्छाई को अपना लो जिसमें मानव का कल्याण हो। भूल जाइए आपके साथ पूर्व में क्या दुखद घटना घटित हुई, भविष्य में क्या होगा, वर्तमान में क्या-क्या तनाव हैं? बस याद रखिए तुम्हें अच्छा सोचना है, करना और देना है। ऐसे काम कभी न करें जिससे बाद में पछतावा हो, सम्मान करें हर इंसान का, अपमानित न करें अपने व्यवहार से, दिल दुखाने वाली बात न कहें, सहयोग की जरूरत है उन्हें मदद दें। अपने जीवन की व्यस्तता से कुछ पल निकालें और हर दिन कुछ भले का काम करें।







