निशुल्क यूपीआई का अंत लेकिन बोझ किसकी जेब पर?

Spread the love

 

 

विवेकानंद

 

 

                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

निशुल्क यूपीआई का अंत लेकिन बोझ किसकी जेब पर?

 

 

 

यूपीआई अब फ्री नहीं रहेगा, इस पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लगेगा। हालांकि सरकार का दावा है इसका बोझ ग्राहकों पर नहीं बल्कि दुकानदार पर पड़ेगा, वहीं विरोध करने वाले इसे जनता पर बोझ बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि यूपीआई से पेमेंट करने पर कितना पैसा लगेगा। सवाल यह है कि सरकार झांसा दे रही है या यूपीआई पर एमडीआर वसूली को लेकर ईमानदार है? 

 

        जिस दिन से पेमेंट्स एंड सैटलमेंट्स सिस्टम्स एक्ट संसद में पास हुआ था उसी दिन से यह आशंकाएं सिर उठाने लगी थीं कि अब यूपीआई पर टैक्स लगेगा। सरकार पहले नानुकुर करती रही। बीच में ऐसी खबरें भी आई कि आरबीआई और वित्त मंत्रालय कोई ऐसा रास्ता निकाल रहे हैं जिससे आम ग्राहकों पर कोई बोझ न पड़े। अब फैसला हुआ है कि यूपीए पर 0.4 प्रतिशत चार्ज लगेगा। जैसे ही यह खबर सामने आई अधिकांश सूचना तंत्र यह समझाने में लग गए कि यह टैक्स दरअसल ग्राहक को नहीं बल्कि 2000 रुपए से अधिक की खरीदी पर मर्चेंट को लगेगा। वे हर शुल्क के साथ ‘सिर्फ’ लगाना नहीं भूल रहे हैं। लगे हाथ यह भी बता रहे कि इसकी जरूरत क्यों पड़ी। बताया जा रहा है कि यूपीआई पेमेंट के पीछे एक पूरा सिस्टम काम करता है और उसके रखरखाव के लिए पैसे की जरूरत है। लिहाजा सरकार बड़े मर्चेंट से यह पैसा वसूल करेगी।

 

          भारत पे के सह-संस्थापक अशनीर ग्रोवर ने इस पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा है कि आरबीआई सरकार को 2.87 लाख करोड़ का सरप्लस दे रही है। कुल लिस्टेड बैंकों का लाभ 4.11 लाख करोड़ है। वहीं एनपीसीआई, जो यूपीआई संचालित करता है, उसका सरप्लस 1,888 करोड़ है। सरकार और बैंकों को इतने लाभ के बाद आखिर क्यों एमडीआर लगाया जा रहा है और नुकसान किस बात का हो रहा है। सरकार आखिरी कौन सी सब्सिडी दे रही है, जो सरकार यूपीआई से वसूलना चाहती है। 

 

                 भारत में आमतौर पर क्रेडिट कार्ड से भुगतान पर लगभग 1.5% एमडीआर लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर यह 0.9% तक होता है। फिलहाल यूपीआई से होने वाले भुगतान पर कारोबारियों से कोई एमडीआर नहीं लिया जाता। विपक्ष का कहना है कि अगर व्यापारियों पर अतिरिक्त लागत डाली जाती है, तो उसका बोझ आखिरकार वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के जरिए उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। पुराना अनुभव इस बात की तस्दीक भी करता है। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जो बताते हैं कि जब भी मर्चेंट पर फीस लगी इसे ग्राहकों से ही वसूला गया। पेट्रोल पंप से लेकर ज्वेलर्स, सिनेमा हॉल, ट्रेवल एप, रेस्टोरेंट मर्चेंट फीस किसी न किसी रूप में ग्राहकों पर ही थोपते हैं। सरकार भी इससे अंजान नहीं है।

 

             यह स्थापित सत्य है कि इस देश में भिखारी भी टैक्स भरता है। कोई बिस्किट का पैकेट भी लीजिए उसके नीचे लिखी एमआरपी के पास दर्ज होता है (सभी टैक्स सहित)। यह सभी टैक्स सहित का मतलब है कि दुकानदार या कंपनी उस बिस्किट पर लगने वाला टैक्स भी जनता से वसूल रही है। यह कानूनी रूप से वैध भी है। इसे सरकार नाम देती है अप्रत्यक्ष कर।

 

            बहरहाल! एक और गणित बताया जा रहा है कि देश के 95 प्रतिशत पेमेंट इस दायरे से बाहर रहेंगे। तर्क यह है कि भारत में यूपीआई से होने वाले कुल मर्चेंट पेमेंट्स में से 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजेक्शन 2,000 या उससे कम के होते हैं। यानि देश के 95 प्रतिशत से अधिक छोटे और मध्यम व्यापारी इस चार्ज के दायरे से पूरी तरह बाहर रहेंगे। सरकारी आंकड़े एकदम दुरुस्त हैं। लेकिन मामले का दूसरा पहलू थोड़ा पेचीदा है।

 

          ऐसा कौन सा स्टोर है जहां आजकल दो हजार से नीचे का सामान खरीदा जाता हो? अकेले खाने के तेल के चार पैकेट हजार रुपए से ऊपर निकल जाते हैं। बस एक-दो सामान और जोड़ दीजिए बिल 2000 रुपए पार कर जाएगा। दूसरा सवाल कोई ऐसा स्टोर जहां दिन भर में हजार पांच सौ लोग सामान खरीदने आते हैं, वह सभी ग्राहकों का पैसा अपनी जेब से भरेगा? बेशक वह सरकारी आदेश का पालन करेगा और किसी से यह कहकर अतिरिक्त पैसा नहीं वसूलेगा कि यह एमडीआर के लिए लिया जा रहा है, लेकिन पूरा संदेह है कि स्टोर इसका कोई रास्ता निकालेगा और इसका बोझ अंतत: ग्राहक पर ही आएगा। जैसे कि अब तक की मर्चेंट फीस पर हो रहा है।

 

              एक और अहम सवाल यह है कि क्या सरकार ने यह फैसला अमेरिका के दबाव में लिया है? विपक्ष ऐसे आरोप लगा रहा है। हो सकता है आरोप में सत्यता न हो, लेकिन पिछला घटनाक्रम संदेह जरूर पैदा करता है। दरअसल यूपीआई को भारत में साल 2016 में शुरू किया गया था। इसके बाद से अमेरिकी कंपनियां वीजा और मास्टरकार्ड अपने बिजनेस में गिरावट की बात कह रहे हैं। इसी साल मार्च में फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा जारी अमेरिका की विदेशी व्यापार बाधाओं संबंधी रिपोर्ट में भारत की यूपीआई और रुपे पर लागू जीरो एमडीआर नीति पर आपत्ति जताई थी। इसलिए विदेशी दबाव के सवाल उठ रहे हैं।

 

                 कुल मिलाकर कारण चाहे जो हो, अब जबकि सरकार ने कोई फैसला कर ही लिया है तो उसके असर को एक सर्वे के आईने में देख लेना चाहिए। साल 2024 में जब यह खबर आना शुरू हुई थी कि यूपीआई पर चार्ज लग सकता है उसी दौरान लोकल सर्किल्स की ओर से एक सर्वे जारी किया गया था। यह सर्वे गूगल पर सर्वाजनिक है। इस सर्वे में दावा किया गया था कि रिपोर्ट के मुताबिक, यूपीआई सेवा पर यदि किसी तरह का लेनदेन शुल्क लगाया जाता है तो 75 प्रतिशत यूजर्स इसका इस्तेमाल बंद कर देंगे। सर्वे में कहा गया था कि सिर्फ 22 प्रतिशत यूपीआई यूजर्स भुगतान पर लेनदेन शुल्क का बोझ उठाने को तैयार हैं। वहीं 75 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर लेनदेन शुल्क लगाया जाता है, तो वे यूपीआई का उपयोग करना बंद कर देंगे। यदि इस सर्वे में मामूली सी भी सत्यता है तो यह एक क्रांतिकारी पहल को गहरी चोट हो सकती है।

             (विनायक फीचर्स)

  • Related Posts

    सादगी को ही समझदारी समझना

    Spread the love

    Spread the love  सुश्री सरोज कंसारी (कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका) रिपोर्टर एवं उद्घोषिका नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)                     (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)    …

    ”खुद को दबाव से दूर रखो!”

    Spread the love

    Spread the love    सुश्री सरोज कंसारी (कवयित्री, लेखिका व शिक्षिका) रिपोर्टर एवं उद्घोषिका नवापारा-राजिम, रायपुर (छत्तीसगढ़)                   (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)    …

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    सादगी को ही समझदारी समझना

    • By User
    • September 21, 2026
    • 5 views
    सादगी को ही समझदारी समझना

    ”खुद को दबाव से दूर रखो!”

    • By User
    • September 21, 2026
    • 10 views
    ”खुद को दबाव से दूर रखो!”

    दस साल से एक ही एजेंडा

    • By User
    • September 21, 2026
    • 10 views
    दस साल से एक ही एजेंडा

    सशक्त हस्ताक्षर की 52 वीं काव्य गोष्ठी संपन्न 

    • By User
    • September 21, 2026
    • 9 views
    सशक्त हस्ताक्षर की 52 वीं काव्य गोष्ठी संपन्न 

    कुलपति चयन: विद्वता का सम्मान या जुगाड़ का पुरस्कार?

    • By User
    • September 21, 2026
    • 9 views
    कुलपति चयन: विद्वता का सम्मान या जुगाड़ का पुरस्कार?

    गैंडा: अस्तित्व की लड़ाई लड़ता विशाल प्राणी          

    • By User
    • September 21, 2026
    • 10 views
    गैंडा: अस्तित्व की लड़ाई लड़ता विशाल प्राणी