संजय सोंधी,
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
मिस्र का महान इतिहास: ओल्ड, मिडल और न्यू किंगडम की अमर गाथा।
प्राचीन मिस्र की सभ्यता मानव इतिहास की सबसे समृद्ध और रहस्यमयी सभ्यताओं में से एक रही है, जिसे इतिहासकारों ने मुख्य रूप से तीन प्रमुख युगों में विभाजित किया है—ओल्ड किंगडम (लगभग 2686-2181 ईसा पूर्व), मिडल किंगडम (लगभग 2055-1650 ईसा पूर्व), और न्यू किंगडम (लगभग 1550-1077 ईसा पूर्व)। इन तीनों युगों में मिस्र का समाज एक सख्त सामाजिक ढांचे में बंटा हुआ था जहाँ शासक को ईश्वर का दर्जा प्राप्त था, और उसके नीचे पुरोहित, सेनापति, लिपिक (Scribes), कारीगर तथा किसान आते थे। इस संपूर्ण सभ्यता के दौरान राजाओं को कभी ‘फारूक’ या ‘फारन’ नहीं, बल्कि फिरौन (Pharaoh) कहा जाता था, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘बड़ा घर’ यानी राजमहल होता था।
सभ्यता की भाषा और लिपि का विकास भी इन युगों के साथ बदलता रहा। मिस्र के लोग अफ़्रो-एशियाई भाषा परिवार से जुड़ी प्राचीन मिस्री भाषा (Ancient Egyptian) बोलते थे। इसे लिखने के लिए चार प्रमुख लिपियों का इस्तेमाल हुआ—धार्मिक व औपचारिक स्मारकों के लिए चित्रों वाली हायरोग्लिफ़िक्स (Hieroglyphics), दैनिक राजकीय और व्यापारिक कार्यों के लिए हिरैटिक (Hieratic), बाद के आम बोलचाल के लिए डेमोटिक (Demotic), और अंत में ग्रीक वर्णमाला पर आधारित कॉप्टिक (Coptic)। समय के साथ यूनानी और रोमन आक्रमणों तथा फिर 7वीं शताब्दी ईस्वी में अरबों के आगमन के कारण अरबी भाषा ने स्थानीय मिस्री भाषा को पूरी तरह प्रतिस्थापित कर दिया। परिणामस्वरूप, बोलचाल की भाषा के रूप में प्राचीन मिस्री भाषा विलुप्त हो गई, हालाँकि इसका अंतिम रूप ‘कॉप्टिक’ आज भी मिस्र के कॉप्टिक ईसाई चर्च की धार्मिक प्रार्थनाओं में जीवित है।
अक्सर यह माना जाता है कि मिस्र के सभी विशाल पिरामिड स्वर्ण युग यानी न्यू किंगडम में बने थे, जबकि वास्तविकता यह है कि विशाल पत्थरों से बने भव्य पिरामिडों का निर्माण ओल्ड किंगडम में हुआ था। ओल्ड किंगडम को ‘पिरामिडों का युग’ कहा जाता है, जहाँ फिरौन को मृत्यु के बाद दिव्य प्रतीक के रूप में आकाश की ओर ले जाने के लिए पिरामिड बनाए जाते थे। दुनिया का सबसे बड़ा और ऊंचा पिरामिड गिजा का महान पिरामिड (Great Pyramid of Giza) है, जिसे ओल्ड किंगडम के चौथे राजवंश के शासक फिरौन खुफू (Khufu) ने बनवाया था। निर्माण के समय इसकी मूल ऊंचाई लगभग 146.6 मीटर (481 फीट) थी, जो हजारों वर्षों तक दुनिया की सबसे ऊंची मानव निर्मित संरचना रही। इतिहासकार और वैज्ञानिक आज भी इस तथ्य पर अध्ययन करते हैं कि बिना आधुनिक क्रेन और मशीनों के 20 से 30 लाख विशाल पत्थर के ब्लॉक (जिनमें से प्रत्येक का वजन 2.5 से 15 टन तक था) कैसे उठाए गए। आधुनिक शोध बताते हैं कि मिस्र के निवासियों ने रैंप (ढलानदार रास्ते), रोलर, और पत्थरों को आसानी से खींचने के लिए गीली रेत का प्रयोग किया था, और इन्हें बनाने वाले बंधुआ मजदूर नहीं बल्कि कुशल वेतनभोगी कारीगर थे।
हालांकि, ओल्ड किंगडम के बाद मिडल और फिर न्यू किंगडम तक आते-आते दफनाने के तरीकों में बड़ा बदलाव आया। पिरामिडों की विशाल संरचनाओं के कारण चोर और लुटेरे दूर से ही समझ जाते थे कि अंदर भारी खजाना और सोने के अवशेष हैं, जिससे कई कब्रें लूट ली गईं। इसी सुरक्षात्मक कारण से न्यू किंगडम के दौर में शासकों ने पिरामिड बनवाना पूरी तरह बंद कर दिया और अपनी कब्रों को चट्टानों के अंदर गुप्त गुफाओं के रूप में तराशना शुरू किया, जिसे ‘राजाओं की घाटी’ (Valley of the Kings) कहा जाता है। दफनाने की प्रक्रिया में मिस्रवासी शव को ममी (Mummification) बनाकर सुरक्षित रखते थे और कब्र में सोने-चांदी के आभूषण, भोजन, कपड़े, रथ, हथियार, और बर्तन तक रख देते थे। उनका यह दृढ विश्वास था कि मृत्यु जीवन का अंत नहीं है, बल्कि ‘का’ (आत्मा) अगले जन्म में प्रवेश करती है, और मरने के बाद के इस सफर (Afterlife) में राजा को किसी भी वस्तु की तकलीफ न हो, इसलिए ये सभी सामग्री साथ रखी जाती थी।
न्यू किंगडम के दौरान ही मिस्र के सबसे प्रसिद्ध शासक हुए, जिनमें तूतनखामुन (Tutankhamun) और रमेसेस द्वितीय (Ramesses II / Ramesses the Great) प्रमुख हैं। ‘बाल राजा’ के नाम से प्रसिद्ध तूतनखामुन ने लगभग 1333 ईसा पूर्व से 1323 ईसा पूर्व तक शासन किया। केवल 19 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु हो गई थी, और उन्हें ‘राजाओं की घाटी’ में KV62 नामक गुप्त मकबरे में दफनाया गया था। वर्ष 1922 में हावर्ड कार्टर द्वारा खोजी गई उनकी ममी और मकबरा पूरी तरह सुरक्षित और सोने के अतुलनीय खजानों से भरा मिला था। वहीं दूसरी ओर, रमेसेस द्वितीय ने लगभग 1279 ईसा पूर्व से 1213 ईसा पूर्व तक 66 वर्षों का विशाल शासनकाल संभाला, जिसे मिस्र की सैन्य शक्ति और अबू सिंबेल जैसे विशाल मंदिरों के निर्माण का शिखर माना जाता है। रमेसेस द्वितीय को भी मृत्यु के बाद ‘राजाओं की घाटी’ में ही दफनाया गया था।
प्राचीन मिस्र के राजघराने में एक बेहद खास और विचित्र परंपरा अंतर्विवाह या निकट-संबंधी विवाह (Inbreeding) की थी। मिस्रवासी फिरौन को ज़मीन पर साक्षात देवता मानते थे। अपने शाही रक्त की ‘पवित्रता’ बनाए रखने और सिंहासन पर किसी बाहरी का दावा रोकने के लिए शाही परिवार के भीतर ही विवाह किए जाते थे, जिनमें भाई-बहन और कई मामलों में पिता-पुत्री का विवाह भी शामिल था। जैसे, तूतनखामुन की पत्नी अंखेसेनमुन उनकी ही सौतेली बहन थी, और स्वयं तूतनखामुन के माता-पिता भी सगे भाई-बहन थे। हालाँकि मिस्र के इस शाही अंतर्विवाह के कारण पीढ़ियों तक गंभीर आनुवंशिक (Genetic) बीमारियाँ फैलीं—जैसे क्लबफुट, आनुवंशिक अस्थि रोग और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली—जिससे तूतनखामुन जैसे कई राजा शारीरिक अक्षमता और अकाल मृत्यु के शिकार हुए। परंतु, केवल जेनेटिक बीमारियों को ही पूरी सभ्यता के पतन का कारण मानना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
मिस्र की सभ्यता का पतन केवल जेनेटिक कारणों से नहीं, बल्कि कई बड़े राजनीतिक, आर्थिक और प्राकृतिक कारणों के मेल से हुआ। समय-समय पर नील नदी में भीषण सूखा पड़ने से कृषि व्यवस्था चरमरा गई और आर्थिक बदहाली आई। इसके अतिरिक्त, आंतरिक गृहयुद्ध, पुरोहितों की बढ़ती सत्ता से फ़िरौन का कमज़ोर होना, और असिरियाई, फ़ारसी, तथा यूनानी (सिकंदर महान) जैसे बाहरी महाशक्तियों के लगातार आक्रमणों ने सभ्यता को जर्जर कर दिया। अंततः 30 ईसा पूर्व में क्लेियोपेट्रा की मृत्यु और रोमन साम्राज्य द्वारा मिस्र को अपने अधीन कर लेने के साथ ही इस हजारों साल पुरानी महान सभ्यता का अंतिम राजनीतिक और सांस्कृतिक पतन हो गया।







