सम्पादकः अजय प्रताप सिंह
(नया अध्याय, दिल्ली)
म प्र मिडडे मील माफियाओं के शिकंजे में
माफिया आरटीआई को बना रहे ब्लैक मेलिंग का औजार
शिक्षिका माफियाओं के निशाने पर
दलित एक्ट में फंसाने का खेल
बीजेपी छुटभैयों का माफियाओं को संरक्षण
17 दिसं 19 के सुप्रीम आदेश की प्रशासन कर रहा अवहेलना
गंजबासौदा की हृदयविदारक घटनाओं की सूक्ष्म पडताल
17 दिसम्बर 2019, सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच, जिसमें खुद चीफ जस्टिस बावडे , जस्टिस गवई, जस्टिस चंद्रचूड़ का आरटीआई का परीक्षण करते हुए आया, जिसमें एकमत से पाया गया कि कुछ स्वंयभू आरटीआई एक्टिविस्टों ने इसे आपराधिक धमकी, ब्लैक मेलिंग का हथियार बना लिया है, जिससे यह संवैधानिक कानून सरकारी कर्मचारियों को ब्लैक मेलिंग के जरिये अवैध कमाई की जा रही है। इसी कानून को इन माफियाओं के पर कतरने का हथियार भी सुप्रीम अदालत ने बना दिया, सुप्रीम बेंच ने जन सूचना अधिकारी को यह अधिकार दिया है कि यदि वह समझता है कि आरटीआई का प्रयोग टारगेटेड है तो उस एक्टिविस्टों के आवेदन को इस आधार पर निरस्त किया जाय, साथ ही तथाकथित आरटीआई आवेदक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराते हुए, मानहानि तक के केस किये जाने चाहियें। लेकिन सुप्रीम आदेश आज हवा हवाई हैं म प्र और खासकर विदिशा जिले में तो।
8 सितम्बर कन्या हाई स्कूल गांधी चौक गंजबासौदा के सर्पों के पिटारे से राजकुमार जैन नामक मदारी की एक वीडियो वायरल होती है जिसमें साधना दास नामक शिक्षिका को पूरे गुस्से में माँ, बहन की गालियाँ देकर धमाका रहा है, प्राचार्य लक्ष्मी प्रजापति मौके पर पीडिता बुलाती हैं, लेकिन यह क्या प्राचार्य बाहरी व्यक्ति पर कोई कार्यवाही तो करतीं ही नहीं, उल्टे पीडिता को सुझाव देती नजर आती हैं। ऐसा संरक्षण क्यों..? क्या ऐसा कृत्य प्राचार्य की कर्तव्य परायणता और कानून के प्रति निष्ठा को कटघरे में खड़ा नहीं करता…? इस खबर के लिखे जाने तक प्राचार्य ने कानून सम्मत कार्य वाही न कर खुद को संघ के प्रति निष्ठुर बना लिया है..? क्या प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने कोई कार्यवाही की..? तो उत्तर न मे ही है। हालांकि इस घटना पर मैने डीएम, से बात की लेकिन ढाक के तीन पात। प्रशासन के ऐसे कृत्यों से प्रजातंत्र सवालों के घेरे में आ खड़ा होता है।
अभी कल ही मदारी के कुर्तत्यों की एक और वीडियो वायरल हुई, जिसमें पूनम भाटिया नामक शिक्षिका फूट फूट कर बिलखते हुए, इसी राजकुमार जैन को रिपोर्ट दर्ज करने की याचना भरे स्वर में न छेडने की डरी हुई धमकी देने का प्रयास करती नजर आ रही है। लेकिन धूर्त उल्टा धमकाते हुए, हौसले का प्रदर्शन बड़ी ढिठाई से करता हुआ कह रहा है कि चार दिन में जमानत पर बाहर आकर दलित एक्ट में तेरी नौकरी खा जाऊंगा,। अब वह भी स्कूल प्रांगण में इतनी ढिठाई के साथ। तो स्कूल प्रबंधन, और जिला प्रशासन क्या उसकी ऊंगलियों पर नृत्य के लिए विवश हो चुका है तो आखिर क्यूँ…?
राजकुमार जैन नामक मदारी के पिटारे से एक के बाद एक करके कुर्कत्यों का आना लगातार जारी है, हम भी हैरान हैं, लेकिन लगे हैं इसके कुकर्मो की पडताल को। यह महाशय 25/8/26 को तो प्रशासन के उच्च अधिकारियों को ही अपने निशाने पर लेकर ऐसा कृत्य कर देता है कि दांतों तले ऊंगली दबाने को विवश होना पड़ता है। जन सुनवाई में राजकुमार जैन खुद जाकर सपना राजपूत नामक महिला जो कन्या हाई स्कूल गांधी चौक गंजबासौदा में मिडडे मील का अपने समुह द्बारा संचालन करती है, के नाम से शिक्षिका साधना दास के खिलाफ झूठी शिकायत लिखकर देता है। कि साधना मिडडे मील के संचालन में अनावश्यक रोडा अटका रही है। जांच टीम आती है सपना राजपूत बुलाई जाती है तो पता चला कि उसने कोई शिकायत ही नहीं की, राजकुमार जैन से पूछा जाता है तो यह शिकायत करना स्वीकार करता है और फिर लिखित मे सपना राजपूत के नाम से ही लिखित मे विवाद सुलटने का झदम पत्र लिखता है जिसकी वीडियो हमारे पास सुरक्षित है। अब प्रश्न उठता है कि इतनी बड़ी जालसाजी के बाद भी प्रशासन ने मुकदमा दर्ज क्यों नहीं कराया..? सपना राजपूत ने रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं करायी।
पूर्व प्राचार्य प्रशांत के खिलाफ जनवरी से जुलाई के बीच 15 टारगेटेड आरटीआई दाखिल करता है। लेकिन प्रशासन का कोई एक्शन नहीं। एक महिला शिशिका से प्रशांत जी को टारगेट कराता है। फिर एक मुकदमा भी जो पता चला है कि जिला पंचायत को भुगतना पड़ रहा है।
बेहलोट के मिडिल स्कूल के हेडमास्टर कांशीराम मालवीय जी को सपत्नीक जाकर मिडडे मील उसके लिए संरक्षित करने की धमकी देता है, न मानने पर अंजाम भुगतने की धमकी देता है। वह पत्र भी हमारी खोज में हमने संकलित कर लिया है।
सवालों के घेरे में अब प्रशासन और सत्ता रुढ भाजपा आ गयी हैं, क्या प्रशासन सत्ता रुढ पार्टी के छुटभैये नेताओं के डर से राजकुमार जैन नामक मदारी के खिलाफ कार्रवाई से बच रहा है..? क्या ऐसा करके प्रशासन संविधान के प्रति ली गई शपथ का उलंघन नहीं कर रहा..? क्या प्रशासन प्रजातंत्र को पलीता लगाने में सहायक बन गया है…? अब एक और मौलिक प्रश्न जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी इस उदासीनता के लिए खुद को कोर्ट में कैसे डिफेंड कर पायेंगे…? यह देखना अब शेष बचा है। हम साधना और अन्य शिक्षिका व शिक्षकों के हौसले को नमन करते हैं जिन्होंने इस मदारी और उसके कुकर्मो को मीडिया के सामने लाने का साहस किया।








