संवाददाता कन्नौज (उ. प्र.): दीप सिंह
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
इत्र की खुशबू विदेशों तक, कजीहार की गलियों में विकास की तलाश।
कन्नौजः की पहचान इत्र और इतिहास से है। यहां की खुशबू देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंचती है। सवाल यह है कि जिस नगरी की खुशबू दुनिया महसूस करती है, उसी जनपद के गांवों में विकास की खुशबू आखिर कब पहुंचेगी?
सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है। सड़क, नाली, स्वच्छता और जनसुविधाओं को लेकर योजनाएं भी बनती हैं। लेकिन विकास की यह तस्वीर विकासखंड छिबरामऊ क्षेत्र की ग्राम पंचायत रौरी के मजरा कजीहार तक पहुंचते-पहुंचते धुंधली क्यों पड़ जाती है? यह सवाल सिर्फ एक गांव का नहीं, बल्कि उन ग्रामीणों का है जो वर्षों से मूलभूत सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
बरसात आते ही गांव की गलियां कीचड़ से भर जाती हैं। रास्तों पर गंदगी और जलभराव की स्थिति लोगों की परेशानी बढ़ा देती है। बच्चों को स्कूल जाने में दिक्कत होती है तो बुजुर्गों और महिलाओं को रोजमर्रा के काम के लिए इन्हीं रास्तों से गुजरना पड़ता है। सवाल उठता है कि क्या पक्की सड़क और साफ-सुथरी गलियां ग्रामीणों की जरूरत नहीं, बल्कि केवल चुनावी वादों का हिस्सा हैं?
कजीहार की गलियां शायद आज भी उस वादे को याद कर रही होंगी, जो चुनाव के समय उनसे किया गया था। तब इन्हीं रास्तों से होकर जनप्रतिनिधि गुजरे होंगे, ग्रामीणों के बीच पहुंचे होंगे और विकास का भरोसा दिलाया होगा। लेकिन पांच साल बीतते-बीतते वही गलियां अब जैसे पूछ रही हैं—”वादा किया था, फिर पूरा क्यों नहीं किया?”
विडंबना यह है कि चुनाव के समय जनता की चौखट तक पहुंचने वाले नेता चुनाव बीतने के बाद उसी जनता के दुख-दर्द से कितनी बार रूबरू होते हैं, यह सवाल आज भी कायम है। जनता वोट देती है, प्रतिनिधि चुनती है और उम्मीद करती है कि उसकी आवाज सत्ता तक पहुंचेगी। लेकिन लोकतंत्र में वोट देना पांच साल के लिए सवाल पूछने का अधिकार छोड़ देना नहीं है।
गांव की भोली-भाली जनता हर चुनाव में उम्मीद करती है कि इस बार शायद उसके रास्ते बनेंगे, नालियां सुधरेंगी और सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिलेगा। लेकिन जब वही समस्याएं वर्षों बाद भी जस की तस दिखाई दें तो सवाल उठना स्वाभाविक है—आखिर विकास की जिम्मेदारी किसकी है?
यह सवाल किसी एक व्यक्ति या दल पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने के लिए है। जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ संबंधित विभागों और स्थानीय जिम्मेदार तंत्र को भी देखना होगा कि योजनाएं कागजों से निकलकर गांव की जमीन तक क्यों नहीं पहुंच पा रही हैं।
कन्नौज की पहचान अगर इत्र की खुशबू है तो उसके गांवों की पहचान भी स्वच्छ, सुरक्षित और बेहतर जीवन से होनी चाहिए। विदेशों तक पहुंचने वाली खुशबू के बीच कजीहार की गलियों से उठती गंदगी और बदबू विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है।
अब जनता को केवल वादे नहीं, काम का हिसाब चाहिए। उसे चुनावी भाषण नहीं, अपने गांव की सड़क चाहिए। उसे आश्वासन नहीं, जलभराव से मुक्ति चाहिए। उसे दफ्तरों के चक्कर नहीं, योजनाओं का लाभ चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने वाली भीड़ नहीं है। वह सवाल पूछने वाली शक्ति भी है। पांच साल बाद फिर चुनाव आएगा, फिर वही गलियां होंगी, वही जनता होगी और फिर वही वादे होंगे। फर्क सिर्फ इतना होना चाहिए कि इस बार जनता वादों से पहले पिछले पांच साल का हिसाब भी पूछे।
कजीहार की गलियां आज भी इंतजार में हैं—विकास की उस खुशबू के, जो कन्नौज से निकलकर दुनिया तक पहुंचती है।?






