विश्व लंग्स (Lungs – फेफड़ा) दिवस पर गोष्ठी, सांसों की सेहत पर सवाल ? फेफड़ों को कितना सुरक्षित रख रहे हम : डॉ.अनिल कुमार दीक्षित 

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ब्यूरो देहरादूनः आभा शर्मा

 

 

               (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

विश्व लंग्स (Lungs – फेफड़ा) दिवस पर गोष्ठी, सांसों की सेहत पर सवाल ? फेफड़ों को कितना सुरक्षित रख रहे हम

              : डॉ.अनिल कुमार दीक्षित।

 

        देहरादून: आज 26 सितंबर को World Lung Day 2026 : शरीर का वह अंग जो दिन-रात बिना रुके काम करता है, उसकी सेहत को लेकर आयोजित गोष्ठी में डॉ. अनिल दीक्षित ने श्रोताओ को सम्बोधित करते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 , राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम, 2022 जैसे कई कानून भारत में है जो स्वास्थ्य के प्रति संजीदा है इसके बावजूद सांस की बीमारियो के प्रति लोग लापरवाह है 

 

          एक मिनट के लिए अपनी सांस पर ध्यान दीजिए… आप बिना सोचे लगातार सांस ले रहे हैं। यही काम आपके फेफड़े दिन-रात, हर दिन करते हैं। लेकिन जिस हवा को हम सामान्य समझकर अपने भीतर ले रहे हैं, उसमें धूल, धुआं और प्रदूषण कितना है, इस पर शायद ही कभी ध्यान जाता है। तंबाकू का धुआं, वाहनों का प्रदूषण, निर्माण स्थलों की धूल और घर के भीतर का धुआं धीरे-धीरे फेफड़ों की सेहत को प्रभावित कर सकता है।

 

           अक्सर लोग दिल और पेट की बीमारियों को लेकर तो फिक्रमंद रहते हैं, मगर फेफड़ों को तब तक नजरअंदाज करते हैं जब तक कि सांस फूलने की नौबत न आ जाए। सिगरेट का धुआं, धूल-मिट्टी और गाड़ियों से निकलने वाला जहरीला धुआं धीरे-धीरे हमारे फेफड़ों की कार्यक्षमता को खोखला कर देता है। कई बार जब बीमारी पकड़ में आती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। यही वजह है कि 25 सितंबर को विश्व फेफड़ा दिवस के जरिए लोगों को फेफड़ों की सेहत के प्रति जागरूक किया जाता है। वर्ष 2026 की थीम “जीवनभर फेफड़ों की सेहत” है। 

 

संदेश यह है कि फेफड़ों की देखभाल किसी एक दिन या किसी एक उम्र की जरूरत नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी की जिम्मेदारी है।

 

रहस्य खोलते हुए डॉ. अनिल दीक्षित सवाल करते कि ,फेफड़े खराब होने का पता कब चलता है ?

 

               फेफड़ों की परेशानी हमेशा अचानक सामने नहीं आती। कई बार शरीर छोटे-छोटे संकेत देता रहता है और हम उन्हें सामान्य समझकर टाल देते हैं। लगातार खांसी, बार-बार सांस फूलना, सीने में जकड़न, सांस लेते समय घरघराहट या सामान्य काम करने पर पहले की तुलना में जल्दी थकान जैसे लक्षणों पर ध्यान देना जरूरी है।

 

        हर खांसी या सांस फूलना गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता। मौसम बदलने, संक्रमण या दूसरी वजहों से भी ऐसा हो सकता है। लेकिन अगर परेशानी लंबे समय तक बनी रहे, बार-बार हो या बढ़ती जाए तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

 

                    डॉ.अनिल दीक्षित गोष्ठी में मौजूद श्रोताओं को आगाह करते है कि, सिगरेट पीने वाला ही नहीं, धुआं सांस में लेने वाला भी खतरे में – फेफड़ों की सेहत की बात आते ही सबसे पहले धूम्रपान का नाम आता है। सिगरेट और बीड़ी के धुएं में मौजूद हानिकारक पदार्थ फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन खतरा केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। उसके आसपास रहने वाले लोग भी दूसरे के धुएं के संपर्क में आ सकते हैं।

 

इसलिए घर, वाहन या किसी बंद स्थान पर धूम्रपान से बचना खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों के लिए महत्वपूर्ण है।

 

आसपास रोजमर्रा की धूल-धुआं से बचाव जरूरी

 

                 शहर में सड़क निर्माण, खुदाई, भवन निर्माण और यातायात के बीच उड़ने वाली धूल-धुआं रोजाना लोगों के संपर्क में आता है। लंबे समय तक धूल या प्रदूषित वातावरण में रहने वालों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है। ऐसे काम करने वाले लोगों के लिए कार्यस्थल पर उपलब्ध सुरक्षा उपकरणों का सही इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। घर में भी हवा के उचित आवागमन का ध्यान रखना चाहिए और धुएं के स्रोतों को कम करना चाहिए।

 

            बच्चों के फेफड़ों को लेकर भी रहें सतर्क क्योंकि, फेफड़ों का स्वस्थ विकास बचपन से शुरू होता है। इसलिए बच्चों को सिगरेट के धुएं से दूर रखना, घर के भीतर धुआं जमा न होने देना और उन्हें अनावश्यक प्रदूषण के संपर्क से बचाना जरूरी है।

 

          बच्चों में लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी या बार-बार होने वाली श्वसन संबंधी समस्या को भी सामान्य मानकर लंबे समय तक टालना ठीक नहीं है।

 

गोष्ठी में डॉ.दीक्षित सवाल करते है कि, क्या है गुब्बारा टेस्ट और इसे कैसे करें ?

 

               फेफड़ों से सांस को पूरी तरह बाहर निकालने की क्षमता का घर पर सामान्य अंदाजा लगाने के लिए गुब्बारे की मदद ली जा सकती है। यह एक आसान तरीका है, जिसमें एक गहरी सांस लेकर उसे एक ही बार में गुब्बारे में फूंकना होता है। हालांकि, इसे फेफड़ों की बीमारी की पक्की जांच नहीं माना जा सकता।

 

         कैसे करें : नया और सामान्य आकार का गुब्बारा लेकर कुर्सी पर पीठ सीधी करके आराम से बैठें। नाक से गहरी सांस लें और फेफड़ों को पूरी तरह हवा से भरें। अब गुब्बारे को मुंह से लगाकर बिना बीच में सांस लिए एक ही बार में पूरी हवा उसमें छोड़ें। इसके बाद देखें कि गुब्बारा कितनी आसानी से और कितना फूल पाया।

 

           अगर गुब्बारा आसानी से अच्छी तरह फूल जाता है तो यह सांस छोड़ने की क्षमता सामान्य होने का संकेत हो सकता है। वहीं, पूरी कोशिश के बावजूद गुब्बारा बहुत कम फूलता है या हवा छोड़ने में काफी परेशानी होती है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। फूंक मारते समय तेज खांसी, सीने में दर्द या चक्कर आए तो तुरंत रुक जाएं और चिकित्सकीय सलाह लें। अगर आप गुब्बारे को ठीक से नहीं फुला पा रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि आपको अपनी दिनचर्या बदलने की जरूरत है। यदि सांस लेने में लगातार तकलीफ हो रही हो, तो बिना देर किए किसी पल्मोनोलॉजिस्ट यानी फेफड़ों के माहिर डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

 

फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए रोज के ये कदम काम आएंगे

 

            तंबाकू से दूरी, धूल-धुएं के संपर्क को कम करना, कार्यस्थल पर जरूरी सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल, घर में पर्याप्त वेंटिलेशन और नियमित शारीरिक गतिविधि फेफड़ों की सेहत के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। प्रदूषण अधिक होने पर अनावश्यक रूप से लंबे समय तक बाहर रहने से बचना भी उपयोगी है।

 

            सबसे जरूरी बात यह है कि शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न किया जाए। लगातार बने रहने वाली सांस संबंधी परेशानी में चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।

 

सांस चल रही है, इसलिए फेफड़े ठीक हैं—यह जरूरी नहीं

 

           फेफड़े लगातार अपना काम करते रहते हैं, इसलिए उनकी अहमियत का एहसास अक्सर तब होता है जब सांस लेने में परेशानी होने लगती है। विश्व फेफड़ा दिवस हमें इसी बात की याद दिलाता है कि फेफड़ों की देखभाल बीमारी आने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले शुरू होनी चाहिए।

 

      आज अपनी सांसों पर एक पल ध्यान दीजिए और खुद से सिर्फ एक सवाल पूछिए—जिस हवा के सहारे जिंदगी चल रही है, क्या हम अपने फेफड़ों को उसके लिए पर्याप्त सुरक्षित रख रहे हैं?

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