राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 4)
तिली, सागर शहर की सीमा में कदम रखते ही सिमरिया का जाना-पहचाना खौफ तो पीछे छूट गया, लेकिन संघर्ष की एक ऐसी अंतहीन सुरंग सामने खड़ी थी जिसका कोई छोर नजर नहीं आ रहा था। शहर बेगाना था, उसकी तंग गलियां और ऊंचे मकान किसी दयाभाव से खाली थे। हीरा ने मजदूरी की तलाश में एड़ियां घिस दीं, पर शहर में काम मिलना इतना आसान नहीं था। जैसे-तैसे तिली में अपने पिता के मकान के एक दालान में बीड़ी बनाकर अपनी माँ पार्वती के साथ रहने लगी ।
मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं, ज़ालिम भाई, छेकोड़ी, मानो दुःस्वप्न की तरह शराब की लत और वहशीपन में और खूंखार हो चुका था। जब भी उसे पैसों की तलब होती, वह हीरा की बीड़ी बनाने और पार्वती की मेहनत मजदूरी घर पर आकर तांडव मचाता बोलत “निकाल पैसे! वरना यहीं फूंक दूंगा सबको इसी दालान में ! रोज़ सुबह शाम वह चिल्लाता, पार्वती और हीरा पर हाथ उठाता, और जो कुछ भी मुट्ठी भर अनाज या दो-चार पैसे हीरा और मान ने बच्चों के लिए बचाकर रखे होते, उन्हें छीनकर ले जाता। हीरा हर अत्याचार सहती, अपनी पीठ पर भाई के डंडे और गालियों के घाव झेलती, लेकिन उसकी आंखों का पानी अब सूखकर अंगारा बन चुका था। वह सिर्फ अपने बच्चों की तरफ देखती और भीतर ही भीतर घुटकर रह जाती।
दिन बीतते गए, मुन्ना अब स्कूल जाने की उम्र का हो चुका था। हीरा का संकल्प डिगा नहीं था, उसने कसम खाई थी कि वह अपने बच्चों को इस जहालत और गुलामी से बाहर निकालेगी। लेकिन स्कूल में दाखिले के लिए न तो पैसे थे और न कोई सामान। पड़ोस की एक हमदर्द महिला ने तरस खाकर अपनी फटी हुई टाट की थैली मुन्ना को दे दी, जिसे हीरा ने सुई-धागे से जैसे-तैसे सिलकर बस्ता बनाया। एक दूसरी पड़ोसिन ने अपनी बच्ची की पुरानी, एक कोने से फूटी हुई स्लेट और छोटा सा चाक का टुकड़ा मुन्ना के हाथ में थमा दिया।
दाखिले के पहले दिन, हीरा ने बड़े चाव से मुन्ना के बिखरे बालों को संवारा, उसकी फटी पर साफ कमीज के बटन बंद किए और उसके हाथ में वह फूटी स्लेट थमा दी। मुन्ना की आंखों में एक अजीब सी चमक थी, उसे लग रहा था कि वह कोई बहुत बड़ा किला फतह करने जा रहा है, पर मासूम बच्चा यह नहीं जानता था कि जिस स्कूल को ज्ञान का मंदिर कहा जाता है, वहाँ उसके लिए तिरस्कार / उत्पीड़न की भट्टी सुलग रही थी।
नार्मल स्कूल के ऊंचे बरामदे में कदम रखते ही हवा बदल गई। उच्च वर्ण के हेडमास्टर और अध्यापकों की नजरें जब मुन्ना के मैले-फटे कपड़ों, पड़ोस की दी हुई फूटी स्लेट और उसके ‘अछूत’ होने की पहचान पर पड़ीं, तो उनकी आंखों में ज्ञान की सौम्यता के बजाय घृणा का उबाल आ गया। कक्षा में कदम रखते ही पंडित जी चिल्लाए, “अरे! कहाँ घुसा चला आ रहा है रे अभागे? उधर टाट पट्टी के कोने से दूर जमीन पर बैठ! छुएगा क्या सबको, मुन्ना सहम गया। उसने अपनी फटी थैली को छाती से भींचा और सबसे पीछे, धूल से सनी नंगी ठंडी ज़मीन पर बैठ गया। लेकिन प्रताड़ना सिर्फ अलग बैठने तक सीमित नहीं थी। दिन की शुरुआत ही जातिगत गालियों की बौछार से होती। इतिहास और भूगोल पढ़ाने के बजाय, अध्यापक मुन्ना को देखकर अपनी भड़ास निकालते।
दुबे मस्साब आँखें चड़ाकर बोलता – इन ढेढ़-चमारों के लड़कों को देखो, फूटी स्लेट लेकर कलक्टर बनने चले हैं!” मास्टर रामदीन ने खैनी थूकते हुए कहा, “पुश्तैनी काम छोड़ोगे, तो यही गति होगी, पढ़-लिखकर क्या बाबू साहेब की बराबरी करोगे रे?”
एक दिन जब मुन्ना से गिनती सुनाने में थोड़ी सी भूल हो गई, तो जैसे मास्टर साहब को अपने भीतर के सारे सवर्ण अहंकार को शांत करने का बहाना मिल गया। “हरामजादे! नीच जात के! अक्ल तो घुटनों में है तुम्हारी!” चिल्लाते हुए मास्टर ने मेज पर रखी बबूल की मोटी छड़ी उठा ली। छड़ी हवा में लहराई और पूरी ताकत से सात साल के मुन्ना की पीठ और पैरों पर बरस पड़ी,,,
सनाक्! सनाक्! सनाक्!
मस्साब फिर बोला ! आगे क्या होगा? बोल! हर फटकार के साथ गाली और छड़ी की चोट मुन्ना के हाड़-मांस को बेध रही थी। मुन्ना चीख उठा, “बाप रे… मर गया !” उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला। वह दर्द से तड़पते हुए मस्साब की टेबल के नीचे दुबकने की कोशिश करने लगा लेकिन मास्टर का हाथ नहीं रुका। उसकी जाति ही उसका सबसे बड़ा अपराध बना दी गई थी। वह मार, वह गालियां, और सवर्ण अध्यापकों का वह भयानक, डरावना चेहरा देखकर मुन्ना के भीतर का बाल-मन गहरे खौफ से भर गया। उसका पूरा शरीर थर-थर कांपने लगा। भय और प्रताड़ना की पराकाष्ठा इस कदर बढ़ी कि वह अपनी सुध-बुध खो बैठा, दर्द और डर के मारे, मार खाते-खाते ही मुन्ना की पैंट गीली हो गई।
पूरी कक्षा के चौरसिया / पटेल जाति के बच्चे ठठाकर हंस पड़े। अध्यापकों के चेहरे पर कोई ग्लानि नहीं थी, बल्कि एक क्रूर अट्टहास था, मानो उन्होंने एक ‘दलित ‘ को उसकी सही औकात दिखा दी हो।
स्कूल की छुट्टी होते ही मुन्ना अपनी फटी थैली और फूटी स्लेट उठाकर पागलों की तरह रोता हुआ घर की तरफ भागा। रास्ते भर उसकी पैंट से टपकता हुआ पेशाब और आंखों के आंसू उसकी आत्मा पर लगे गहरे जख्मों की गवाही दे रहे थे। जब वह घर पहुंचा, तो हीरा को देखते ही उसकी बाँहों से लिपट गया और हिचकियां लेते हुए जोर – जोर से रोने लगा। हीरा ने जब बेटे की यह हालत देखी, उसकी गीली पैंट और पीठ पर उभरे छड़ी के नीले-लाल निशान देखे, तो उसकी रूह कांप गई। ममता के समंदर में जैसे बारूद फट गया। उसने मुन्ना को कसकर अपनी छाती से लगा लिया। उसका रोम-रोम सामंती और जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश से भर उठा। उसने आसमान की तरफ देखा, उसकी आंखों में आंसू थे पर होंठों पर एक भयानक प्रतिज्ञा थी। ‘तुम मेरे बच्चे का शरीर तोड़ सकते हो, उसकी पैंट गीली कराकर उसका मजाक उड़ा सकते हो, लेकिन उसके भीतर के इंसान को नहीं मार सकते, इसी फूटी स्लेट से इतिहास बदला जाएगा, मेरा राजा बेटा एक दिन जरूर अफसर बनेगा, मस्साब !
(शेष – भाग 5)







