केदारनाथ विवाद पर अब विराम।

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खबर: दिनेश सेमवाल, देहरादून।

केदारनाथ विवाद पर अब विराम

श्री बदरीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के सदस्य और वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित श्रीनिवास पोस्ती ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया है कि पिछले दिनों दिल्ली में केदारनाथ धाम के नाम से जो वितंडावाद हुआ, उसका पटाक्षेप हो गया है। यह सनातन की विजय और अनावश्यक तनाव को खत्म करने का संतोषप्रद उपाय है। उन्होंने एक वक्तव्य में कहा कि उत्तराखण्ड की यह धरा सनातन धर्म की सबसे पवित्र स्थानों में मानी गई है। इस धरा की सौम्यता, पवित्रता, अलौकिक – नैसर्गिक भव्यता ही कारण था कि सनातन धर्म में अतिपूजित भगवान शंकर (श्री केदारनाथ में), भगवान विष्णु (श्री बदरीनाथ में) माँ गंगा (गंगोत्री मे) माँ यमुना (यमुनोत्री में) साक्षात विराजमान है।
उत्तराखंड प्राचीन काल में दो भागों में विभक्त था, मानसखंड जो कि आज कुमाऊं मंडल के नाम जाना जाता है और दूसरा केदारखंड जो गढ़वाल मंडल के नाम से विख्यात है। शिव का एक नाम केदार भी है, शिव का प्रिय स्थान होने के कारण ही गढ़वाल मंडल को केदारखंड कहा गया है।
“हिमालये तू केदारं”
तं नमामि !
श्री पोस्ती के मुताबिक श्री केदार नाथ के बारे में कहा जाता है कि महाद्रिपार्श्वे च तटे रमन्तं सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रैः। सुरासुरैर्यक्ष महोरगाढ्यैः केदारमीशं शिवमेकमीडे!!
“अर्थात जो महा गिरी हिमालय के पास केदार श्रृंग के तट पर सदा निवास करते हुए मुनीश्वरों द्वारा पूजित होते हैं तथा देवता, असुर, यक्ष और महँ सर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन कल्याणकारी भगवान् केदार नाथ का मैं करता हूं”
वैसे ही :
बहुनि सन्ति तीर्थानि दिविभूमौ रसासु च
बदरी सदृशं तीर्थ न भूतो न भविष्यति
श्रीनिवास पोस्ती के अनुसार इस धरती पर हर दिशा और हर स्थान में बहुत से तीर्थ हैं लेकिन उत्तराखंड के हिमालय में इस धरा के स्वर्ग कहे जाने वाले भूवैकुण्ठ श्री बदरीनाथ जैसा तीर्थ न तो पहले कभी था और न भविष्य में कभी होगा, जिसमें भगवान की पूजा छ: मास ‘मनुष्य’ करते हैं और शीतकाल में छ: मास भगवान की पूजा ‘देव’ करते हैं।।
पोस्ती ने कहा कि सनातन धर्म में इन धामों का विशेष स्थान है लेकिन इस पावन देवभूमि का भी अपना एक अलग महात्म्य है। ऐसे में इन अलौकिक, अद्वितीय धामों की प्रतिकृति बनाना सनातन धर्म अडिगता से छेड़छाड करना निन्दनीय है।
भगवान श्री राम और रावण दोनों ही उच्च कोटि के शिवभक्त हुए, लेकिन दोनों की भक्ति का अंतर यहां स्पष्ट होता है कि जब सीताजी को छुड़ाने के लिए राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। उन्होने युद्ध के बिना सीताजी को मुक्त करवाने का बहुत प्रयत्न किया, पर जब रावण के न मानने पर विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था। तब श्री राम ने, युद्ध कार्य में सफलता और विजय की कामना से अपने आराध्य भगवान शिव की आराधना के लिए समुद्र किनारे की रेत से शिवलिंग का अपने हाथों से निर्माण किया, तभी भगवान शिव सव्यम् ज्योति स्वरुप प्रकट हुए उन्होंने उस लिंग को श्री रामेश्वरम की उपमा दी। इस युद्ध में रावण के साथ, उसका पूरा राक्षस वंश समाप्त हो गया और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम विजयश्री के साथ वापस लौटे।
उनके मुताबिक पुराणों में उल्लेख आता है कि परमज्ञानी किंतु अति अभिमानी दशानन रावण भी शिव के बहुत बड़े भक्त थे, एक बार घोर तप के बाद जब भगवान शिव ने रावण को वर माँगने को कहा तो रावण ने सर्वशक्तिशाली होने का वर माँगा और जैसे ही वर प्राप्त हुआ रावण ने सोचा में तो सोने की लंका में रहता हूं लेकिन मेरे आराध्य भगवान शिव कैलाश पर्वत पर रहते हैं क्यों न भगवान शिव को ही लंका ले जाया जाए, रावण ने अतिमद में कैलाश पर्वत को उठा दिया जिसकी वजह से मां पार्वती और सभी देवता भयभीत हो गए. लेकिन भगवान शिव समझ गए कि ऐसा क्यों हुआ है। भगवान शिव ने क्रोध में आकर रावण को सबक सिखाया. भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत का थोड़ा सा हिस्सा दबा लिया जिसकी वजह से रावण उसके नीचे आकर छटपटाने लगा और भगवान शिव के क्रोध को शांत करने के लिए उनकी स्तुति करने लगा. तब जाकर भगवान शांत हुए और रावण को उसके अहंकार का सबक सिखाया। पोस्ती कहते हैं कि सनातन धर्म एक मात्र ऐसा धर्म है जिसमें भगवान से बड़ा भक्त को माना जाता है और सबका भक्ति करने का तरीका भिन्न हो सकता है लेकिन सच्चा भक्त तो वह है जो प्रभु के अधीन होकर उनकी उपासना करता है न कि जो प्रभु को खुद के अधीन करने की सोच से भक्ति करता है। दिल्ली में श्रीकेदारनाथ धाम ट्रस्ट के अध्यक्ष सुरेंद्र रौतेला दिल्ली में जो केदारनाथ धाम के नाम से जो मंदिर का निर्माण करने जा रहे और उसके पीछे उनकी जो मन इच्छा थी वह सरासर ही निंदनीय थी और सारे सनातनियों की आस्था पर आघात था।
उन्होंने मुख्यमंत्री धामी को धन्यवाद दिया है जिन्होंने मामले की गंभीरता को समझते हुए यह फैसला लिया कि आज के बाद कोई संस्था या ट्रस्ट चारों धामों के नाम से अन्य स्थान पर मंदिर या धाम निर्माण नहीं कर पायेगा, यह फैसला हमारी आस्था का संरक्षण और संवर्धन करने वाला है, जिसका पूरे सनातनियों द्वारा हृदय की गहराइयो से स्वागत किया गया है।

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