सम्पादक दिल्लीः अजय प्रताप सिंह
(नया अध्याय)
“समय अमरीकी भस्मासुर से बचने का नहीं वरन वध का…!!
पिछले कई दिनों से चल रहे अमरीकी ईरान युद्ध के बाद, विश्व परिदृश्य एकध्रुवीय होते विश्व का साफ और लगातार घातक होते दीख रहे अमरीकी इरादों का नजारा पूरी दुनिया पूरी ढिठाई और विवशता के साथ लगता है देखने के लिए अभिशप्त हो चली है। साफ देखा जा सकता है कि शीतयुद्ध काल आज के वर्तमान परिदृश्य से बेहतर तो था ही, तब किसी अमरीकी भस्मासुर की इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई कि वो किसी संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की तरह हथकड़ी लगाकर उसके देश से अपहरण करने की सामर्थ्य रखता हो, या इराक के राष्ट्रपति सद्दाम की तरह भुखे प्यासे किसी संकरी सुरंग में छिपने के लिए विवश हुआ हो। तत्पश्चात पूरी दुनिया की नपुंसकता के चलते उसे फांसी के फंदे पर लटकाने की सामर्थ्य दिखाई हो, न ही किसी हसीना को भागकर भारत की शरण में आकर जान बचाई हो। सीरिया के राष्ट्रपति असद तो भागकर जैसे तैसे, अपनी जान तो बचा पाए, लेकिन राष्ट्रपति की कुर्सी पर सिंहासन आरुढ होता है 12 करोड़ की कीमत का एक दुर्दांत आतंकी। वाह रे अमरीकी भस्मासुर तेरा भी जवाब नहीं। आज ईरान पर खतरनाक मिसाईलों और बमों का प्रयोग पूरी मानवता की निर्ममता हत्या के अतिरिक्त और क्या है? ईरान के सर्वोच्च नेता खुमैनी की हत्या उसके परिजनो समेत पहले ही दिन करके आज पूरी दुनिया को धमकाने और दुनिया को भयभीत होते देखा जा सकता है।
यहाँ यह साफ करना आवश्यक जान पड़ता है कि हम ईरान की वर्तमान सत्ता के समर्थक बिल्कुल नहीं हैं। जो इजराइल में अपने पोषित इस्लामिक आतंकवाद से निर्दोषों का खुन बहाता हो, यमन, लेबनान और फिलीस्तीनी युवाओं को शिक्षा से वंचित कर आतंकी बनाता हो। यहाँ हम विशुद्ध रूप से पूरी दुनिया में अमरीकी भस्मासुर के कार्यकलापों का विश्लेषण पूरी ईमानदारी के साथ कर रहे हैं। जिसके दुष्प्रभावों का असर भारत पर न पडे हो ही नहीं सकता।
सोवियत संघ के विघटन के बाद अमरीकी भस्मासुर ने चुन चुन कर सोवियत खेमे के देशों को निशाना बनाना जो शुरू किया, वह थमने का नाम नहीं ले रहा। पूर्व सोवियत संघ के नये संस्करण रुस ने उस काल के सभी साथियों को राम भरोसे छोड़कर खुद के अस्तित्व को बचाये रखने की तिकडमों तक सीमित कर लिया है। वहीं विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले चीन ने मुंह पर ताला जड लिया है, यह वही चीन है जो अमरीका को अपदस्थ कर सुप्रीम पावर बनने की हसरत दिल में संजो रखी हैं। भारत जो विश्व गुरु के रूप में खुद को प्रभावी बनाने की जुगत में लगा जरूर है लेकिन समय आने पर फेल हो जाता है। हमारे प्रधानमंत्री का यह कथन अब शिगूफा से अधिक कुछ नहीं लगता, जिसमें उन्होंने दंभ भरा था कि नया भारत हर स्थिति में खुद के लिए अवसर बना लेने की सामर्थ्य रखने वाला बन गया है।
शक्ति के दंभ में चूर अमेरिका का राष्ट्रपति टृंप दुनियावी शिष्टाचार तक की परवाह नहीं करके राष्ट्राध्यक्षों तक की सार्वजनिक बेइज्जती से बाज नही आता। तिस पर भी दुनिया इसे झेलने के लिए विवश हो गई है।
वर्तमान विश्व परिदृश्य में एक शुभ संकेत यदि आज अमरीकी ईरान युद्ध में देखने सुनने को मिला तो वह भी अमरीकी खेमे के फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, स्पेन जैसे देशों की तरफ से मिला है जिसमें इन देशों ने अमरीकी कार्यवाही की कडे शब्दों में निंदा करने का साहस और जोखिम मोल लिया है। यूरोपीय संघ के इन अगुआ देशों की तरफ से यह पहली बार नहीं हुआ, जिसमें इन देशों ने अमरीकी सनकी राष्ट्रपति टृंप की खुलेआम निंदा करने का न सिर्फ साहस जुटाया वरन ग्रीन लैंड मसले पर ये सभी देश एकजुट होकर अमरीकी भस्मासुर के खिलाफ खड़े भी हुए, तब जाकर सनकी टृंप को वापस लौटना पड़ा ग्रीनलैण्ड मामले से। टृंप की सनक की बानगी कनाडा को अपना 51 वां राज्य बनाने की धमकी से भी मिला। आप्रेशन सिंदूर मामले में तो इसकी सनक और राष्ट्रपति जैसे पद की गरिमा के बिल्कुल विपरीत रही, यह अपने बयानों में पाकिस्तान को बिल्कुल बेईमान रेफरी की तरह विजेता घोषित करता रहा है। कभी यह तीन राफेल मार गिराने की बात करता, अगले दिन पांच, फिर सात और अंत में आठ तक आते आते गिनती ही भूल गया। टृंप की ये हरकत निरी सनकी पन थीं, ऐसा मानना भोलापन ही कहा जायेगा, जबकि असलियत में वह भविष्य के प्रति भारत के विरुद्ध अपनी योजना का खुलासा तो कर ही रहा था, वहीं भारतीय नेतृत्व और जनमानस को हीनता का अहसास कराने की कुत्सित योजना का अंग भी थी।
रुस और चीन से जिस रणभेरी के शंखनाद की अपेक्षा थी, उनके उलट रणभेरी बजाकर अमरीकी भस्मासुर के बीज नाश का शंखनाद किया फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैनुअल मैक्रो ने। उन्होंने साफ शब्दों में अमरीकी दंभ को चुनौती देते हुए कहा कि फ्रांस यूरोपीय संघ के देशों की सुरक्षा में सक्षम है, इसके लिए हमें अमरीकी छतरी की आवश्यकता नहीं है। इस बयान का संदेश अमरीकी सरकार, वहाँ की जनता और विश्व पटल के उन देशों के लिए साफ है कि फ्रांस अमरीकी दादागिरी के खिलाफ आप सभी के साथ खड़ा है। मैक्रो के इस नये अवतार ने पूर्व सोवियत संघ की याद ताजा कर दी। वहीं ब्रिटेन ने अपने बयान में ईरान पर हमले को गैरजरूरी बताते हुए, अमेरिका को अपने डिएगो गार्सिया के बेस से अमरीकी युद्धक विमानों के संचालन करने पर रोक लगाकर अमरीकी दादागिरी को आइना दिखाने में कोर कसर नही छोडी। जबकि स्पेन जैसे छोटे से देश ने भी ईरान के खिलाफ युद्ध को गैरकानूनी बताकर अमरीकी खेमे की हवा निकालने का साहस दिखाकर समुचे विश्व नेताओं को आइना दिखा दिया। इससे चिढे सनकी टृंप ने स्पेन पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की धमकी जैसे ही दी, फिर फ्रांस बाहर आया और उन्होंने कड़े शब्दों में टृंप को चेतावनी दी कि यदि अमेरिका स्पेन के खिलाफ ऐसा करेगा तो यूरोपीय संघ अमेरिका पर प्रतिबंध लगाने में तनिक भी देर नही लगायेगा।
विश्व परिदृश्य की घटनाओं के परिपेक्ष में देखें तो भारत सदैव की ही भांति फिर दब्बू देश की अपनी छाया से बाहर आने का साहस नहीं कर सका, बावजूद इसके कि ईरान हमारा मित्र देश तो रहा ही है, वहीं भारत का चाहबहार परियोजना में अकूत दौलत खर्च हो चुकी है जो अब ठप्प होकर अमेरिका के रहमोकरम पर टिक गईं है। जो पैसा सरकार ने चाबहार परियोजना पर लगाया, वह देश की जनता की मेहनत का था, जिसकी सरकार रक्षा करने में समर्थ न हो सकी।
भारत ने लगातार अपने अवसरों को जाया किया यह कहने में संकोच नहीं करना चाहिए। सबसे पहले यूक्रेन युद्ध के बाद प्रधानमंत्री के पास मौका था, टृंप, पुतिन को लेकर एक नये विश्व आर्डर को स्थापित करने का जिसकी कोई कोशिश तक नहीं की गयीं। यदि तब ऐसा किया गया होता तो, न सीरिया के असद को भागना पडता, न आतंकी वहाँ सत्ता नशीं हो पाता, न वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को हथकड़ी लगाकर अपराधी की तरह उठा लेने का साहस होता, न हसीना, न लंका, न आज ईरान प्रकरण होता। वहीं चीनी दिवास्वप्न पर स्थाई ब्रेक लग चुका होता। और पाकिस्तान सुरंग में जा छिपा होता। चलिये तब न सही, आप्रेशन सिंदूर के बाद सनकी टृंप की टैरिफ और मानमर्दन के बाद तो भारतीय नेतृत्व को पुतिन के उन प्रयासों को आगे लाना चाहिए था, जिसमें पुतिन ने आरसीबी यानि रुस, चीन, भारत के गठबंधन की परिकल्पना की थी। इससे भारत को चीनी खतरे से छुटकारा मिलता, साथ ही अमरीकी भस्मासुर के खात्मे का प्रबंध स्थाई रूप से होने और फिर अपने संसाधनों को अपने विकास पर खर्च करने की छूट मिल जाती। तीसरी परिकल्पना भारत अपने नेतृत्व में नाटो सरीखे सैनिक आर्थिक गठबंधन को अमल में लाकर खुद को वहीं तीसरी दुनिया और यूरोपीय संघ के देशों तथा रुसी नेतृत्व को साथ लाकर दुनिया को स्थाई सौहार्द और शांति का तोहफा दे सकता था। जिसमें भारत सदा से ही भीरु रहा, तो आज भी बने रहने में खुद को सुरक्षित समझने की आत्म घाती भूल कर ही रहा है। जिसके लिए आने वाली पीढियां कभी माफ करें या न करें, लेकिन भारत फिलहाल असुरक्षित अवश्य हो गया दिखता है।







